श्री कठोपनिषद्

Katha Upanishad • कृष्ण यजुर्वेद

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कृष्ण यजुर्वेद

श्री कठोपनिषद्

बालक नचिकेता और यमराज के बीच संवाद के रूप में एक परम लोकप्रिय उपनिषद जो श्रेयस (कल्याण) और प्रेयस (भोग) का अंतर समझाता है।

अवसर: आत्म-चिंतन, मृत्यु-रहस्य विमर्श (Self-Reflection, Spiritual Awakening)
लाभ: मृत्यु के रहस्य और आत्मा की अमरता का बोध (Understanding the mystery of death and immortality of soul)
शांति पाठ

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om saha nāvavatu | saha nau bhunaktu | saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

💡

हे परमात्मा! आप हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ मिलकर पुरुषार्थ और सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारी पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी हो, और हम आपस में कभी द्वेष न करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

मंत्र 2

उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस॥१॥

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uśan ha vai vājaśravasaḥ sarvavedasaṃ dadau | tasya ha naciketā nāma putra āsa || 1 ||

💡

फल की कामना से वाजश्रवा (ऋषि गौतम) ने 'विश्वजित' यज्ञ किया, जिसमें उन्होंने अपना सर्वस्व दान कर दिया। उनका 'नचिकेता' नाम का एक पुत्र था।

मंत्र 3

तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत॥२॥

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taṃ ha kumāraṃ santaṃ dakṣiṇāsu nīyamānāsu śraddhā''viveśa so'manyata || 2 ||

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जब दक्षिणा के रूप में दी जाने वाली अनुपयोगी वस्तुएं (गायें) ले जाई जा रही थीं, तब बालक नचिकेता के मन में श्रद्धा का आवेश (उदय) हुआ और उसने विचार किया।

मंत्र 4

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः। अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्॥३॥

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pītodakā jagdhatṛṇā dugdhadohā nirindriyāḥ | anandā nāma te lokāstān sa gacchati tā dadat || 3 ||

💡

जो गायें जल पी चुकी हैं, घास खा चुकी हैं, जिनका दूध दूहा जा चुका है और जो अब बच्चे देने में असमर्थ हो चुकी हैं, ऐसी अशक्त गायों का दान करने वाला व्यक्ति आनन्दहीन लोकों (दुखद गतियों) में जाता है।

मंत्र 5

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तं होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति॥४॥

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sa hovāca pitaraṃ tata kasmai māṃ dāsyasīti | dvītīyaṃ tṛtīyaṃ taṃ hovāca mṛtyave tvā dadāmīति || 4 ||

💡

नचिकेता ने अपने पिता से पूछा, 'हे पिता! आप मुझे किसको दान करेंगे?' जब उसने दूसरी और तीसरी बार यही पूछा, तब पिता ने क्रोधित होकर कहा, 'मैं तुम्हें मृत्यु (यमराज) को देता हूँ।'

मंत्र 6

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः। किं स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति॥५॥

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bahūnām-emi prathamo bahūnām-emi madhyamaḥ | kiṃ svid-yamasya kartavyaṃ yan-mayādya kariṣyati || 5 ||

💡

नचिकेता ने सोचा, 'मैं शिष्यों और पुत्रों में बहुतों से उत्तम आचरण वाला हूँ और बहुतों के समान मध्यम हूँ। यमराज का ऐसा क्या काम है जो पिताजी मेरे द्वारा आज कराना चाहते हैं?'

मंत्र 7

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथा परे। सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः॥६॥

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anupaśya yathā pūrve pratipaśya tathā pare | sasyamiva martyaḥ pacyate sasyam-ivājāyate punaḥ || 6 ||

💡

नचिकेता ने पिता से कहा, 'आप पूर्वजों के आचरण को देखिए और वर्तमान के धर्मात्माओं के व्यवहार को देखिए। मनुष्य खेत में अन्न के समान पकता (नष्ट होता) है और अन्न के समान ही पुनः उत्पन्न होता है (अतः सत्य का पालन करते हुए मुझे यमराज के पास जाने दें)।'

मंत्र 8

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्। तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्॥७॥

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vaiśvānaraḥ praviśaty-atithir-brāhmaṇo gṛhān | tasyaitāṃ śāntiṃ kurvanti hara vaivasvatodakam || 7 ||

💡

नचिकेता यमलोक गया। यमराज के तीन दिन अनुपस्थित रहने के बाद, यम के सेवकों ने कहा— 'ब्राह्मण अतिथि घर में साक्षात अग्नि रूप में प्रवेश करता है। उसे शांत करने के लिए गृहस्थ जल आदि से उसकी सेवा करते हैं। हे यमराज! आप भी जल लेकर आइए।'

मंत्र 9

आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सुनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान्। एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे॥८॥

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āśā-pratīkṣe saṅgataṃ sūnṛtāṃ ceṣṭā-pūrte putra-paśūṃś-ca sarvān | etad-vṛṅkte puruṣasyālpa-medhaso yasyānaśnan-vasati brāhmaṇo gṛhe || 8 ||

💡

जिस घर में ब्राह्मण अतिथि बिना भोजन किए रहता है, उस कम बुद्धि वाले गृहस्थ की सभी आशाएं, प्रतीक्षाएं, सत्संग का फल, प्रिय वाणी का फल, यज्ञ-दान के फल, तथा पुत्र और पशु आदि सब नष्ट हो जाते हैं।

मंत्र 10

तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः। नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन् वरान्वृणीष्व॥९॥

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tisro rātrīr-yadavātsīr-gṛhe me'naśnan brahmann-atithir-namasyaḥ | namaste'stu brahman svasti me'stu tasmāt-prati trīn varān-vṛṇīṣva || 9 ||

💡

यमराज ने नचिकेता से कहा— 'हे ब्राह्मण! तुम पूजनीय अतिथि हो और मेरे घर में तीन रात बिना भोजन किए रहे हो। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ, मेरा कल्याण हो। इसके बदले में तुम मुझसे तीन वरदान मांग लो।'

मंत्र 11

शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो। त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥१०॥

