Shiva Tandava Stotra

Lord Shiva

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Lord Shiva

Shiva Tandava Stotra

A powerful, rhythmic hymn composed by Ravana describing Lord Shiva's divine and cosmic dance of destruction.

Best Occasion:Monday, Mahashivratri
Blessings:Removal of fear, strength, energy
Shloka 1

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥

Jaṭāṭavī-Galaj-Jala-Pravāha-Pāvita-Sthale Gale'valambya Lambitāṁ Bhujanga-Tunga-Mālikām | Ḍamaḍ-Ḍamaḍ-Ḍamaḍ-Ḍaman-Ninādavad-Ḍamarvayaṁ Cakāra Caṇḍa-Tāṇḍavaṁ Tanōtu Naḥ Śivaḥ Śivam ||

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जिनकी जटारूपी सघन वन से निकलती हुई गंगाजी के जल-प्रवाह से जिनका कंठ-प्रदेश पवित्र है, जिन्होंने गले में साँपों की विशाल माला लटकाई हुई है और जो डमरू की डम-डम ध्वनि के साथ अलौकिक तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे कल्याणकारी भगवान शिव हमारा कल्याण करें।

Shloka 2

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि। धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

Jaṭā-Kaṭāha-Sambhrama-Bhraman-Nilimpa-Nirjharī Vilōla-Vīci-Vallarī-Virājamāna-Mūrdhani | Dhagad-Dhagad-Dhagaj-Jvalal-Lalāṭa-Paṭṭa-Pāvake Kiśōra-Candra-Śēkhare Ratiḥ Pratikṣaṇaṁ Mama ||

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जिनकी जटाओं के घूमते हुए विशाल भँवर में देव-नदी गंगा की चंचल लहरें क्रीड़ा कर रही हैं, जिनके मस्तक पर बाल-चंद्रमा विराजमान हैं और जिनके ललाट (माथे) पर धधक-धधक कर अग्नि जल रही है, उन चंद्रभूषण भगवान शिव में मेरी प्रतिक्षण प्रीति बनी रहे।

Shloka 3

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिममोदमानमानसे। कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥

Dharā-Dharēndra-Nandinī-Vilāsa-Bandhu-Bandhura- Sphurad-Diganta-Santatim-Amōdamāna-Mānase | Kṛpā-Kaṭākṣa-Dhōraṇī-Niruddha-Durdharāpadi Kvacid-Digambare Manō Vinōdamētu Vastuni ||

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जो पर्वतराजकुमारी माता पार्वती के विलासपूर्ण कटाक्षों के परम साथी हैं, जिनका मन समस्त दिशाओं के प्राणियों को प्रसन्न देखकर आनंदित होता है, जिनकी कृपादृष्टि से बड़ी से बड़ी आपदाएं भी रुक जाती हैं, ऐसे दिगम्बर (आकाश ही जिनका वस्त्र है) शिवजी में मेरा मन आनंद पाए।

Shloka 4

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे। मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥

Jaṭā-Bhujanga-Pingala-Sphurat-Phaṇā-Maṇi-Prabhā- Kadamba-Kunkuma-Drava-Pralipta-Digvadhū-Mukhe | Madāndha-Sindhura-Sphurat-Tvagu-Ttarīya-Medure Manō Vinōdam-Adbhuṭaṁ Bibhartu Bhūta-Bhartari ||

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जिनकी जटाओं में लिपटे हुए साँपों के मणियों की पीली चमक से दिशाओं के मुख कुमकुम के लेप की तरह चमक रहे हैं, जो मदमत्त हाथी की चमड़ी को चादर के रूप में ओढ़े हुए हैं, उन समस्त भूतों के रक्षक परमेश्वर में मेरा मन अद्भुत आनंद का अनुभव करे।

Shloka 5

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः। भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥

Sahasra-Lōcana-Prabhṛty-Aśēṣa-Lēkha-Śēkhara- Prasūna-Dhūli-Dhōraṇī-Vidhūsarānghri-Pīṭha-Bhūḥ | Bhujanga-Rāja-Mālayā Nibaddha-Jāṭa-Jūṭakaḥ Śriyai Cirāya Jāyatāṁ Cakōra-Bandhu-Śēkharaḥ ||

