श्री तैत्तिरीयोपनिषद्
Taittiriya Upanishad • कृष्ण यजुर्वेद
श्री तैत्तिरीयोपनिषद्
शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली नामक तीन भागों में विभाजित, जिसमें प्राचीन काल में शिष्यों को दीक्षांत उपदेश दिए गए हैं।
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
oṃ śaṃ no mitraḥ śaṃ varuṇaḥ| śaṃ no bhavatvaryamā| śaṃ no indro bṛhaspatiḥ| śaṃ no viṣṇururukramaḥ| namo brahmaṇe| namaste vāyo| tvameva pratyakṣaṃ brahmāsi| tvāmeva pratyakṣaṃ brahma vadiṣyāmi| ṛtaṃ vadiṣyāmi| satyaṃ vadiṣyāmi| tanmāmavatu tadvaktāramavatu|| oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||
मित्र देव हमारे लिए कल्याणकारी हों, वरुण देव कल्याणकारी हों। अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति और विशाल डग भरने वाले विष्णु देव हमारे लिए कल्याणकारी हों। ब्रह्म को नमस्कार, वायु आपको नमस्कार। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। मैं आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा, ऋत (सत्य) कहूँगा, सत्य कहूँगा। वह मेरी और मेरे आचार्य की रक्षा करे। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!
ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः। वर्णः स्वरः। मात्रा बलम्। साम सन्तानः। इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १ ॥
oṃ śīkṣāṃ vyākhyāsyāmaḥ| varṇaḥ svaraḥ| mātrā balam| sāma santānaḥ| ityuktaḥ śīkṣādhyāyaḥ || 1 ||
हम उच्चारण शास्त्र (शिक्षा) की व्याख्या करेंगे। उसमें वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम (सामंजस्य) और सन्तान (संधि) — ये सीखने योग्य विषय हैं। इस प्रकार शिक्षा का अध्याय कहा गया है।
सह नौ यशः। सह नौ ब्रह्मवर्चसम्। अथातः संहिताया उपनिषदं व्याख्यास्यामः। पञ्चस्वधिकरणेषु। अधिलोक मधिज्यौतिष मधिविद्य मधिप्रज मध्यात्मम्। ता महासंहिता इत्याचक्षते। अथाधिलोकम्। पृथिवी पूर्वरूपम्। द्यौरुत्तररूपम्। आकाशः सन्धिः ॥ २ ॥
saha nau yaśaḥ| saha nau brahmavarcasam| athātaḥ saṃhitāyā upaniṣadaṃ vyākhyāsyāmaḥ| pañcasvadhikaraṇeṣu| adhiloka madhijyautiṣa madhividya madhipraja madhyātmam| tā mahāsaṃhitā ityācakṣate| athādhilokam| pṛthivī pūrvarūpam| dyauruttararūpam| ākāśaḥ sandhiḥ || 2 ||
हम दोनों (गुरु और शिष्य) को साथ-साथ यश प्राप्त हो और साथ-साथ ब्रह्मतेज प्राप्त हो। अब इसके बाद हम पाँच विषयों (अधिकरणों) में संहिता के रहस्य (संधि) की व्याख्या करेंगे: लोकविषयक, ज्योतिर्विषयक, विद्याविषयक, प्रजाविषयक और शरीरविषयक। इन्हें महासंहिता कहते हैं। अब लोकविषयक संहिता कहते हैं: पृथ्वी पूर्वरूप (पहला अक्षर) है, द्युलोक (स्वर्ग) उत्तररूप (दूसरा अक्षर) है, और आकाश उनकी संधि (मिलाप का स्थान) है।
वायुः सन्धानम्। इत्यधिलोकम्। अथाधिज्यौतिषम्। अग्निः पूर्वरूपम्। आदित्य उत्तररूपम्। आपः सन्धिः। वैद्युतः सन्धानम्। इत्यधिज्यौतिषम्। अथाधिविद्यम्। आचार्यः पूर्वरूपम् ॥ ३ ॥
vāyuḥ sandhānam| ityadhilokam| athādhijyautiṣam| agniḥ pūrvarūpam| āditya uttararūpam| āpaḥ sandhiḥ| vaidyutaḥ sandhānam| ityadhijyautiṣam| athādhividyam| ācāryaḥ pūrvarūpam || 3 ||
वायु सन्धान (जोड़ने वाला) है। यह लोकविषयक संहिता हुई। अब ज्योतिर्विषयक संहिता: अग्नि पूर्वरूप है, सूर्य उत्तररूप है, जल संधि है, और बिजली सन्धान है। यह ज्योतिर्विषयक संहिता हुई। अब विद्याविषयक संहिता: आचार्य पूर्वरूप है।
अन्तेवास्युत्तररूपम्। विद्या सन्धिः। प्रवचनं सन्धानम्। इत्यधिविद्यम्। अथाधिप्रजम्। माता पूर्वरूपम्। पितोत्तररूपम्। प्रजा सन्धिः। प्रजननं सन्धानम्। इत्यधिप्रजम् ॥ ४ ॥
antevāsyuttararūpam| vidyā sandhiḥ| pravacanaṃ sandhānam| ityadhividyam| athādhiprajam| mātā pūrvarūpam| pitottararūpam| prajā sandhiḥ| prajananaṃ sandhānam| ityadhiprajam || 4 ||
अन्तेवासी (शिष्य) उत्तररूप है, विद्या संधि है, और प्रवचन (पढ़ाना) सन्धान है। यह विद्याविषयक संहिता हुई। अब प्रजाविषयक संहिता: माता पूर्वरूप है, पिता उत्तररूप है, प्रजा (सन्तान) संधि है, और प्रजनन (उत्पत्ति की क्रिया) सन्धान है। यह प्रजाविषयक संहिता हुई।
अथाध्यात्मम्। अधराहनुः पूर्वरूपम्। उत्तराहनुरुत्तररूपम्। वाक्सन्धिः। जिह्वा सन्धानम्। इत्यध्यात्मम्। इतीमा महासंहिताः। य एवमेता महासंहिता व्याख्याता वेद। सन्धीयते प्रजया पशुभिः। ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्गेण लोकेन ॥ ५ ॥
athādhyātmam| adharāhanuḥ pūrvarūpam| uttarāhanuruttararūpam| vāksandhiḥ| jihvā sandhānam| ityadhyātmam| itīmā mahāsaṃhitāḥ| ya evametā mahāsaṃhitā vyākhyātā veda| sandhīyate prajayā paśubhiḥ| brahmavarcasenānnādyena suvargeṇa lokena || 5 ||
अब शरीरविषयक (अध्यात्म) संहिता: नीचे का जबड़ा पूर्वरूप है, ऊपर का जबड़ा उत्तररूप है, वाणी संधि है, और जिह्वा (जीभ) सन्धान है। यह शरीरविषयक संहिता हुई। ये ही महासंहिताएँ हैं। जो मनुष्य इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासंहिताओं को जानता है, वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज, अन्न और स्वर्गलोक से संयुक्त होता है।
यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम्। शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः। श्रुतं मे गोपाय। आवहन्ती वितन्वाना ॥ ६ ॥
yaśchandasāmṛṣabho viśvarūpaḥ| chandobhyo'dhyamṛtātsambabhūva| sa mendro medhayā spṛṇotu| amṛtasya deva dhāraṇo bhūyāsam| śarīraṃ me vicarṣaṇam| jihvā me madhumattamā| karṇābhyāṃ bhūri viśruvam| brahmaṇaḥ kośo'si medhayā pihitaḥ| śrutaṃ me gopāya| āvahantī vitanvānā || 6 ||
जो वेदों में सर्वश्रेष्ठ, सर्वरूप और वेदों के अमर रस से प्रकट हुआ है, वह परमेश्वर (इन्द्र/ॐकार) मुझे बुद्धि से पुष्ट करे। हे देव! मैं अमृतत्व (ब्रह्मज्ञान) को धारण करने वाला बनूँ। मेरा शरीर निरोग और फुर्तीला हो, मेरी वाणी अत्यंत मधुर हो, और मैं अपने कानों से बहुत सा ज्ञान सुनूँ। हे परमेश्वर! आप बुद्धि के आवरण से ढके हुए ब्रह्म के कोश (म्यान) हैं। मेरे सुने हुए ज्ञान की रक्षा करें।
कुर्वाणाऽचीरमात्मनः। वासांसि मम गावश्च। अन्नपाने च सर्वदा। ततो मे श्रियमावह। लोमशां पशुभिः सह स्वाहा। आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। विमाऽऽयन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। प्रमाऽऽयन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा। शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥ ७ ॥
kurvāṇā'cīramātmanaḥ| vāsāṃsi mama gāvaśca| annapāne ca sarvadā| tato me śriyamāvaha| lomaśāṃ paśubhiḥ saha svāhā| āmāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā| vimā''yantu brahmacāriṇaḥ svāhā| pramā''yantu brahmacāriṇaḥ svāhā| damāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā| śamāyantu brahmacāriṇaḥ svāhā || 7 ||