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śānta-saṅkalpaḥ sumanā yathā syād-vīta-manyur-gautamo mā'bhi mṛtyo | tvat-prasṛṣṭaṃ mā'bhivadet-pratīta etat-trayāṇāṃ prathamaṃ varaṃ vṛṇe || 10 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'हे मृत्युदेव! मेरे पिता गौतम (वाजश्रवा) का क्रोध शांत हो जाए, वे मेरे प्रति प्रसन्न मन वाले हो जाएं, और आपके द्वारा मुक्त किए जाने पर जब मैं घर लौटूं, तो वे मुझे पहचान लें और स्नेहपूर्वक बात करें। तीन वरों में से यह मैं पहला वर मांगता हूँ।'

मंत्र 12

यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिः मत्प्रसृष्टः। सुखं रात्रीः शययिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम्॥११॥

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yathā purastād bhavitā pratīta auddālakir-āruṇiḥ mat-prasṛṣṭaḥ | sukhaṃ rātrīḥ śayayitā vīta-manyus-tvāṃ dadṛśivān-mṛtyu-mukhāt-pramuktam || 11 ||

💡

यमराज ने कहा— 'मेरी अनुमति से आरुणि के पुत्र उद्दालक (तुम्हारे पिता) पूर्ववत ही तुम्हें पहचान लेंगे। तुम्हें मृत्यु के मुख से मुक्त हुआ देखकर वे शांत-क्रोध हो जाएंगे और सुखपूर्वक रात्रि में शयन करेंगे।'

मंत्र 13

स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति। उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥१२॥

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svarge loke na bhayaṃ kiñcanāsti na tatra tvaṃ na jarayā bibheti | ubhe tīrtvā'śanāyā-pipāse śokātigo modate svargaloke || 12 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'स्वर्गलोक में किसी प्रकार का भय नहीं है, वहाँ आप (मृत्यु) भी नहीं हैं, और बुढ़ापे का भी भय नहीं है। भूख और प्यास दोनों को पार करके, शोक से रहित होकर मनुष्य स्वर्गलोक में आनंदित होता है।'

मंत्र 14

स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम्। स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण॥१३॥

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sa tvam-agniṃ svargyam-adhyeṣi mṛtyo prabrūhi taṃ śraddadhānāya mahyam | svargalokā amṛtatvaṃ bhajanta etad-dvitīyena vṛṇe vareṇa || 13 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'हे मृत्युदेव! आप स्वर्ग प्रदान करने वाली अग्नि (यज्ञ विद्या) को जानते हैं। मुझ श्रद्धालु को आप उस विद्या का उपदेश दीजिए, जिसके द्वारा स्वर्गवासी अमृतत्व (देवत्व) भोगते हैं। यह मैं दूसरे वरदान के रूप में मांगता हूँ।'

मंत्र 15

प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन्। अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम्॥१४॥

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pra te bravīmi tadu me nibodha svargyam-agniṃ naciketaḥ prajānan | anantalokāptim-atho pratiṣṭhāṃ viddhi tvam-etaṃ nihitaṃ guhāyām || 14 ||

💡

यमराज ने कहा— 'हे नचिकेता! मैं भली-भांति जानता हूँ और तुम्हें उस स्वर्ग प्रदान करने वाली अग्नि का उपदेश देता हूँ, उसे ध्यान से सुनो। यह अग्नि अनंत लोकों की प्राप्ति का साधन है, संपूर्ण जगत का आधार है, और बुद्धि रूपी गुहा में स्थित है।'

मंत्र 16

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा। स चापि तद्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः॥१५॥

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lokādim-agniṃ tam-uvāca tasmai yā iṣṭakā yāvatīrvā yathā vā | sa cāpi tad-pratyavadad-yathoktam-athāsya mṛtyuḥ punar-evāha tuṣṭaḥ || 15 ||

💡

यमराज ने नचिकेता को सृष्टि के आदि कारण रूप उस अग्नि विद्या का उपदेश दिया— यज्ञ के लिए जैसी ईंटें होनी चाहिए, जितनी संख्या में होनी चाहिए, और जिस प्रकार चयन होना चाहिए। नचिकेता ने भी यमराज के उपदेश को उसी प्रकार दुहरा दिया। तब मृत्युदेव अत्यंत संतुष्ट होकर पुनः बोले।

मंत्र 17

तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः। तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण॥१६॥

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tam-abravīt-prīyamāṇo mahātmā varaṃ tavehādya dadāmi bhūyaḥ | tavaiva nāmnā bhavitā'yam-agniḥ sṛṅkāṃ cemām-anekarūpāṃ gṛhāṇa || 16 ||

💡

प्रसन्न होते हुए महात्मा यमराज ने नचिकेता से कहा— 'मैं आज तुम्हें एक और वरदान देता हूँ। यह स्वर्ग प्रदायक अग्नि अब तुम्हारे ही नाम से "नाचिकेत अग्नि" कहलाएगी। और तुम इस अनेक रूपों वाली सुंदर रत्नमाला (सृङ्का) को भी स्वीकार करो।'

मंत्र 18

त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू। ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति॥१७॥

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triṇāciketas-tribhir-etya sandhiṃ trikarmakṛt-tarati janma-mṛtyū | brahmajajñaṃ devam-īḍyaṃ viditvā nicāyyemāṃ śāntim-atyantam-eti || 17 ||

💡

जो तीन बार नाचिकेत यज्ञ करता है, माता-पिता-आचार्य इन तीनों से संबंध जोड़कर यज्ञ, अध्ययन और दान रूपी तीन कर्म करता है, वह जन्म और मृत्यु को पार कर जाता है। वह ब्रह्म से उत्पन्न, सर्वज्ञ, पूजनीय देव (अग्नि) को जानकर और उसका साक्षात्कार करके परम शांति को प्राप्त करता है।

मंत्र 19

त्रियमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम्। स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके॥१८॥

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triyam-etad-viditvā ya evaṃ vidvāṃś-cinute nāciketam | sa mṛtyupāśān purataḥ praṇodya śokātigo modate svargaloke || 18 ||