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इंद्र आदि सभी देवताओं के मुकुटों के फूलों की धूल से जिनके चरणकमल धूसरित (पवित्र) हैं, जिन्होंने अपनी जटाओं को नागराज वासुकी की माला से बाँधा हुआ है और जिनके मस्तक पर चंद्रमा (चकोर के बंधु) सुशोभित हैं, वे भगवान शिव हमें दीर्घकाल तक के लिए लक्ष्मी और ऐश्वर्य प्रदान करें।

Shloka 6

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्। सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः॥

Lalāṭa-Catvara-Jvalad-Dhanañjaya-Sphulinga-Bhā- Nipīta-Pañca-Sāyakaṁ Naman-Nilimpa-Nāyakam | Sudhā-Mayūkha-Lēkhayā Virājamāna-Śēkharaṁ Mahā-Kapāli-Sampadē-Śirōja-Ṭālam-Astu Naḥ ||

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जिन्होंने अपने ललाट पर जलने वाली अग्नि की चिंगारियों से कामदेव को भस्म कर दिया था, जिन्हें इंद्र शीश झुकाते हैं, जो अमृतमयी किरणों वाले चंद्रमा से सुशोभित हैं, वे महाकपालधारी शिवजी हमें अपनी आध्यात्मिक संपदा प्रदान करें।

Shloka 7

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके। धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचने रतिर्मम॥

Karāla-Bhāla-Paṭṭikā-Dhagad-Dhagad-Dhagaj-Jvalad- Dhanañjayā-Hutīkṛta-Pracaṇḍa-Pañca-Sāyake | Dharā-Dharēndra-Nandinī-Kucāgra-Citra-Patraka- Prakalpanai-Ka-Śilpini Trilōcane Ratir-Mama ||

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जिन्होंने अपने भयंकर ललाट पर धधकने वाली अग्नि में कामदेव की आहुति दे दी थी और जो माता पार्वती के मुखमंडल पर सुंदर चित्रकारी (श्रृंगार) करने वाले एकमात्र कलाकार हैं, उन त्रिनेत्रधारी शिवजी में मेरी गहरी आस्था बनी रहे।

Shloka 8

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः। निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥

Navīna-Mēgha-Maṇdalī-Niruddha-Durdhara-Sphurat- Kuhū-Niśīthinī-Tamaḥ-Prabandha-Baddha-Kandharaḥ | Nilimpa-Nirjharī-Dharas-Tanōtu Kṛtti-Sindhuraḥ Kalā-Nidhāna-Bandhuraḥ Śriyaṁ Jagad-Dhurandharaḥ ||

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जिनका कंठ नवीन मेघों से ढकी हुई अमावस्या की आधी रात के अंधकार की तरह गहरा काला है, जो गंगाजी को धारण करते हैं, जो हाथी की खाल पहनते हैं और जो इस ब्रह्मांड का भार उठाते हैं, वे चंद्रमा रूपी कलाओं के स्वामी हमें भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करें।

Shloka 9

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा- वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्। स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदन्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥

Prafulla-Nīla-Pankaja-Prapañca-Kālima-Prabhā- Valambi-Kanṭha-Kandalī-Ruci-Prabaddha-Kandharam | Smara-Cchidaṁ Pura-Cchidaṁ Bhava-Cchidaṁ Makha-Cchidaṁ Gaja-Cchidaṁ Andhaka-Cchidaṁ Tam-Antaka-Cchidaṁ Bhajē ||

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जिनके कंठ की कांति खिले हुए नीले कमलों के समान सुंदर और नीली है, जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, सांसारिक बंधनों, राजा दक्ष के यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और स्वयं यमराज का विनाश किया था, उन मृत्युंजय शिव का मैं भजन करता हूँ।

Shloka 10

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी- रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्। स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥

Akharva-Sarva-Mangalā-Kalā-Kadamba-Mañjarī- Rasa-Pravāha-Mādhurī-Vijṛmbhaṇā-Madhuvratam | Smarāntakaṁ Purāntakaṁ Bhavāntakaṁ Makhāntakaṁ Gajāntakāndhakāntakaṁ Tam-Antakāntakāṁ Bhajē ||