मेरे लिए वस्त्र, गौएँ, और सदा अन्न-पान की व्यवस्था करने वाली तथा पशुओं के साथ रोएंदार समृद्धि को शीघ्र ही लाएँ, इसके लिए स्वाहा। ब्रह्मचारी मेरे पास चारों ओर से आएँ, इसके लिए स्वाहा। ब्रह्मचारी विविध रूपों में आएँ, इसके लिए स्वाहा। ब्रह्मचारी योग्य रीति से आएँ, इसके लिए स्वाहा। ब्रह्मचारी इंद्रिय-दमन करने वाले हों, इसके लिए स्वाहा। ब्रह्मचारी मन को शांत रखने वाले हों, इसके लिए स्वाहा।
यशो जनेऽसानि स्वाहा। श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा। तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा। सा मा भग प्रविश स्वाहा। तस्मिन् सहस्रशाखे। निभगाऽहं त्वयि मृजे स्वाहा। यथाऽऽपः प्रवताऽऽयन्ति। यथा मासा अहर्जरम्। एवं मां ब्रह्मचारिणः। धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा। प्रतिवेशोऽसि प्रमाही प्रपद्यस्व ॥ ८ ॥
yaśo jane'sāni svāhā| śreyān vasyaso'sāni svāhā| taṃ tvā bhaga praviśāni svāhā| sā mā bhaga praviśa svāhā| tasmin sahasraśākhe| nibhagā'haṃ tvayi mṛje svāhā| yathā''paḥ pravatā''yanti| yathā māsā aharjaram| evaṃ māṃ brahmacāriṇaḥ| dhātarāyantu sarvataḥ svāhā| prativeśo'si pramāhī prapadyasva || 8 ||
मैं मनुष्यों में यशस्वी बनूँ, इसके लिए स्वाहा। मैं धनवानों में श्रेष्ठ बनूँ, इसके लिए स्वाहा। हे भगवन! मैं आपमें प्रवेश करूँ (लीन होऊँ), इसके लिए स्वाहा। हे भगवन! आप मुझमें प्रवेश करें, इसके लिए स्वाहा। हे सहस्रों शाखाओं वाले परमात्मा! मैं आपमें अपने पापों को धो डालता हूँ, इसके लिए स्वाहा। जैसे जल नीचे की ओर बहता है, जैसे महीने वर्ष में विलीन होते हैं, वैसे ही हे विधाता! ब्रह्मचारी सब दिशाओं से मेरे पास आएँ, इसके लिए स्वाहा। आप शरणदाता हैं, मुझ पर अपना प्रकाश डालें और मुझे स्वीकार करें।
भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः। तासामुहस्मैतां चतुर्थीम्। माहाचमस्यः प्रवेदयते। मह इति। तद्ब्रह्म। सा आत्मा। अङ्गान्यन्या देवताः। भूरिति वा अयं लोकः। भुव इत्यन्तरिक्षम्। सुवरित्यसौ लोकः ॥ ९ ॥
bhūrbhuvaḥ suvariti vā etāstisro vyāhṛtayaḥ| tāsāmuhasmaitāṃ caturthīm| māhācamasyaḥ pravedayate| maha iti| tadbrahma| sā ātmā| aṅgānyanyā devatāḥ| bhūriti vā ayaṃ lokaḥ| bhuva ityantarikṣam| suvarityasau lokaḥ || 9 ||
भूः, भुवः, स्वः — ये तीन व्याहृतियाँ प्रसिद्ध हैं। इनमें से चौथी 'महः' नाम की व्याहृति को महाचमस के पुत्र ने जाना। वह महः ही ब्रह्म है, वह आत्मा है और अन्य देवता उसके अंग हैं। भूः ही यह लोक (पृथ्वी) है, भुवः अन्तरिक्ष है, और स्वः वह लोक (स्वर्ग) है।
मह इत्यादित्यः। आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते। भूरिति वा अग्निः। भुव इति वायुः। सुवरित्यादित्यः। मह इति चन्द्रमाः। चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतींषि महीयन्ते। भूरिति वा ऋचः। भुव इति सामानि। सुवरिति यजूंषि ॥ १० ॥
maha ityādityaḥ| ādityena vāva sarve lokā mahīyante| bhūriti vā agniḥ| bhuva iti vāyuḥ| suvarityādityaḥ| maha iti candramāḥ| candramasā vāva sarvāṇi jyotīṃṣi mahīyante| bhūriti vā ṛcaḥ| bhuva iti sāmāni| suvariti yajūṃṣi || 10 ||
महः ही सूर्य है, क्योंकि सूर्य से ही सभी लोक मण्डित (प्रकाशित) होते हैं। भूः ही अग्नि है, भुवः वायु है, स्वः सूर्य है और महः चन्द्रमा है; क्योंकि चन्द्रमा से ही सभी नक्षत्र और ज्योति प्रकाशित होते हैं। भूः ही ऋग्वेद है, भुवः सामवेद है, और स्वः यजुर्वेद है।
मह इति ब्रह्म। ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते। भूरिति वै प्राणः। भुव इत्यपानः। सुवरिति व्यानः। मह इत्यन्नम्। अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते। ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा। चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः। ता yo वेद। सा वेद ब्रह्म। सर्वेऽस्मै देवा बलिमावहन्ति ॥ ११ ॥
maha iti brahma| brahmaṇā vāva sarve vedā mahīyante| bhūriti vai prāṇaḥ| bhuva ityapānaḥ| suvariti vyānaḥ| maha ityannam| annena vāva sarve prāṇā mahīyante| tā vā etāścatasraścaturdhā| catasraścatasro vyāhṛtayaḥ| tā yo veda| sā veda brahma| sarve'smai devā balimāvahanti || 11 ||
महः ही ब्रह्म (ॐकार) है; क्योंकि ब्रह्म से ही सभी वेद तृप्त (पोषित) होते हैं। भूः ही प्राण है, भुवः अपान है, स्वः व्यान है, और महः अन्न है; क्योंकि अन्न से ही समस्त प्राण पुष्ट होते हैं। ये चारों व्याहृतियाँ चार-चार रूपों वाली हैं। जो इन्हें जानता है, वह ब्रह्म को जानता है। सभी देवता उसे भेंट (उपहार) अर्पित करते हैं।
स य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः। तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः। अमृतो हिरण्मयः। अन्तरेण तालुके। य एष स्तन इवावलम्बते। सेन्द्रयोनिः। यत्रासौ केशान्तो विवर्तते। व्यपोह्य शीर्षकपाले। भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति। भुव इति वायौ ॥ १२ ॥
sa ya eṣo'ntarhṛdaya ākāśaḥ| tasminnayaṃ puruṣo manomayaḥ| amṛto hiraṇmayaḥ| antareṇa tāluke| ya eṣa stana ivāvalambate| sendrayoniḥ| yatrāsau keśānto vivartate| vyapohya śīrṣakapāle| bhūrityagnau pratitiṣṭhati| bhuva iti vāyau || 12 ||
यह जो हृदय के भीतर आकाश है, उसमें यह मनोमय, अमृतमय और प्रकाशमान (हिरण्मय) पुरुष (परमात्मा) निवास करता है। तालु के बीच में जो स्तन की भांति लटकता हुआ मांसपिंड है, उसके बीच में से होकर ब्रह्म का मार्ग जाता है; जहाँ बालों की सीमा समाप्त होती है, उस कपाल की हड्डियों को चीरता हुआ वह बाहर निकलता है। वह भूः रूप में अग्नि में स्थित होता है और भुवः रूप में वायु में।
सुवरित्यादित्ये। मह इति ब्रह्मणि। आप्नोति स्वाराज्यम्। आप्नोति मनसस्पतिम्। वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः। श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः। एतत्ततो भवति। आकाशशरीरं ब्रह्म। सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम्। शान्तिसमृद्धममृतम्। इति प्राचीनयोग्योपास्व ॥ १३ ॥
suvarityāditye| maha iti brahmaṇi| āpnoti svārājyam| āpnoti manasaspatim| vākpatiścakṣuṣpatiḥ| śrotrapatirvijñānapatiḥ| etattato bhavati| ākāśaśarīraṃ brahma| satyātma prāṇārāmaṃ mana ānandam| śāntisamṛddhamamṛtam| iti prācīnayogyopāsva || 13 ||
वह स्वः रूप में सूर्य में स्थित होता है और महः रूप में ब्रह्म में स्थित होता है। वह स्वाराज्य (परम स्वतंत्रता) प्राप्त कर लेता है। वह मन के स्वामी को प्राप्त करता है। वह वाणी का स्वामी, चक्षु का स्वामी, श्रोत्र का स्वामी और बुद्धि का स्वामी बन जाता है। इससे भी परे वह आकाश के समान व्यापक शरीर वाले ब्रह्म को प्राप्त करता है, जिसका स्वरूप सत्य है, जो प्राणों का क्रीड़ास्थल है, मन को आनंद देने वाला है, और जो शांति से समृद्ध तथा अमर है। हे प्राचीनयोग्य! तुम इसी रूप में ब्रह्म की उपासना करो।