💡

जो पुरुष इन तीनों (ईंटों के स्वरूप, संख्या, विधि) को जानकर नाचिकेत अग्नि का चयन करता है, वह मृत्यु के पाशों को पहले ही काटकर, शोक से रहित होकर स्वर्गलोक में आनंदित होता है।

मंत्र 20

एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण। एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व॥१९॥

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eṣa te'gnir-naciketaḥ svargyo yam-avṛṇīthā dvitīyena vareṇa | etam-agniṃ tavaiva pravakṣyanti janāsas-tṛtīyaṃ varaṃ naciketo vṛṇīṣva || 19 ||

💡

यमराज ने कहा— 'हे नचिकेता! यह तुम्हारी वह स्वर्ग प्रदायक अग्नि है, जिसे तुमने दूसरे वरदान के रूप में मांगा था। भविष्य में लोग इस अग्नि को तुम्हारे ही नाम से कहेंगे। अब, हे नचिकेता! तुम तीसरा वर मांग लो।'

मंत्र 21

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष तृतीयो वरः॥२०॥

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yeyaṃ prete vicikitsā manuṣye'stīty-eke nāyam-astīti caike | etad-vidyām-anuśiṣtas-tvayā'haṃ varāṇām-eṣa tṛtīyo varaḥ || 20 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'मनुष्य की मृत्यु के बाद जो यह संशय बना रहता है कि— "कोई कहता है कि आत्मा बचती है और कोई कहता है कि कुछ नहीं बचता"। आपके द्वारा उपदिष्ट होकर मैं इस सत्य को जानना चाहता हूँ। वरों में से यह मेरा तीसरा वर है।'

मंत्र 22

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥२१॥

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devair-atrāpi vicikitsitaṃ purā na hi suvijñeyam-aṇur-eṣa dharmaḥ | anyan-varaṃ naciketo vṛṇīṣva mā moparotsīr-ati mā sṛjainam || 21 ||

💡

यमराज ने कहा— 'इस विषय में पहले देवताओं ने भी संदेह किया था। यह ज्ञान सुगम नहीं है, क्योंकि यह धर्म अत्यंत सूक्ष्म है। हे नचिकेता! तुम कोई दूसरा वरदान मांग लो, मुझ पर इस वर के लिए दबाव मत डालो, मुझे इससे मुक्त करो।'

मंत्र 23

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल यत्त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ। वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥२२॥

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devair-atrāpi vicikitsitaṃ kila yat-tvaṃ ca mṛtyo yanna sujñeyam-āttha | vaktā cāsya tvādṛg-anyo na labhyo nānyo varas-tulya etasya kaścit || 22 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'हे मृत्युदेव! निश्चय ही देवताओं ने भी इसमें संदेह किया था, और आप स्वयं कहते हैं कि यह सुगम नहीं है। इस विषय को समझाने वाला आपके जैसा कोई दूसरा वक्ता नहीं मिल सकता, और इसके समान कोई दूसरा वरदान भी नहीं हो सकता।'

मंत्र 24

शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान्। भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदः यावदिच्छसि॥२३॥

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śatāyuṣaḥ putra-pautrān-vṛṇīṣva bahūn paśūn hasti-hiraṇyam-aśvān | bhūmer-mahad-āyatanaṃ vṛṇīṣva svayaṃ ca jīva śaradaḥ yāvad-icchasi || 23 ||

💡

यमराज ने प्रलोभन देते हुए कहा— 'तुम सौ वर्ष जीने वाले पुत्र और पौत्र मांग लो, बहुत से पशु, हाथी, सोना और घोड़े मांग लो। पृथ्वी का बहुत बड़ा साम्राज्य मांग लो और स्वयं जितने वर्ष चाहो उतने वर्ष जीवित रहो।'

मंत्र 25

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतास्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमी॥२४॥

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etat-tulyaṃ yadi manyase varaṃ vṛṇīṣva vittaṃ cirajīvikāṃ ca | mahābhūmau naciketas-tvam-edhi kāmānāṃ tvā kāmabhājaṃ karomī || 24 ||

💡

यमराज ने कहा— 'यदि तुम इसके समान कोई दूसरा वर मांगना चाहो, तो अपरिमित धन और लंबी आयु मांग लो। हे नचिकेता! इस विशाल भूमि पर तुम राजा बनो। मैं तुम्हें संपूर्ण सांसारिक कामनाओं का स्वामी बनाता हूँ।'

मंत्र 26

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व। इमा रामाः सरथाः सतू्र्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः। आभिर्मत्प्रसृष्टाभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः॥२५॥

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ye ye kāmā durlabhā martyaloke sarvān kāmāñ-chandataḥ prārthayasva | imā rāmāḥ sarathāḥ satūryā na hīdṛśā lambhanīyā manuṣyaiḥ | ābhir-mat-prasṛṣṭābhiḥ paricārayasva naciketo maraṇaṃ mā'nuprākṣīḥ || 25 ||

💡

यमराज ने कहा— 'मर्त्यलोक में जो-जो भोग अत्यंत दुर्लभ हैं, उन सभी कामनाओं को अपनी इच्छा अनुसार मांग लो। रथ और बाजों के साथ ये सुंदर अप्सराएं, जो मनुष्यों को प्राप्त नहीं हो सकतीं, मेरे द्वारा दी जा रही हैं। इनसे तुम अपनी सेवा कराओ, परंतु हे नचिकेता! मृत्यु के रहस्य के विषय में मत पूछो।'

मंत्र 27

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः। अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते॥२६॥

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śvobhāvā martyasya yad-antakaitat sarvendriyāṇāṃ jarayanti tejaḥ | api sarvaṃ jīvitam-alpameva tavaiva vāhās-tava nṛtya-gīte || 26 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'हे अंतक (यमराज)! ये सब भोग कल रहने वाले नहीं हैं (क्षणिक हैं)। ये मनुष्य की समस्त इंद्रियों के तेज को नष्ट कर देते हैं। संपूर्ण जीवन भी बहुत छोटा है। ये आपके रथ, घोड़े, और ये नृत्य-गीत आपके ही पास रहें (मुझे इनकी आवश्यकता नहीं है)।'

