श्री सूक्तम् (ऋग्वेद)
लक्ष्मीजी
श्री सूक्तम् (ऋग्वेद)
ऋग्वेद से संकलित माता लक्ष्मी की आराधना का सबसे प्राचीन और वैदिक सूक्त, जो घर में धन, अन्न और समृद्धि लाता है।
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
Hiraṇyavarṇāṁ Hariṇīṁ Suvarṇarajatasrajām | Candrāṁ Hiraṇmayīṁ Lakṣmīṁ Jātavēdō Ma Āvaha ||
हे जातवेदा (अग्निदेव)! सोने के समान पीले रंग वाली, हिरण के समान चंचल, सोने और चाँदी के आभूषणों से सजी हुई, चंद्रमा के समान प्रकाशमान और सोने के समान चमकने वाली महालक्ष्मी को मेरे घर बुलाएं।
ता म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्॥
Tā Ma Āvaha Jātavēdō Lakṣmīmanapagāminīm | Yasyāṁ Hiraṇyaṁ Vindēyaṁ Gāmaśvaṁ Puruṣānaham ||
हे अग्निदेव! आप मुझे वह कभी न नष्ट होने वाली (स्थिर) लक्ष्मी प्रदान करें, जिसके प्रभाव से मैं सोना, गायें, घोड़े और सेवक-पुत्र आदि सुख प्राप्त करूँ।
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम्। श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषताम्॥
Aśvapūrvāṁ Rathamadhyāṁ Hastinādaprabōdhinīm | Śriyaṁ Dēvīmupahvayē Śrīrmā Dēvī Juṣatām ||
जिनके आगे घोड़े चलते हैं, जिनके मध्य में रथ हैं, और जो हाथियों के चिंघाड़ने (नाद) से जाग्रत होने वाली हैं, उन दिव्य लक्ष्मी देवी का मैं आह्वान करता हूँ। वे लक्ष्मीजी मुझ पर प्रसन्न हों।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्। पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
Kāṁ Sōsmitāṁ Hiraṇyaprākārāmārdrāṁ Jvalantīṁ Tṛptāṁ Tarpayantīm | Padmē Sthitāṁ Padmavarṇāṁ Tāmihōpahvayē Śriyam ||
जो मन्द मुस्कान वाली हैं, सोने की चहारदीवारी के समान कांतिमान हैं, दया से आर्द्र हृदय वाली हैं, जाज्वल्यमान हैं, स्वयं संतुष्ट हैं और भक्तों को संतुष्ट करने वाली हैं, जो कमल पर विराजमान हैं और कमल के समान रंग वाली हैं, उन लक्ष्मीजी को मैं यहाँ बुलाता हूँ।
स्तोत्र पाठ सम्पूर्ण
आपने श्री सूक्तम् (ऋग्वेद) का पाठ पूर्ण किया। लक्ष्मीजी की कृपा आप पर सदा बनी रहे।