पृथिव्यन्तरिक्षं द्युरुत दिशोऽवान्तरदिशः। अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक्। चर्म मासं स्नाव अस्थि मज्जा। एतदधिविधाय ऋषिरवोचत्। पाङ्क्तं वा इदं सर्वम्। पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तं स्पृणोतीति ॥ १४ ॥
pṛthivyantarikṣaṃ dyuruta diśo'vāntaradiśaḥ| agnirvāyurādityaścandramā nakṣatrāṇi| āpa oṣadhayo vanaspataya ākāśa ātmā| ityadhibhūtam| athādhyātmam| prāṇo vyāno'pāna udānaḥ samānaḥ| cakṣuḥ śrotraṃ mano vāk tvak| carma māsaṃ snāva asthi majjā| etadadhividhāya ṛṣiravocat| pāṅktaṃ vā idaṃ sarvam| pāṅktenaiva pāṅktaṃ spṛṇotīti || 14 ||
पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, मुख्य दिशाएँ और उपदिशाएँ; अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र; जल, ओषधियाँ, वनस्पति, आकाश और स्थूल जगत — यह अधिभूत (बाह्य सृष्टि) है। अब अध्यात्म: प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान; नेत्र, श्रोत्र, मन, वाणी और त्वचा; त्वचा, मांस, स्नायु, हड्डी और मज्जा। इसी का विचार करके ऋषि ने कहा था: 'यह सब कुछ पांच-पांच के समूह से बना है। मनुष्य इस भीतरी पांच के समूह से बाहरी पांच के समूह को परिपूर्ण करता है।'
ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्वम्। ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्योश्रावयेत्याश्रावयन्ति। ओमिति सामानि गायन्ति। ॐशोमिति शस्त्राणि शंसन्ति। ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति। ओमिति ब्रह्मा प्रसौति। ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति। ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १५ ॥
omiti brahma| omitīdaṃ sarvam| omityetadanukṛtirhasma vā apyośrāvayetyāśrāvayanti| omiti sāmāni gāyanti| oṃśomiti śastrāṇi śaṃsanti| omityadhvaryuḥ pratigaraṃ pratigṛṇāti| omiti brahmā prasauti| omityagnihotramanujānāti| omiti brāhmaṇaḥ pravakṣyannāha brahmopāpnavānīti| brahmaivopāpnoti || 15 ||
ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह सब कुछ है। ॐ का उच्चारण अनुकृति (स्वीकृति) के लिए होता है; याजक लोग 'ओश्रावय' कहकर ॐ से ही देवों का आवाहन करते हैं। ॐ कहकर ही सामवेदी गान शुरू करते हैं। ॐ कहकर शस्त्रों का पाठ करते हैं। अध्वर्यु ॐ से ही प्रतिगर देता है। ब्रह्मा ॐ कहकर ही अनुज्ञा देता है। अग्निहोत्र की आज्ञा भी ॐ कहकर दी जाती है। स्वाध्याय करने वाला ब्राह्मण जब वेदों का पाठ आरंभ करता है, तब 'मैं ब्रह्म को प्राप्त करूँ' ऐसा विचार करके ॐ का उच्चारण करता है। वह निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त करता है।
ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। स्वाध्यायप्रवचने एवैवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥ १६ ॥
ṛtaṃ ca svādhyāyapravacane ca| satyaṃ ca svādhyāyapravacane ca| tapaśca svādhyāyapravacane ca| damaśca svādhyāyapravacane ca| śamaśca svādhyāyapravacane ca| agnayaśca svādhyāyapravacane ca| agnihotraṃ ca svādhyāyapravacane ca| atithayaśca svādhyāyapravacane ca| mānuṣaṃ ca svādhyāyapravacane ca| prajā ca svādhyāyapravacane ca| prajanaśca svādhyāyapravacane ca| prajātiśca svādhyāyapravacane ca| satyamiti satyavacā rāthītaraḥ| tapa iti taponityaḥ pauruśiṣṭiḥ| svādhyāyapravacane evaiveti nāko maudgalyaḥ| taddhi tapastaddhi tapaḥ || 16 ||
ऋत का आचरण और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। सत्य का आचरण और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। तप और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। दम (बाह्य इंद्रियों का दमन) और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। शम (मन की शांति) और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। अग्नियों की स्थापना और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। अग्निहोत्र यज्ञ और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। अतिथियों का सत्कार और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। सामाजिक व्यवहार और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। सन्तानोत्पत्ति और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। मैथुन और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। वंश-वृद्धि और स्वाध्याय-प्रवचन करना चाहिए। रथीतरा गोत्र के सत्यवचा का मत है कि 'सत्य ही मुख्य है'। पुरुशिष्ट के पुत्र तपोनित्य का मत है कि 'तप ही मुख्य है'। मुद्गल के पुत्र नाक का मत है कि 'स्वाध्याय और प्रवचन ही सर्वश्रेष्ठ हैं', क्योंकि वही वास्तविक तप है।
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मी। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ १७ ॥
ahaṃ vṛkṣasya rerivā| kīrtiḥ pṛṣṭhaṃ gireriva| ūrdhvapavitro vājinīva svamṛtamasmī| draviṇaṃ savarcasam| sumedhā amṛtokṣitaḥ| iti triśaṅkorvedānuvacanam || 17 ||
मैं इस संसार रूपी वृक्ष को संचालित करने वाला हूँ। मेरी कीर्ति पर्वत के शिखर के समान ऊंची है। मेरा मूल कारण परम पवित्र ब्रह्म है। मैं सूर्य के समान विशुद्ध अमृतमय आत्मतत्व हूँ। मैं तेजस्वी और ज्ञान रूपी धन हूँ। मैं उत्तम बुद्धि वाला, अमर और अविनाशी हूँ। यह आत्मसाक्षात्कार होने पर त्रिशंकु ऋषि का वचन है।
वेदमनूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति। सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै ना प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां ना प्रमदितव्यम् ॥ १८ ॥
vedamanūcyācāryo'ntevāsinamanuśāsti| satyaṃ vada| dharmaṃ cara| svādhyāyānmā pramadaḥ| ācāryāya priyaṃ dhanamāhṛtya prajātantuṃ mā vyavacchetsīḥ| satyānna pramaditavyam| dharmānna pramaditavyam| kuśalānna pramaditavyam| bhūtyai nā pramaditavyam| svādhyāyapravacanābhyāṃ nā pramaditavyam || 18 ||
शिष्य को वेद पढ़ाकर आचार्य यह दीक्षांत उपदेश देता है: सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय में आलस्य मत करो। आचार्य के लिए उनकी प्रिय दक्षिणा लाकर, विवाह करके संतान की परंपरा को मत तोड़ो। सत्य से कभी विमुख मत हो। धर्म के आचरण से कभी विमुख मत हो। आत्म-रक्षा के कार्यों से मत चूको। ऐश्वर्य और कल्याणकारी कर्मों से विमुख मत हो। स्वाध्याय और प्रवचन से कभी प्रमाद मत करो।
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानी कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माक सुचरितानी। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि ॥ १९ ॥
mātṛdevo bhava| pitṛdevo bhava| ācāryadevo bhava| atithidevo bhava| yānyanavadyānī karmāṇi| tāni sevitavyāni| no itarāṇi| yānyasmāka sucaritānī| tāni tvayopāsyāni| no itarāṇi || 19 ||
माता को देवता मानो, पिता को देवता मानो, आचार्य को देवता मानो और अतिथि को देवता मानो। जो कर्म दोषरहित हैं, उन्हीं का सेवन करो, दूसरों का नहीं। हमारे जो अच्छे आचरण हैं, उन्हीं को ग्रहण करो, दूसरों को नहीं।