मंत्र 28

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा। जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव॥२७॥

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na vittena tarpaṇīyo manuṣyo lapsyāmahe vittam-adrākṣma cettvā | jīviṣyāmo yāvad-īśiṣyasi tvaṃ varastu me varaṇīyaḥ sa eva || 27 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'मनुष्य धन से कभी तृप्त नहीं हो सकता। जब हमने साक्षात आपके दर्शन कर लिए, तो हमें धन तो मिल ही जाएगा, और हम तब तक जीवित रहेंगे जब तक आपका शासन रहेगा। अतः मेरा वरणीय वरदान तो वही आत्मा का रहस्य ही है।'

मंत्र 29

अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन्। अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत॥२८॥

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ajīryatām-amṛtānām-upetya jīryan-martyaḥ kvadhaḥsthaḥ prajānan | abhidhyāyan varṇa-rati-pramodān-atidīrghe jīvite ko rameta || 28 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'संसार में जरा और मृत्यु से रहित अमर पुरुषों (जैसे आप) की समीपता प्राप्त करके, नीचे पृथ्वी पर रहने वाला कौन सा ऐसा विवेकशील मनुष्य होगा जो सुंदरियों, क्रीड़ाओं और आमोद-प्रमोद के क्षणभंगुर स्वरूप को जानकर अत्यंत दीर्घ जीवन में आनंद मानेगा?'

मंत्र 30

यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत्। योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते॥२९॥

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yasmin-nidaṃ vicikitsanti mṛtyo yat-sāmparāye mahati brūhi nastat | yo'yaṃ varo gūḍham-anupraviṣṭo nānyan-tasmān-naciketā vṛṇīte || 29 ||

💡

नचिकेता ने कहा— 'हे मृत्युदेव! जिसके विषय में लोग संदेह करते हैं कि परलोक में क्या होता है, उस महान परलोक के संबंध में हमें उपदेश दीजिए। इस अत्यंत गूढ़ रहस्य को प्रकट करने वाले वरदान के अतिरिक्त नचिकेता कोई दूसरा वर नहीं मांगता।'

मंत्र 31

अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः। तयोः श्रेय आदधानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥१॥

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anyac-chreyo'nyad-utaiva preyas-te ubhe nānārthe puruṣaṃ sinītaḥ | tayoḥ śreya ādadhānasya sādhu bhavati hīyate'rthād-ya u preyo vṛṇīte || 1 (2.1) ||

💡

यमराज ने उपदेश प्रारंभ किया— 'मनुष्य के सामने दो मार्ग आते हैं— श्रेय (कल्याण मार्ग) और प्रेय (सांसारिक भोग मार्ग)। ये दोनों अलग-अलग फल देने वाले हैं और पुरुष को बांधते हैं। जो कल्याणकारी श्रेय मार्ग को चुनता है, उसका भला होता है; परंतु जो भोग रूपी प्रेय मार्ग को चुनता है, वह परम पुरुषार्थ से पतित हो जाता है।'

मंत्र 32

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते॥२॥

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śreyaś-ca preyaś-ca manuṣyam-etas-tau samparītya vivinakti dhīraḥ | śreyo hi dhīro'bhi preyaso vṛṇīte preyo mando yogakṣemād-vṛṇīte || 2 (2.2) ||

💡

यमराज ने कहा— 'श्रेय और प्रेय दोनों ही मनुष्य के सामने उपस्थित होते हैं। विवेकशील बुद्धिमान पुरुष दोनों की अच्छी तरह परीक्षा करके उन्हें अलग करता है। धीर पुरुष प्रेय की अपेक्षा श्रेय को चुनता है; परंतु मंद बुद्धि वाला अज्ञानी मनुष्य योगक्षेम (शरीर पोषण और संग्रह) के लिए प्रेय को चुनता है।'

मंत्र 33

स त्वं प्रियान् प्रियारूपांश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः। नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवः मनुष्याः॥३॥

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sa tvaṃ priyān priyarūpāṃś-ca kāmān-abhidhyāyan-naciketo'tyasrākṣīḥ | naitāṃ sṛṅkāṃ vittamayīm-avāpto yasyāṃ majjanti bahavaḥ manuṣyāḥ || 3 (2.3) ||

💡

यमराज ने कहा— 'हे नचिकेता! तुमने प्रिय लगने वाले और सुंदर रूप वाले इन भोगों का चिंतन करके इन्हें त्याग दिया। तुम धन रूपी उस बेड़ी (सृङ्का) में नहीं फंसे, जिसमें अधिकांश मनुष्य डूब जाते हैं।'

मंत्र 34

दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेेेेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त॥४॥

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dūram-ete viparīte viṣūcī avidyā yā ca vidyeti jñātā | vidyābhīpsinaṃ naciketaśaṃ manye na tvā kāmā bahavo'lolupanta || 4 (2.4) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अविद्या (अज्ञान/सांसारिक सुख) और विद्या (ज्ञान/श्रेय मार्ग)— ये दोनों अत्यंत विपरीत दिशाओं में जाने वाले मार्ग हैं। मैं नचिकेता को विद्या का आकांक्षी मानता हूँ, क्योंकि बहुत से प्रलोभन भी तुम्हें विचलित नहीं कर सके।'

मंत्र 35

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः। दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥५॥

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avidyāyām-antare vartamānāḥ svyaṃ dhīrāḥ paṇḍitam-manyamānāḥ | dandramyamāṇāḥ pariyanti mūḍhā andhenaiva nīyamānā yathāndhāḥ || 5 (2.5) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अविद्या (अज्ञान) के भीतर रहते हुए भी जो अपने-आप को धीर और पंडित मानते हैं, वे मूढ़ मनुष्य टेढ़े-मेढ़े मार्गों से भटकते रहते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे अंधे के पीछे चलने वाले अंधे गड्ढे में गिरते हैं।'

मंत्र 36

न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्। अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे॥६॥