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जो माता पार्वती के कल्याणकारी गुणों और कलाओं के मधुर रसपान करने वाले भँवरे के समान हैं, जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, जन्म-मरण के चक्र, यज्ञ, गजासुर और यमराज का अंत किया है, उन यमराज के भी अंतक (विनाशक) शिवजी को मैं भजता हूँ।

Shloka 11

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्। धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥

Jayat-Vadabhra-Vibhrama-Bhramad-Bhujangama-Śvasa- Dvinirgamat-Krama-Sphurat-Karāla-Bhāla-Havyavāṭ | Dhimidh-Dhimidh-Dhimidh-Dhvanan-Mṛdanga-Tunga-Mangala- Dhvani-Krama-Pravartita-Pracaṇḍa-Tāṇḍavaḥ Śivaḥ ||

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जिनके मस्तक पर फुफकारते हुए साँपों की सांसों से ललाट की अग्नि धधक रही है, और जो मृदंग की धिमि-धिमि, ढोल-नगाड़ों की मंगलकारी ध्वनि पर परम प्रचण्ड तांडव नृत्य कर रहे हैं, उन देवाधिदेव शिव की जय हो।

Shloka 12

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः। तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥

Dṛṣad-Vicitra-Talpayōr-Bhujanga-Mauktika-Srajōr- Gariṣṭha-Ratna-Lōṣṭhayōḥ Suhṛd-Vipakṣa-Pakṣayōḥ | Tṛṇāravinda-Cakṣuṣōḥ Prajā-Mahī-Mahēndrayōḥ Sama-Pravṛttikaḥ Kadā Sadāśivaṁ Bhajāmyaham ||

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कठोर पत्थर और कोमल शय्या, साँप और मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न और मिट्टी के ढेले, मित्र और शत्रु, तिनका और कमल जैसी आँखों वाली सुंदर स्त्री, प्रजा और महाराज में समान भाव रखता हुआ, मैं कब सदाशिव को भजूँगा (अर्थात कब मुझे समत्व बुद्धि प्राप्त होगी)?

Shloka 13

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्। विमुक्तलोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥

Kadā Nilimpa-Nirjarī-Nikuiñja-Kōṭare Vasan Vimukta-Durmatiḥ Sadā Śiraḥstham-Añjaliṁ Vahan | Vimukta-Lōcanō Lalāma-Bhāla-Lagnakaḥ Śivēti Mantram-Uccaran Kadā Sukhī Bhavāmyaham ||

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गंगाजी के किनारे गुफाओं में निवास करते हुए, अपने बुरे विचारों को त्यागकर, अपने सिर पर अंजलि (हाथ जोड़कर) रखे हुए, शिवजी के ध्यान में मग्न होकर 'शिव' मंत्र का उच्चारण करते हुए मैं कब परम सुख को प्राप्त करूँगा?

Shloka 14

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्। हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥

Imaṁ Hi Nityam-Ēvam-Uktam-Uttamōttamaṁ Stavaṁ Paṭhan-Smaran-Bruvannarō Viśuddhim-Ēti-Santatam | Hare Gurau Subhaktim-Āśu Yāti Nānyathā Gatiṁ Vimōhanaṁ Hi Dēhināṁ Suśaṅkarasya Cintanam ||

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जो भी मनुष्य इस उत्तम से उत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, स्मरण करता है या कीर्तन करता है, वह सदा पवित्र रहता है। भगवान गुरु शिव में उसकी पराभक्ति बनी रहती है और वह मोक्ष को प्राप्त करता है, क्योंकि शिव का चिंतन ही प्राणियों के मोह-जाल को नष्ट करने वाला है।

Phalashruti 15

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे। तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः॥

Pūjā-Vasāna-Samayē Daśavaktra-Gītaṁ Yah Śambhu-Pūjana-Paraṁ Paṭhati Prōdōṣē | Tasya Sthirāṁ Ratha-Gajēndra-Turanga-Yuktāṁ Lakṣmīṁ Sadaiva Sumukhīṁ Pradadāti Śambhuḥ ||

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पूजा की समाप्ति पर प्रदोष काल (संध्या समय) में रावण द्वारा रचित इस स्तोत्र का जो पाठ करता है, भगवान शिव उसे रथ, हाथी और घोड़ों से युक्त स्थिर लक्ष्मी (ऐश्वर्य) प्रदान करते हैं।

Lord Shiva

Recitation Completed

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