ये केचास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः। तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयाऽदेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्। तथा तत्र वर्तेथाः। अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्। तथा तत्र वर्तेथाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमुचैतदुपास्यम् ॥ २० ॥
ye kecāsmacchreyāṃso brāhmaṇāḥ| teṣāṃ tvayā''sanena praśvasitavyam| śraddhayā deyam| aśraddhayā'deyam| śriyā deyam| hriyā deyam| bhiyā deyam| saṃvidā deyam| atha yadi te karmavicikitsā vā vṛttavicikitsā vā syāt| ye tatra brāhmaṇāḥ sammarśinaḥ| yuktā āyuktāḥ| alūkṣā dharmakāmāḥ syuḥ| yathā te tatra varteran| tathā tatra vartethāḥ| athābhyākhyāteṣu| ye tatra brāhmaṇāḥ sammarśinaḥ| yuktā āyuktāḥ| alūkṣā dharmakāmāḥ syuḥ| yathā te tatra varteran| tathā tatra vartethāḥ| eṣa ādeśaḥ| eṣa upadeśaḥ| eṣā vedopaniṣat| etadanuśāsanam| evamupāsitavyam| evamucaitadupāsyam || 20 ||
हमसे जो भी श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण हों, उन्हें आसन देकर उनकी थकावट को दूर करो। दान सदा श्रद्धा से देना चाहिए, अश्रद्धा से नहीं देना चाहिए। सामर्थ्य के अनुसार देना चाहिए। नम्रता और लज्जा के साथ देना चाहिए। भय के साथ देना चाहिए। सहानुभूति और मैत्री भाव के साथ देना चाहिए। इसके बाद यदि तुम्हें किसी कर्म अथवा आचरण के विषय में कोई संदेह हो, तो वहाँ जो विचारशील, ज्ञानी, स्वतंत्र, कोमल स्वभाव वाले और धर्मप्रेमी ब्राह्मण उपस्थित हों, वे जैसा वहाँ आचरण करें, वैसा ही तुम भी आचरण करो। और जिन पर दोषारोपण किया गया हो, उनके विषय में भी वैसे ही ब्राह्मण जैसा आचरण करें, वैसा ही तुम करो। यही वेद की आज्ञा है, यही उपदेश है, यही उपनिषद् का रहस्य है, यही शासन है। इसी प्रकार उपासना की जानी चाहिए और इसी प्रकार इसका आचरण करना चाहिए।
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्वर्यमा। शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः। नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्म अवादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत् तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम् आवीद्वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
oṃ śaṃ no mitraḥ śaṃ varuṇaḥ| śaṃ no bhavatvaryamā| śaṃ no indro bṛhaspatiḥ| śaṃ no viṣṇururukramaḥ| namo brahmaṇe| namaste vāyo| tvameva pratyakṣaṃ brahmāsi| tvameva pratyakṣaṃ brahma avādiṣam| ṛtamavādiṣam| satyamavādiṣam| tanmāmāvīt tadvaktāramāvīt| āvīnmām āvīdvaktāram|| oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||
मित्र देव हमारे लिए कल्याणकारी हों, वरुण देव कल्याणकारी हों। अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति और विशाल डग भरने वाले विष्णु देव हमारे लिए कल्याणकारी हों। ब्रह्म को नमस्कार, वायु आपको नमस्कार। आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हैं। मैंने आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा, ऋत कहा, सत्य कहा। उसने मेरी रक्षा की और वक्ता (गुरु) की रक्षा की। उसने मेरी रक्षा की, उसने वक्ता की रक्षा की। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
oṃ saha nāvavatu| saha nau bhunaktu| saha vīryaṃ karavāvahai| tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai|| oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||
परमेश्वर हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों साथ-साथ महान बल (तेज) प्राप्त करें। हमारी पढ़ी हुई विद्या प्रकाशमान और प्रभावशाली हो, और हम कभी आपस में द्वेष न करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!
ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम्। तदेषाऽभ्युक्ता। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन। सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चितेति ॥ २३ ॥
oṃ brahmavidāpnoti param| tadeṣā'bhyuktā| satyaṃ jñānamanantaṃ brahma| yo veda nihitaṃ guhāyāṃ parame vyomana| so'śnute sarvān kāmān saha brahmaṇā vipaściteti || 23 ||
ब्रह्म को जानने वाला परम पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है। इस विषय में यह ऋचा कही गई है: 'ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंत है।' जो मनुष्य उस ब्रह्म को बुद्धि रूपी गुहा में और हृदय के परम आकाश में स्थित जानता है, वह सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ एक होकर समस्त कामनाओं को एक ही साथ भोगता है।
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। याः काश्च पृथिवीं श्रिताः। अथो अन्नेनैव जीवन्ति। अथैनदपि यन्त्यन्ततः। अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वौषधमुच्यते। सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति। येऽन्नं ब्रह्मोपासते। अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात्सर्वौषधमुच्यते। अन्नाद्भूतानि जायन्ते। जातान्यन्नेन वर्धन्ते। अद्यतेऽत्ति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्यत इति ॥ २४ ॥
annādvai prajāḥ prajāyante| yāḥ kāśca pṛthivīṃ śritāḥ| atho annenaiva jīvanti| athainadapi yantyantataḥ| annaṃ hi bhūtānāṃ jyeṣṭham| tasmātsarvauṣadhamucyate| sarvaṃ vai te'nnamāpnuvanti| ye'nnaṃ brahmopāsate| annaṃ hi bhūtānāṃ jyeṣṭham| tasmātsarvauṣadhamucyate| annādbhūtāni jāyante| jātānyannena vardhante| adyate'tti ca bhūtāni| tasmādannaṃ taducyata iti || 24 ||
पृथ्वी पर रहने वाले जो कोई भी प्राणी हैं, वे सब अन्न से ही उत्पन्न होते हैं। फिर वे अन्न के सहारे ही जीवित रहते हैं, और अंत में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं। अन्न निश्चय ही सभी प्राणियों में ज्येष्ठ (सबसे पहला) है; इसलिए इसे सबकी औषधि कहा जाता है। जो अन्न को ब्रह्म मानकर उपासना करते हैं, वे संपूर्ण अन्न प्राप्त करते हैं। प्राणी अन्न से पैदा होते हैं और उत्पन्न होकर अन्न से बढ़ते हैं। चूंकि यह प्राणियों द्वारा खाया जाता है और स्वयं प्राणियों को खाता है, इसलिए इसे 'अन्न' कहा जाता है।
प्राणं देवा अनु प्राणन्ति। मनुष्याः पशवश्च ये। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यते। सर्वमेव त आयुर्यन्ति। ye प्राणं ब्रह्मोपासते। प्राणो हि भूतानामायुः। तस्मात्सर्वायुषमुच्यत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य ॥ २५ ॥
prāṇaṃ devā anu prāṇanti| manuṣyāḥ paśavaśca ye| prāṇo hi bhūtānāmāyuḥ| tasmātsarvāyuṣamucyate| sarvameva ta āyuryanti| ye prāṇaṃ brahmopāsate| prāṇo hi bhūtānāmāyuḥ| tasmātsarvāyuṣamucyata iti| tasyaiṣa eva śārīra ātmā| yaḥ pūrvasya || 25 ||