•

na sāmparāyaḥ pratibhāti bālaṃ pramādyantaṃ vittamohena mūḍham | ayaṃ loko nāsti para iti mānī punaḥ punar-vaśam-āpadyate me || 6 (2.6) ||

💡

यमराज ने कहा— 'धन के मोह में पागल और असावधान अज्ञानी बालक को परलोक का मार्ग नहीं सूझता। "केवल यही लोक है, परलोक कुछ नहीं"— ऐसा मानने वाला मनुष्य बार-बार मेरे (मृत्यु के) वश में आता है।'

मंत्र 37

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः॥७॥

•

śravaṇāyāpi bahubhir-yo na labhyaḥ śṛṇvanto'pi bahavo yaṃ na vidyuḥ | āścaryo vaktā kuśalo'sya labdhā''ścaryo jñātā kuśalānuśiṣṭaḥ || 7 (2.7) ||

💡

यमराज ने कहा— 'वह आत्मतत्व ऐसा है जो बहुतों को सुनने के लिए भी नहीं मिलता, और बहुत से लोग सुनकर भी उसे नहीं समझ पाते। इसका उपदेशक आश्चर्य रूप (असाधारण) होता है, और इसे प्राप्त करने वाला कुशल (निपुण) होता है। किसी कुशल आचार्य द्वारा उपदिष्ट होकर इसका ज्ञाता होना भी महान आश्चर्य है।'

मंत्र 38

न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः। अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात्॥८॥

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na nareṇāvareṇa prokta eṣa suvijñeyo bahudhā cintyamānaḥ | ananyaprokte gatir-atra nāsty-aṇīyān hy-atarkyam-aṇupramāṇāt || 8 (2.8) ||

💡

यमराज ने कहा— 'साधारण मनुष्य द्वारा उपदेश किए जाने पर यह आत्मतत्व सुगमता से नहीं जाना जा सकता, क्योंकि इसके विषय में बहुत से मत हैं। परंतु जब अनन्य (अभेददर्शी ज्ञानी) द्वारा यह कहा जाता है, तब संदेह नहीं रह जाता, क्योंकि यह अणु से भी अणुतर है और तर्क का विषय नहीं है।'

मंत्र 39

नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ। यान्त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा॥९॥

•

naiṣā tarkeṇa matir-āpaneyā proktā'nyenaiva sujñānāya preṣṭha | yān-tvam-āpaḥ satyadhṛtir-batāsi tvādṛṅ-no bhūyān-naciketaḥ praṣṭā || 9 (2.9) ||

💡

यमराज ने कहा— 'हे प्रिय नचिकेता! तर्क के द्वारा यह बुद्धि (आत्मज्ञान) नहीं प्राप्त की जा सकती। किसी अन्य तत्वदर्शी द्वारा उपदेश दिए जाने पर ही यह सुगम ज्ञान बनती है। तुमने जिस ज्ञान को प्राप्त किया है, तुम निश्चय ही दृढ़ सत्यनिष्ठ हो। तुम्हारे जैसा प्रश्न पूछने वाला हमें सदा मिलता रहे।'

मंत्र 40

जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत्। ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम्॥१०॥

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jānāmy-ahaṃ śevadhir-ity-anityam-na hy-adhruvaiḥ prāpyate hi dhruvaṃ tat | tato mayā nāciketaś-cito'gnir-anityair-dravyaiḥ prāptavān-asmi nityam || 10 (2.10) ||

💡

यमराज ने कहा— 'मैं जानता हूँ कि कर्मों का फल रूप यह खजाना अनित्य है, क्योंकि अनित्य वस्तुओं से वह नित्य (परमात्मा) नहीं प्राप्त किया जा सकता। फिर भी मैंने अनित्य यज्ञ सामग्रियों से नाचिकेत अग्नि का चयन किया और उसके फल स्वरूप (यम पद रूपी) अपेक्षाकृत नित्य पद को प्राप्त किया।'

मंत्र 41

कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम्। स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः॥११॥

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kāmasyāptiṃ jagataḥ pratiṣṭhāṃ krator-anantyam-abhayasya pāram | stoma-mahad-urugāyaṃ pratiṣṭhāṃ dṛṣṭvā dhṛtyā dhīro naciketo'tyasrākṣīḥ || 11 (2.11) ||

💡

यमराज ने कहा— 'हे नचिकेता! तुमने समस्त कामनाओं की सीमा, जगत के आधार, यज्ञों के अनंत फल, निर्भयता की पराकाष्ठा, और स्तुति योग्य महान विस्तृत साम्राज्य को देखकर, धैर्यपूर्वक और बुद्धि का परिचय देते हुए उन सबको त्याग दिया।'

मंत्र 42

तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गहरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति॥१२॥

•

taṃ durdarśaṃ gūḍham-anupraviṣṭhaṃ guhāhitaṃ gahareṣṭhaṃ purāṇam | adhyātma-yogādhigamena devaṃ matvā dhīro harṣa-śokau jahāti || 12 (2.12) ||

💡

यमराज ने कहा— 'उस अत्यंत कठिनता से दिखाई देने वाले, बुद्धि रूपी गुहा में छिपे हुए, गहन स्थान (हृदय) में स्थित, पुरातन देव (परमात्मा) को अध्यात्म योग के द्वारा जानकर बुद्धिमान मनुष्य हर्ष और शोक दोनों का त्याग कर देता है।'

मंत्र 43

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य। स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये॥१३॥

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etac-chrutvā samparigṛhya martyaḥ pravṛhya dharmyam-aṇum-etām-āpya | sa modate modanīyaṃ hi labdhvā vivṛtaṃ sadma naciketasaṃ manye || 13 (2.13) ||

💡

यमराज ने कहा— 'इस सत्य को सुनकर और अच्छी तरह ग्रहण करके, मरणधर्मा मनुष्य जब इस धर्म युक्त सूक्ष्म आत्मतत्व को पृथक करके प्राप्त कर लेता है, तब वह आनंदित होने योग्य परमात्मा को पाकर आनंद मग्न हो जाता है। मैं मानता हूँ कि नचिकेता के लिए ब्रह्मधाम का द्वार खुला हुआ है।'

मंत्र 44

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद॥१४॥

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anyatra dharmād-anyatrādharmād-anyatrāsmāt-kṛtākṛtāt | anyatra bhūtāc-ca bhavyāc-ca yat-tat-paśyasi tad-vada || 14 (2.14) ||

💡

नचिकेता ने पूछा— 'जो धर्म से अलग है और अधर्म से अलग है, जो कार्य (कृत) और कारण (अकृत) दोनों से परे है, और जो भूत तथा भविष्य से भी अतीत है, जिसे आप उस रूप में देखते हैं, वह मुझे बताइए।'

मंत्र 45

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥१५॥

•

sarve vedā yat-padam-āmananti tapāṃsi sarvāṇi ca yad-vadanti | yad-icchanto brahmacaryaṃ caranti tat-te padaṃ saṅgraheṇa bravīmy-om-ity-etat || 15 (2.15) ||

💡

यमराज ने कहा— 'संपूर्ण वेद जिस परम पद का प्रतिपादन करते हैं, सभी तपस्याएं जिसकी चर्चा करती हैं, और जिसकी इच्छा करते हुए मुमुक्षु ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ— वह "ॐ" है।'

मंत्र 46

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्। एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्॥१६॥

•

etad-dhy-evākṣaraṃ brahma etad-dhy-evākṣaraṃ param | etad-dhy-evākṣaraṃ jñātvā yo yad-icchati tasya tat || 16 (2.16) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यही अक्षर (ॐ) अपर ब्रह्म है और यही अक्षर परब्रह्म है। इस अक्षर को जानकर जो मनुष्य जिसकी कामना करता है, उसे वही प्राप्त हो जाता है।'

मंत्र 47

एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते॥१७॥

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etad-ālambanaṃ śreṣṭham-etad-ālambanaṃ param | etad-ālambanaṃ jñātvā brahmaloke mahīyate || 17 (2.17) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यह ॐकार रूपी आलम्बन (आश्रय) सबसे श्रेष्ठ है, यही परम आलम्बन है। इस आलम्बन को जानकर मनुष्य ब्रह्मलोक में पूजनीय हो जाता है।'

मंत्र 48

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥१८॥

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na jāyate mriyate vā vipaścin-nāyaṃ kutaścin-na babhūva kaścit | ajo nityaḥ śāśvato'yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre || 18 (2.18) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यह ज्ञान स्वरूप आत्मा न कभी जन्म लेता है और न कभी मरता है। यह न किसी कारण से उत्पन्न हुआ है और न कोई वस्तु इससे उत्पन्न हुई है। यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नहीं मारा जाता।'

मंत्र 49

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९॥

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hantā cen-manyate hantuṃ hataś-cen-manyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate || 19 (2.19) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यदि वध करने वाला समझता है कि मैं मारता हूँ, और मारा जाने वाला समझता है कि मैं मर गया, तो वे दोनों ही आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। यह आत्मा न किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।'

मंत्र 50

अणोरणीयान्महतो महीयानात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्। तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः॥२०॥

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aṇor-aṇīyān-mahato mahīyān-ātmā'sya jantor-nihito guhāyām | tam-akratuḥ paśyati vīta-śoko dhātu-prasādān-mahimānam-ātmanaḥ || 20 (2.20) ||

💡

यमराज ने कहा— 'सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और महान से भी महान यह परमात्मा इस जीवात्मा के हृदय रूपी गुहा में स्थित है। कामनाओं से रहित और शोक मुक्त पुरुष इंद्रियों की प्रसन्नता (शुद्धता) से आत्मा की उस महिमा को देखता है।'

मंत्र 51

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः। कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति॥२१॥

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āsīno dūraṃ vrajati śayāno yāti sarvataḥ | kas-taṃ madāmadaṃ devaṃ mad-anyo jñātumarhati || 21 (2.21) ||

💡

यमराज ने कहा— 'वह परमात्मा स्थिर बैठा हुआ भी दूर चला जाता है, और शयन करता हुआ (सोया हुआ) भी सब जगह पहुँच जाता है। उस हर्ष और विषाद से रहित (मदामद) दिव्य पुरुष को मेरे अतिरिक्त कौन जानने योग्य है?'

मंत्र 52

अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥२२॥

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aśarīraṃ śarīreṣv-anavastheṣv-avasthitam | mahāntaṃ vibhum-ātmānaṃ matvā dhīro na śocati || 22 (2.22) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अनित्य शरीरों में शरीर-रहित रूप से स्थित, उस महान और सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करता।'

मंत्र 53

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥२३॥

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nāyam-ātmā pravacanena labhyo na medhayā na bahunā śrutena | yam-evaiṣa vṛṇute tena labhyas-tasyaiṣa ātmā vivṛṇute tanūṃ svām || 23 (2.23) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यह आत्मा न उपदेशों से प्राप्त होता है, न बुद्धि से, और न बहुत सुनने (शास्त्र अध्ययन) से। यह आत्मा जिसे स्वीकार करता है (जो अनन्य भाव से इसकी शरण लेता है), उसे ही यह प्राप्त होता है। उसके समक्ष यह आत्मा अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर देता है।'

मंत्र 54

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्॥२४॥

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nāvirato duścaritān-nāśānto nāsamāhitaḥ | nāśāntamānaso vāpi prajñānenainam-āpnuyāt || 24 (2.24) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो बुरे आचरण से विरत नहीं हुआ है, जो शांत नहीं है, जिसका मन एकाग्र नहीं है, और जिसका मन अशांत है, वह केवल बुद्धि (ज्ञान) के बल पर इस आत्मा को नहीं पा सकता।'

मंत्र 55

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥२५॥

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yasya brahma ca kṣatraṃ ca ubhe bhavata odanaḥ | mṛtyur-yasyopasecanaṃ ka itthā veda yatra saḥ || 25 (2.25) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जिसके लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय (संपूर्ण चराचर जगत) दोनों ही भोजन के समान हैं, और मृत्यु जिसके लिए सब्जी या अचार (उपसेचन) के समान है, वह परमात्मा जहाँ स्थित है, उसे इस प्रकार (बिना आत्मज्ञान के) कौन जान सकता है?'