प्राण के सहारे ही देवगण (इंद्रियाँ) क्रियाशील होते हैं; तथा मनुष्य और पशु भी इसी से चेष्टा करते हैं। प्राण ही समस्त प्राणियों की आयु है; इसलिए इसे 'सर्वायुष' कहा जाता है। जो प्राण को ब्रह्म मानकर उपासना करते हैं, वे पूर्ण आयु प्राप्त करते हैं। इस अन्नमय शरीर का यही (प्राणमय शरीर) ही भीतरी जीवात्मा है।
यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति कदाचनेति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य ॥ २६ ॥
yato vāco nivartante| aprāpya manasā saha| ānandaṃ brahmaṇo vidvān| na bibheti kadācaneti| tasyaiṣa eva śārīra ātmā| yaḥ pūrvasya || 26 ||
वाणी मन के साथ जिस ब्रह्म को प्राप्त किए बिना लौट आती है, उस ब्रह्म के आनंद को जानने वाला ज्ञानी कभी किसी से भयभीत नहीं होता। उस प्राणमय शरीर का यही (मनोमय शरीर) ही अंतरात्मा है।
विज्ञानं यज्ञं तनुते। कर्माणि तनुतेऽपि च। विज्ञानं देवाः सर्वे। ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते। विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद। तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति। शरीरे पाप्मनो हित्वा। सर्वान्कामान्समश्नुत इति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य ॥ २७ ॥
vijñānaṃ yajñaṃ tanute| karmāṇi tanute'pi ca| vijñānaṃ devāḥ sarve| brahma jyeṣṭhamupāsate| vijñānaṃ brahma cedveda| tasmāccenna pramādyati| śarīre pāpmano hitvā| sarvānkāmānsamaśnuta iti| tasyaiṣa eva śārīra ātmā| yaḥ pūrvasya || 27 ||
विज्ञान ही यज्ञ का विस्तार करता है और समस्त लौकिक कर्मों को भी संपन्न करता है। सभी देवगण उस बुद्धि रूपी ज्येष्ठ ब्रह्म की उपासना करते हैं। यदि कोई मनुष्य विज्ञान को ब्रह्म मानकर जानता है और उससे कभी विमुख नहीं होता, तो वह शरीर में किए गए समस्त पापों को छोड़कर सभी भोगों को पूर्णतः प्राप्त करता है। उस मनोमय शरीर का यही (विज्ञानमय शरीर) अंतरात्मा है।
असन्नेव स भवति। असद्ब्रह्मेति वेद चेत्। अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद। सन्तमेनं ततो विदुरिति। तस्यैष एव शारीर आत्मा। यः पूर्वस्य ॥ २८ ॥
asanneva sa bhavati| asadbrahmeti veda cet| asti brahmeti cedveda| santamenaṃ tato viduriti| tasyaiṣa eva śārīra ātmā| yaḥ pūrvasya || 28 ||
यदि कोई व्यक्ति ब्रह्म को असत् (अस्तित्वहीन) मानता है, तो वह स्वयं ही असत् हो जाता है। यदि कोई जानता है कि ब्रह्म है, तो संत लोग उसे ब्रह्ममय होने से 'सत्' जानते हैं। उस विज्ञानमय शरीर का यही (आनंदमय शरीर) अंतरात्मा है।
असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत। तदात्मानं स्वयमकुरुत। तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति। यद्वै तत् सुकृतम्। रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्। यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति ॥ २९ ॥
asadvā idamagra āsīt| tato vai sadajāyata| tadātmānaṃ svayamakuruta| tasmāttatsukṛtamucyata iti| yadvai tat sukṛtam| raso vai saḥ| rasaṃ hyevāyaṃ labdhvā''nandī bhavati| ko hyevānyātkaḥ prāṇyāt| yadeṣa ākāśa ānando na syāt| eṣa hyevānandayāti || 29 ||
सृष्टि के आरंभ में यह सब कुछ असत् (अव्यक्त रूप) था। उससे यह सत् (व्यक्त जगत) उत्पन्न हुआ। उस परमात्मा ने स्वयं को ही सृष्टि के रूप में रचा; इसलिए उसे 'सुकृत' कहा जाता है। वह जो सुकृत है, वही वास्तव में रस (आनंद का सार) है। इस रस को प्राप्त करके ही जीव आनंदित होता है। यदि हृदय के आकाश में यह आनंद स्वरूप परमात्मा न हो, तो कौन जीवित रहे और कौन चेष्टा करे? वही सबको आनंदित करता है।
भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चम इति ॥ ३० ॥
bhīṣāsmādvātaḥ pavate| bhīṣodeti sūryaḥ| bhīṣāsmādagniścendraśca| mṛtyurdhāvati pañcama iti || 30 ||
इस परमात्मा के भय से ही वायु बहती है। इसी के भय से सूर्य उदित होता है। इसी के भय से अग्नि, इन्द्र और पाँचवें मृत्युदेव अपने-अपने काम में दौड़ते हैं।
सैशानन्दस्य मीमांसा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाऽध्यायकः। आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठः। तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात्। स एको मानुष आनन्दः। ते ये शतम् मानुषा आनन्दाः। स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः। स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः। स एको पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ३१ ॥
saiśānandasya mīmāṃsā bhavati| yuvā syātsādhuyuvā'dhyāyakaḥ| āśiṣṭho draḍhiṣṭho baliṣṭhaḥ| tasyeyaṃ pṛthivī sarvā vittasya pūrṇā syāt| sa eko mānuṣa ānandaḥ| te ye śatam mānuṣā ānandāḥ| sa eko manuṣyagandharvāṇāmānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ manuṣyagandharvāṇāmānandāḥ| sa eko devagandharvāṇāmānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ devagandharvāṇāmānandāḥ| sa eko pitṝṇāṃ ciralokalokānāmānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya || 31 ||
अब यह ब्रह्मानंद की मीमांसा है: मान लीजिए कोई नवयुवक हो, जो चरित्रवान हो, वेदपाठी हो, अत्यंत क्रियाशील, दृढ़ शरीर वाला और बलवान हो। उसके लिए यह संपूर्ण पृथ्वी धन-धान्य से पूर्ण हो। यह मनुष्य का एक आनंद है। ऐसे सौ मानुष आनंदों के बराबर मनुष्य-गंधर्वों का एक आनंद होता है; और कामनाओं से रहित वेदपाठी ज्ञानी का भी यही आनंद है। मनुष्य-गंधर्वों के सौ आनंदों के बराबर देव-गंधर्वों का एक आनंद होता है; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है। देव-गंधर्वों के सौ आनंदों के बराबर पितरों का एक आनंद होता है जो चिरकाल तक रहने वाले लोकों में रहते हैं; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है।
ते ये शतं पितॄणां चिरलोकलोकानामानन्दाः। स एको आजानजानां देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं आजानजानां देवानामानन्दाः। स एको कर्मदेवानामद्वैयानां देवानामानन्दः। ये कर्मणा देवानपियन्ति। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं कर्मदेवानामद्वैयानां देवानामानन्दाः। स एको देवानामानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं देवानामानन्दाः। स एको इन्द्रस्यानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं इन्द्रस्यानन्दाः। स एको बृहस्पतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः। स एको प्रजापतेरानन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य। ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः। स एको ब्रह्मण आनन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ३२ ॥
te ye śataṃ pitṝṇāṃ ciralokalokānāmānandāḥ| sa eko ājānajānāṃ devānāmānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ ājānajānāṃ devānāmānandāḥ| sa eko karmadevānāmadvaiyānāṃ devānāmānandaḥ| ye karmaṇā devānapiyanti| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ karmadevānāmadvaiyānāṃ devānāmānandāḥ| sa eko devānāmānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ devānāmānandāḥ| sa eko indrasyānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ indrasyānandāḥ| sa eko bṛhaspaterānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ bṛhaspaterānandāḥ| sa eko prajāpaterānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya| te ye śataṃ prajāpaterānandāḥ| sa eko brahmaṇa ānandaḥ| śrotriyasya cākāmahatasya || 32 ||
पितरों के सौ आनंदों के बराबर देवलोक में उत्पन्न आजानज देवताओं का एक आनंद होता है; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है। आजानज देवताओं के सौ आनंदों के बराबर कर्म-देवताओं का एक आनंद होता है; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है। कर्म-देवताओं के सौ आनंदों के बराबर साक्षात् देवताओं का एक आनंद होता है; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है। देवताओं के सौ आनंदों के बराबर इन्द्र का एक आनंद होता है; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है। इन्द्र के सौ आनंदों के बराबर बृहस्पति का एक आनंद होता है; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है। बृहस्पति के सौ आनंदों के बराबर प्रजापति का एक आनंद होता है; और निष्काम ज्ञानी का भी यही आनंद है। प्रजापति के सौ आनंदों के बराबर हिरण्यगर्भ का एक आनंद होता है; और वासना-रहित वेदपाठी ज्ञानी का भी यही परम आनंद है।
स यश्चायं पुरुषे। यश्चासावादित्ये। स एकः। स य एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति ॥ ३३ ॥
sa yaścāyaṃ puruṣe| yaścāsāvāditye| sa ekaḥ| sa ya evaṃvit| asmāllokātpretya| etamannamayamātmānamupasaṅkrāmati| etaṃ prāṇamayamātmānamupasaṅkrāmati| etaṃ manomayamātmānamupasaṅkrāmati| etaṃ vijñānamayamātmānamupasaṅkrāmati| etamānandamayamātmānamupasaṅkrāmati || 33 ||
जो मनुष्य में यह चेतन तत्व है और जो सूर्य में वह प्रकाश तत्व है, वे दोनों वास्तव में एक ही हैं। जो मनुष्य इस प्रकार एकत्व भाव को जानता है, वह इस लोक से विदा होने पर इस अन्नमय शरीर से ऊपर उठकर प्राणमय शरीर में प्रवेश करता है, फिर मनोमय में, फिर विज्ञानमय में, और अंत में इस आनंदमय आत्मा को प्राप्त कर लेता है।
यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्। न बिभेति कुतश्चनेति। एतंह वाव न तपति। किमहम्स साधु नाकरवम्। किमहं पापमकरवमिति। सा य एवं विद्वानेते आत्मानं स्पृणुते। उभे ह्येवैष एते आत्मानं स्पृणुते। य एवं वेद। इत्युपनिषत् ॥ ३४ ॥
yato vāco nivartante| aprāpya manasā saha| ānandaṃ brahmaṇo vidvān| na bibheti kutaścaneti| etaṃha vāva na tapati| kimahamsa sādhu nākaravam| kimahaṃ pāpamakaravamiti| sā ya evaṃ vidvānete ātmānaṃ spṛṇute| ubhe hyevaiṣa ete ātmānaṃ spṛṇute| ya evaṃ veda| ityupaniṣat || 34 ||
मन सहित वाणी जिस ब्रह्म को प्राप्त किए बिना लौट आती है, उस ब्रह्म के आनंद को जानने वाला ज्ञानी पुरुष किसी से भी भयभीत नहीं होता। उसे यह पश्चाताप कभी संतप्त नहीं करता कि 'मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किए?' और 'मैंने पाप कर्म क्यों किए?' जो ज्ञानी इस रहस्य को जानता है, वह इन दोनों को आत्मा का ही रूप समझकर संतुष्ट रहता है; वह इन दोनों को आत्मा में ही लीन कर लेता है। यही उपनिषद् का परम रहस्य है।
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
oṃ saha nāvavatu| saha nau bhunaktu| saha vīryaṃ karavāvahai| tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai|| oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||
परमेश्वर हम दोनों की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों साथ-साथ महान बल प्राप्त करें। हमारी पढ़ी हुई विद्या प्रकाशमान और प्रभावशाली हो, और हम कभी आपस में द्वेष न करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!
भृगुर्वै वारुणिः। वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तस्मा एतत्प्रोवाच। अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति। तं होवाचा। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ ३६ ॥
bhṛgurvai vāruṇiḥ| varuṇaṃ pitaramupasasāra| adhīhi bhagavo brahmeti| tasmā etatprovāca| annaṃ prāṇaṃ cakṣuḥ śrotraṃ mano vācamiti| taṃ hovācā| yato vā imāni bhūtāni jāyante| yena jātāni jīvanti| yatprayantyabhisaṃviśanti| tadvijijñāsasva| tad brahmeti| sa tapo'tapyata| sa tapastaptvā || 36 ||
वरुण के प्रसिद्ध पुत्र भृगु अपने पिता वरुण के पास गए और प्रार्थना की: 'हे पूज्यवर! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।' वरुण ने उनसे कहा: 'अन्न (शरीर), प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाणी — ये ब्रह्म प्राप्ति के साधन हैं।' फिर उनसे कहा: 'जिससे ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीवित रहते हैं, और अंत में प्रयाण करते हुए जिसमें लीन हो जाते हैं; तुम उसे जानने की इच्छा करो। वही ब्रह्म है।' भृगु ने तप किया। उन्होंने तप करके...
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात। अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाचा। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ ३७ ॥
annaṃ brahmeti vyajānāta| annāddhyeva khalvimāni bhūtāni jāyante| annena jātāni jīvanti| annaṃ prayantyabhisaṃviśantīti| tadvijñāya| punareva varuṇaṃ pitaramupasasāra| adhīhi bhagavo brahmeti| taṃ hovācā| tapasā brahma vijijñāsasva| tapo brahmeti| sa tapo'tapyata| sa tapastaptvā || 37 ||
उन्होंने जाना कि अन्न ही ब्रह्म है। क्योंकि अन्न से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर अन्न के सहारे जीते हैं, और अंत में अन्न में ही लीन हो जाते हैं। यह जानकर वे फिर अपने पिता वरुण के पास गए और बोले: 'हे पूज्यवर! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।' वरुण ने कहा: 'तप के द्वारा ब्रह्म को जानो, क्योंकि तप ही ब्रह्म है।' उन्होंने फिर तप किया। उन्होंने तप करके...
प्राणो ब्रह्मेति vyजानात। प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाचा। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ ३८ ॥
prāṇo brahmeti vyjānāta| prāṇāddhyeva khalvimāni bhūtāni jāyante| prāṇena jātāni jīvanti| prāṇaṃ prayantyabhisaṃviśantīti| tadvijñāya| punareva varuṇaṃ pitaramupasasāra| adhīhi bhagavo brahmeti| taṃ hovācā| tapasā brahma vijijñāsasva| tapo brahmeti| sa tapo'tapyata| sa tapastaptvā || 38 ||
उन्होंने जाना कि प्राण ही ब्रह्म है। क्योंकि प्राण से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर प्राण के सहारे जीते हैं, और प्रयाण करते हुए प्राण में ही विलीन हो जाते हैं। यह जानकर वे फिर अपने पिता वरुण के पास गए और बोले: 'हे पूज्यवर! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।' वरुण ने कहा: 'तप के द्वारा ब्रह्म को जानो, तप ही ब्रह्म है।' उन्होंने फिर तप किया। उन्होंने तप करके...