मंत्र 56

ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः॥१॥

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ṛtaṃ pibantau sukṛtasya loke guhāṃ praviṣṭau parame parārdhe | chāyātapau brahmavido vadanti pañcāgnayo ye ca triṇāciketāḥ || 1 (3.1) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अपने शुभ कर्मों के सत्य फल (ऋत) का भोग करते हुए, इस शरीर रूपी श्रेष्ठ स्थान के हृदय रूपी गुहा में बुद्धिमान जीव और साक्षी रूप में परमात्मा दोनों प्रविष्ट हैं। ब्रह्मवेत्ता, पंच-अग्नि उपासक और तीन बार नाचिकेत यज्ञ करने वाले पुरुष इन दोनों को धूप और छाया के समान (भिन्न) कहते हैं।'

मंत्र 57

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम्। अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि॥२॥

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yaḥ setur-ījānānām-akṣaraṃ brahma yat-param | abhayaṃ titīrṣatāṃ pāraṃ nāciketaṃ śakemahi || 2 (3.2) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यज्ञ करने वालों के लिए जो सेतु के समान है, और भवसागर से पार जाने की इच्छा रखने वालों के लिए जो परम निर्भय पद रूप अविनाशी ब्रह्म है, उस नाचिकेत अग्नि को हम जानने में समर्थ हों।'

मंत्र 58

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥३॥

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ātmānaṃ rathinaṃ viddhi śarīraṃ rathameva tu | buddhiṃ tu sārathiṃ viddhi manaḥ pragrahameva ca || 3 (3.3) ||

💡

यमराज ने रथ का रूपक समझाते हुए कहा— 'तुम जीवात्मा को रथ का स्वामी (रथी) समझो, और शरीर को रथ समझो। बुद्धि को सारथि समझो, और मन को लगाम समझो।'

मंत्र 59

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥४॥

•

indriyāṇi hayān-āhur-viṣayāṃs-teṣu gocarān | ātmendriya-mano-yuktaṃ bhoktety-āhur-manīṣiṇaḥ || 4 (3.4) ||

💡

यमराज ने कहा— 'ज्ञानी पुरुष इंद्रियों को घोड़े कहते हैं, और इंद्रियों के विषयों को उनका मार्ग। शरीर, इंद्रियों और मन से युक्त जीवात्मा को मनीषी लोग "भोक्ता" कहते हैं।'

मंत्र 60

यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः॥५॥

•

yas-tv-avijñānavān bhavati ayuktena manasā sadā | tasyendriyāṇy-avaśyāni duṣṭāśvā iva sāratheḥ || 5 (3.5) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो मनुष्य विवेकहीन होता है और जिसका मन सदा अनियंत्रित (अयुक्त) रहता है, उसकी इंद्रियाँ उसके वश में नहीं रहतीं, ठीक उसी प्रकार जैसे कुशल सारथि के दुष्ट (बेकाबू) घोड़े होते हैं।'

मंत्र 61

यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा। तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः॥६॥

•

yas-tu vijñānavān bhavati yuktena manasā sadā | tasyendriyāṇi vaśyāni sadaśvā iva sāratheḥ || 6 (3.6) ||

💡

यमराज ने कहा— 'परंतु जो मनुष्य विवेकशील होता है और जिसका मन सदा नियंत्रित रहता है, उसकी इंद्रियाँ उसके वश में रहती हैं, जैसे सारथि के अच्छे और प्रशिक्षित घोड़े।'

मंत्र 62

यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः। न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति॥७॥

•

yas-tv-avijñānavān bhavati amanaskaḥ sadā'śuciḥ | na sa tat-padam-āpnoति saṃsāraṃ cādhigacchati || 7 (3.7) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो मनुष्य विवेकहीन, असावधान और सदा अपवित्र रहता है, वह उस परम पद (मोक्ष) को नहीं प्राप्त कर पाता, बल्कि जन्म-मरण के संसार चक्र में भटकता रहता है।'

मंत्र 63

यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः। स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते॥८॥

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yas-tu vijñānavān bhavati samanaskaḥ sadā śuciḥ | sa tu tat-padam-āpnoti yasmād-bhūyo na jāyate || 8 (3.8) ||

💡

यमराज ने कहा— 'परंतु जो मनुष्य विवेकशील, नियंत्रित मन वाला और सदा पवित्र रहता है, वह उस परम पद को प्राप्त कर लेता है, जहाँ से फिर कभी जन्म नहीं लेना पड़ता।'

मंत्र 64

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥९॥

•

vijñāna-sārathir-yastu manaḥ-pragrahavān naraḥ | so'dhvanaḥ pāram-āpnoti tad-viṣṇoḥ paramaṃ padam || 9 (3.9) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो मनुष्य विवेक रूपी सारथि वाला और मन रूपी लगाम को नियंत्रण में रखने वाला है, वह जीवन रूपी मार्ग के पार पहुँच जाता है, जो कि सर्वव्यापी विष्णु का परम पद है।'

मंत्र 65

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः॥१०॥

•

indriyebhyaḥ parā hy-arthā arthebhyaś-ca paraṃ manaḥ | manasas-tu parā buddhir-buddher-ātmā mahān paraḥ || 10 (3.10) ||

💡

यमराज ने सूक्ष्मता का क्रम बताते हुए कहा— 'इंद्रियों से श्रेष्ठ उनके विषय हैं, विषयों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है, और बुद्धि से श्रेष्ठ महान आत्मा (महत्तत्व) है।'

मंत्र 66

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः॥११॥

•

mahataḥ param-avyaktam-avyaktāt-puruṣaḥ paraḥ | puruṣān-na paraṃ kiñcit-sā kāṣṭhā sā parā gatiḥ || 11 (3.11) ||