मनो ब्रह्मेति व्यजानात। मनसोद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। मनसा जातानि जीवन्ति। मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाचा। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ ३९ ॥
mano brahmeti vyajānāta| manasoddhyeva khalvimāni bhūtāni jāyante| manasā jātāni jīvanti| manaḥ prayantyabhisaṃviśantīti| tadvijñāya| punareva varuṇaṃ pitaramupasasāra| adhīhi bhagavo brahmeti| taṃ hovācā| tapasā brahma vijijñāsasva| tapo brahmeti| sa tapo'tapyata| sa tapastaptvā || 39 ||
उन्होंने जाना कि मन ही ब्रह्म है। क्योंकि मन से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मन के सहारे जीते हैं, और अंत में मन में ही विलीन हो जाते हैं। यह जानकर वे फिर अपने पिता वरुण के पास गए और बोले: 'हे पूज्यवर! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।' वरुण ने कहा: 'तप के द्वारा ब्रह्म को जानो, तप ही ब्रह्म है।' उन्होंने फिर तप किया। उन्होंने तप करके...
विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात। विज्ञानद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति। विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। तद्विज्ञाय। पुनरेव वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति। तं होवाचा। तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व। तपो ब्रह्मेति। स तपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा ॥ ४० ॥
vijñānaṃ brahmeti vyajānāta| vijñānaddhyeva khalvimāni bhūtāni jāyante| vijñānena jātāni jīvanti| vijñānaṃ prayantyabhisaṃviśantīti| tadvijñāya| punareva varuṇaṃ pitaramupasasāra| adhīhi bhagavo brahmeti| taṃ hovācā| tapasā brahma vijijñāsasva| tapo brahmeti| sa tapo'tapyata| sa tapastaptvā || 40 ||
उन्होंने जाना कि विज्ञान (बुद्धि) ही ब्रह्म है। क्योंकि बुद्धि से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर बुद्धि के सहारे जीते हैं, और अंत में बुद्धि में ही विलीन हो जाते हैं। यह जानकर वे फिर अपने पिता वरुण के पास गए और बोले: 'हे पूज्यवर! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।' वरुण ने कहा: 'तप के द्वारा ब्रह्म को जानो, तप ही ब्रह्म है।' उन्होंने फिर तप किया। उन्होंने तप करके...
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या। परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता। स य एवं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥ ४१ ॥
ānando brahmeti vyajānāta| ānandāddhyeva khalvimāni bhūtāni jāyante| ānandena jātāni jīvanti| ānandaṃ prayantyabhisaṃviśantīti| saiṣā bhārgavī vāruṇī vidyā| parame vyomanpratiṣṭhitā| sa ya evaṃ veda pratitiṣṭhati| annavānannādo bhavati| mahānbhavati prajayā paśubhirbrahmavarcasena| mahānkīrtyā || 41 ||
उन्होंने जाना कि आनंद ही ब्रह्म है। क्योंकि आनंद से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर आनंद के सहारे जीते हैं, और प्रयाण करते हुए आनंद में ही विलीन हो जाते हैं। यह भृगु द्वारा अनुभव की हुई और वरुण द्वारा उपदिष्ट की हुई 'भार्गवी वारुणी विद्या' है, जो हृदय के परम आकाश में प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, वह ब्रह्म में प्रतिष्ठित हो जाता है। वह प्रचुर अन्न वाला और अन्न भोक्ता बनता है; तथा वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज और कीर्ति से महान हो जाता है।
अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्। प्राणो वा अन्नम्। शरीरमन्नादम्। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥ ४२ ॥
annaṃ na nindyāt| tadvratam| prāṇo vā annam| śarīramannādam| prāṇe śarīraṃ pratiṣṭhitam| śarīre prāṇaḥ pratiṣṭhitaḥ| tadetadannamanne pratiṣṭhitam| sa ya etadannamanne pratiṣṭhitaṃ veda pratitiṣṭhati| annavānannādo bhavati| mahānbhavati prajayā paśubhirbrahmavarcasena| mahānkīrtyā || 42 ||
अन्न की निंदा न करना ही उसका व्रत होना चाहिए। प्राण ही अन्न है, और शरीर उसका भोक्ता है; क्योंकि प्राण शरीर के भीतर स्थित है। शरीर ही अन्न है और प्राण उसका भोक्ता है; क्योंकि शरीर प्राण के ऊपर आश्रित है। इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरे में प्रतिष्ठित अन्न ही हैं। जो मनुष्य इस रहस्य को जानता है, वह प्रतिष्ठित हो जाता है; वह प्रचुर अन्न वाला और महान बनता है।
अन्नं न परिचक्षीत। तद्व्रतम्। आपो वा अन्नम्। ज्योतिरन्नादम्। अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम्। ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥ ४३ ॥
annaṃ na paricakṣīta| tadvratam| āpo vā annam| jyotirannādam| apsu jyotiḥ pratiṣṭhitam| jyotiṣyāpaḥ pratiṣṭhitāḥ| tadetadannamanne pratiṣṭhitam| sa ya etadannamanne pratiṣṭhitaṃ veda pratitiṣṭhati| annavānannādo bhavati| mahānbhavati prajayā paśubhirbrahmavarcasena| mahānkīrtyā || 43 ||
अन्न का कभी परित्याग न करना ही उसका व्रत होना चाहिए। जल ही अन्न है, और तेज (अग्नि) उसका भोक्ता है; क्योंकि जल तेज पर आश्रित है। तेज ही अन्न है और जल उसका भोक्ता है; क्योंकि तेज जल के भीतर स्थित है। इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरे में प्रतिष्ठित अन्न हैं। जो इस रहस्य को जानता है, वह प्रतिष्ठित हो जाता है और महान कीर्ति पाता है।
अन्नं बहु कुर्वीत। तद्व्रतम्। पृथिवी वा अन्नम्। आकाशोऽन्नादः। पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः। आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति। अन्नवानन्नादो भवति। महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन। महान्कीर्त्या ॥ ४४ ॥
annaṃ bahu kurvīta| tadvratam| pṛthivī vā annam| ākāśo'nnādaḥ| pṛthivyāmākāśaḥ pratiṣṭhitaḥ| ākāśe pṛthivī pratiṣṭhitā| tadetadannamanne pratiṣṭhitam| sa ya etadannamanne pratiṣṭhitaṃ veda pratitiṣṭhati| annavānannādo bhavati| mahānbhavati prajayā paśubhirbrahmavarcasena| mahānkīrtyā || 44 ||
अन्न को प्रचुर मात्रा में उत्पन्न करना ही उसका व्रत होना चाहिए। पृथ्वी ही अन्न है, और आकाश उसका भोक्ता है; क्योंकि पृथ्वी आकाश में स्थित है। आकाश ही अन्न है और पृथ्वी उसकी भोक्ता है; क्योंकि आकाश पृथ्वी पर आश्रित है। इस प्रकार ये दोनों एक-दूसरे में प्रतिष्ठित अन्न हैं। जो इस रहस्य को जानता है, वह प्रतिष्ठित हो जाता है और महान बनता है।
न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत। तद्व्रतम्। तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात्। आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते ॥ ४५ ॥
na kañcana vasatau pratyācakṣīta| tadvratam| tasmādyayā kayā ca vidhayā bahvannaṃ prāpnuyāt| ārādhyasmā annamityācakṣate || 45 ||
अपने घर आए हुए किसी भी अतिथि को कभी शरण देने से मना न करना ही उसका व्रत होना चाहिए। इसलिए मनुष्य को जिस किसी भी न्यायपूर्ण उपाय से हो, प्रचुर अन्न का संग्रह करना चाहिए। ज्ञानी लोग कहते हैं: 'हमारे घर में अतिथि के लिए अन्न तैयार है।'
एतद्वै मुखतोऽन्नं राद्धम्। मुखतोऽस्मै अन्नं राध्यते। एतद्वै मध्यतोऽन्नं राद्धम्। मध्यतोऽस्मै अन्नं राध्यते। एतद्वै अन्ततोऽन्नं राद्धम्। अन्ततोऽस्मै अन्नं राध्यते। य एवं वेद ॥ ४६ ॥
etadvai mukhato'nnaṃ rāddham| mukhato'smai annaṃ rādhyate| etadvai madhyato'nnaṃ rāddham| madhyato'smai annaṃ rādhyate| etadvai antato'nnaṃ rāddham| antato'smai annaṃ rādhyate| ya evaṃ veda || 46 ||
जो मनुष्य पहले आदरपूर्वक अतिथि को अन्न प्रदान करता है, उसे उसकी युवावस्था में ही आदरपूर्वक अन्न प्राप्त होता है। जो मध्यकाल में सामान्य सत्कार से देता है, उसे सामान्य रूप से प्राप्त होता है। जो अंत में अनादरपूर्वक देता है, उसे बुढ़ापे में वैसे ही उपेक्षा से अन्न प्राप्त होता है। जो इस प्रकार दान की महिमा को जानता है, उसे ऐसा ही फल मिलता है।
क्षेम इति वाचि। योगक्षेम इति प्राणापानयोः। कर्मेति हस्तयोः। विहार इति पादयोः। विसर्ग इति पायौ। इति मानुषीः समाधाः ॥ ४७ ॥
kṣema iti vāci| yogakṣema iti prāṇāpānayoḥ| karmeti hastayoḥ| vihāra iti pādayoḥ| visarga iti pāyau| iti mānuṣīḥ samādhāḥ || 47 ||
ब्रह्म की उपासना वाणी में 'क्षेम' (रक्षा) रूप में की जाती है; प्राण और अपान में 'योगक्षेम' (अर्जन और रक्षा) रूप में; हाथों में 'कर्म' (कार्य शक्ति) रूप में; पैरों में 'विहार' (गति) रूप में; और गुदा में 'विसर्ग' (त्याग) रूप में की जाती है। ये मनुष्य के शरीर में होने वाली ब्रह्म की उपासनाएँ हैं।
अथ दैवीः। तृप्तिरिति वृष्टौ। तेज इति विद्युति। यश इति पशुषु। ज्योतिरिति नक्षत्रेषु। प्रजातिरमृतमानन्द इति उपस्थे। सर्वमित्याकाशे ॥ ४८ ॥
atha daivīḥ| tṛptiriti vṛṣṭau| teja iti vidyuti| yaśa iti paśuṣu| jyotiriti nakṣatreṣu| prajātiramṛtamānanda iti upasthe| sarvamityākāśe || 48 ||
अब दैवीय उपासनाएँ: वर्षा में 'तृप्ति' रूप में; बिजली में 'तेज' रूप में; पशुओं में 'यश' रूप में; नक्षत्रों में 'प्रकाश' रूप में; जननेंद्रिय में 'प्रजापति, अमृत (वंश की निरंतरता) और आनंद' रूप में; और आकाश में 'सब कुछ' (सर्वव्यापकता) रूप में ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए।
तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत। प्रतिष्ठावान्भवति। तन्महदुत्युपासीत। महान्भवति। तन्मन इत्युपासीत। मानवान्भवति। तन्नम इत्युपासीत। नम्यन्तेऽस्मै कामाः। तद्ब्रह्मेत्युपासीत। ब्रह्मवान्भवति। तद्ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत। पर्येण म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः। परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः ॥ ४९ ॥
tatpratiṣṭhetyupāsīta| pratiṣṭhāvānbhavati| tanmahadutyupāsīta| mahānbhavati| tanmana ityupāsīta| mānavānbhavati| tannama ityupāsīta| namyante'smai kāmāḥ| tadbrahmetyupāsīta| brahmavānbhavati| tadbrahmaṇaḥ parimara ityupāsīta| paryeṇa mriyante dviṣantaḥ sapatnāḥ| pari ye'priyā bhrātṛvyāḥ || 49 ||
उस ब्रह्म की 'प्रतिष्ठा' (आधार) रूप में उपासना करो, इससे मनुष्य स्वयं प्रतिष्ठित होता है। उसकी 'महान्' रूप में उपासना करो, इससे मनुष्य महान बनता है। उसकी 'मन' रूप में उपासना करो, इससे मनुष्य मननशील बनता है। उसकी 'नमन' रूप में उपासना करो, इससे सभी भोग्य पदार्थ उसके सामने झुक जाते हैं। उसकी 'ब्रह्म' रूप में उपासना करो, वह स्वयं ब्रह्ममय होता है। उसकी 'ब्रह्मणः परिमर' (विनाशक शक्ति) रूप में उपासना करो, इससे उसके सभी विरोधी और शत्रु नष्ट हो जाते हैं।
स यश्चायं पुरुषे। यश्चासावादित्ये। स एकः। स य एवंवित्। अस्माल्लोकात्प्रेत्य। एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति। इमान्लोकान्कामानी कामरूप्यनुसञ्चरन्। एतत्साम गायन्नास्ते। हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु। अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादोऽ ३ हमन्नादोऽ ३ हमन्नादः। अहंसश्लोककृदहंसश्लोककृदहंसश्लोककृत्। अहमस्मि प्रथमजा ऋता ३ स्य। पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य ना ३ भायि। यो मा ददाति स इदेव मा ३ वाः। अहमन्नमन्नमदन्तमा ३ द्मि। अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा ३ म्। सुवर्न ज्योतीः। य एवं वेद। इत्युपनिषत् ॥ ५० ॥
sa yaścāyaṃ puruṣe| yaścāsāvāditye| sa ekaḥ| sa ya evaṃvit| asmāllokātpretya| etamannamayamātmānamupasaṅkrāmati| etaṃ prāṇamayamātmānamupasaṅkrāmati| etaṃ manomayamātmānamupasaṅkrāmati| etaṃ vijñānamayamātmānamupasaṅkrāmati| etamānandamayamātmānamupasaṅkrāmati| imānlokānkāmānī kāmarūpyanusañcaran| etatsāma gāyannāste| hā 3 vu hā 3 vu hā 3 vu| ahamannamahamannamahamannam| ahamannādo' 3 hamannādo' 3 hamannādaḥ| ahaṃsaślokakṛdahaṃsaślokakṛdahaṃsaślokakṛt| ahamasmi prathamajā ṛtā 3 sya| pūrvaṃ devebhyo amṛtasya nā 3 bhāyi| yo mā dadāti sa ideva mā 3 vāḥ| ahamannamannamadantamā 3 dmi| ahaṃ viśvaṃ bhuvanamabhyabhavā 3 m| suvarna jyotīḥ| ya evaṃ veda| ityupaniṣat || 50 ||
जो मनुष्य में है और जो सूर्य में है, वह एक ही है। जो मनुष्य इस सत्य को जानता है, वह मृत्यु के बाद इस स्थूल जगत से ऊपर उठकर अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और अंततः आनंदमय आत्मा को प्राप्त करता है। वह अपनी इच्छा के अनुसार अन्न और रूप धारण करके इन लोकों में विचरता हुआ इस साम-गान को गाता है: 'हा-ऊ! हा-ऊ! हा-ऊ! मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ! मैं अन्न का भोक्ता हूँ, मैं अन्न का भोक्ता हूँ, मैं अन्न का भोक्ता हूँ! मैं इन दोनों को मिलाने वाला कर्ता हूँ! मैं इस सृष्टि का प्रथम उत्पन्न सत्य (हिरण्यगर्भ) हूँ। मैं देवताओं से भी पहले प्रकट हुआ अमरता का केंद्र हूँ। जो मुझे दान देता है, वह मेरी रक्षा करता है। मैं अन्न रूप होकर अन्न न देने वाले को खा जाता हूँ। मैं संपूर्ण ब्रह्मांड को व्याप्त करता हूँ। मेरी ज्योति सूर्य के समान प्रकाशमान है।' जो इस प्रकार जानता है, यही परम सत्य है। यही उपनिषद् है।
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
oṃ saha nāvavatu| saha nau bhunaktu| saha vīryaṃ karavāvahai| tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai|| oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||
परमेश्वर हम दोनों की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों का साथ-साथ पालन-पोषण करें। हम दोनों साथ-साथ महान बल प्राप्त करें। हमारी पढ़ी हुई विद्या प्रकाशमान और प्रभावशाली हो, और हम कभी आपस में द्वेष न करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!
पठन और मनन सम्पूर्ण
आपने श्री तैत्तिरीयोपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।