💡

यमराज ने कहा— 'महान आत्मा से श्रेष्ठ अव्यक्त (प्रकृति) है, और अव्यक्त से श्रेष्ठ पुरुष (परमात्मा) है। पुरुष से परे और कुछ भी नहीं है; वही अंतिम सीमा (परा काष्ठा) है और वही परम गति है।'

मंत्र 67

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥१२॥

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eṣa sarveṣu bhūteṣu gūḍho'tmā na prakāśate | dṛśyate tv-agryayā buddhyā sūkṣmayā sūkṣma-darśibhiḥ || 12 (3.12) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यह गुप्त रूप से सभी प्राणियों में स्थित आत्मा प्रकाशित (प्रकट) नहीं होता। परंतु सूक्ष्म बुद्धि वाले तत्वदर्शियों द्वारा अत्यंत एकाग्र और तीव्र बुद्धि से इसे देखा (अनुभव किया) जाता है।'

मंत्र 68

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि॥१३॥

•

yacched-vāṅ-manasī prājñas-tad-yacchej-jñāna ātmani | jñānam-ātmani mahati niyacchet-tad-yacchec-chānta ātmani || 13 (3.13) ||

💡

यमराज ने साधना विधि बताते हुए कहा— 'विवेकी पुरुष को चाहिए कि वह वाणी आदि इंद्रियों का मन में निरोध करे, मन का बुद्धि (ज्ञान आत्मा) में निरोध करे, बुद्धि का महान आत्मा में निरोध करे, और महान आत्मा का शांत स्वरूप परमात्मा में निरोध करे।'

मंत्र 69

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥१४॥

•

uttiṣṭhata jāgrata prāpya varān-nibodhata | kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṃ pathas-tat-kavayo vadanti || 14 (3.14) ||

💡

यमराज ने आह्वान किया— 'उठो, जागो, और श्रेष्ठ महापुरुषों के पास जाकर उस परम तत्व को समझो। तत्वदर्शी ज्ञानी कहते हैं कि वह आध्यात्मिक मार्ग छुरे की पैनी धार के समान तीखा और चलने में अत्यंत कठिन है।'

मंत्र 70

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥१५॥

•

aśabdam-asparśam-arūpam-avyayaṃ tathā-rasaṃ nityam-agandhavac-ca yat | anādy-anantaṃ mahataḥ paraṃ dhruvaṃ nicāyya tan-mṛtyu-mukhāt-pramucyate || 15 (3.15) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो शब्द-रहित, स्पर्श-रहित, रूप-रहित, अविनाशी, स्वाद-रहित, नित्य, गंध-रहित, अनादि, अनंत, महान आत्मा से भी परे और सदा स्थिर है; उस परम तत्व को जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।'

मंत्र 71

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम्। उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते॥१६॥

•

nāciketam-upākhyānaṃ mṛtyu-proktaṃ sanātanam | uktvā śrutvā ca medhāvī brahmaloke mahīyate || 16 (3.16) ||

💡

यमराज द्वारा कहे गए इस सनातन 'नाचिकेत उपाख्यान' को कहकर और सुनकर बुद्धिमान मनुष्य ब्रह्मलोक में महिमावान (पूजित) होता है।'

मंत्र 72

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्ब्रह्मसंसदि। प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति॥१७॥

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ya imaṃ paramaṃ guhyaṃ śrāvayed-brahmasansadi | prayataḥ śrāddhakāle vā tad-ānantyāya kalpate tad-ānantyāya kalpata iti || 17 (3.17) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो पवित्र होकर इस परम गोपनीय रहस्यमय उपदेश को ब्राह्मणों की सभा में या श्राद्ध के समय सुनाता है, उसका वह कर्म अनंत फल देने वाला बन जाता है; हाँ, वह अनंत फल देने वाला बन जाता है।'

मंत्र 73

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥१॥

•

parāñci khāni vyatṛṇat-svayambhūs-tasmāt-parāṅ-paśyati nāntarātman | kaścid-dhīraḥ pratyag-ātmānam-aikṣad-āvṛtta-cakṣur-amṛtatvam-icchan || 1 (4.1) ||

💡

यमराज ने कहा— 'स्वयंभू परमात्मा ने ज्ञानेंद्रियों को बाहर की ओर जाने वाला बनाया है, इसीलिए मनुष्य केवल बाहरी विषयों को देखता है, अंतरात्मा को नहीं। परंतु कोई धीर पुरुष ही अमृतत्व (अमरता) की इच्छा करता हुआ, इंद्रियों को अंतर्मुखी करके भीतर स्थित परमात्मा को देखता है।'

मंत्र 74

पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम्। अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते॥२॥

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parācaḥ kāmān-anuyanti bālās-te mṛtyor-yanti vitatasya pāśam | atha dhīrā amṛtatvaṃ viditvā dhruvam-adhruveṣv-iha na prārthayante || 2 (4.2) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अज्ञानी बालक बाहरी भोगों के पीछे भागते हैं और सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के पाश में बंध जाते हैं। परंतु विवेकी धीर पुरुष इस अनित्य संसार में नित्य अमृतत्व को जानकर नाशवान भोगों की कामना नहीं करते।'

मंत्र 75

येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान्। एतेनैव विजानातीह किमत्र परिशिष्यते। एतद्वै तत्॥३॥

•

yena rūpaṃ rasaṃ gandhaṃ śabdān sparśāṃś-ca maithunān | etenaiva vijānātīha kim-atra pariśiṣyate | etad-vai tat || 3 (4.3) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जिस चेतन तत्व (आत्मा) के द्वारा मनुष्य रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श और मैथुन जन्य सुखों का अनुभव करता है, उससे छिपा हुआ यहाँ क्या शेष बचता है? (अर्थात कुछ नहीं)। जिसके विषय में तुमने पूछा था, वही यह आत्मा है।'

मंत्र 76

स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥४॥

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svapnāntaṃ jāgaritāntaṃ cobhau yenānupaśyati | mahāntaṃ vibhum-ātmānaṃ matvā dhīro na śocati || 4 (4.4) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जिसके द्वारा मनुष्य स्वप्नावस्था और जाग्रतावस्था दोनों के अनुभवों को देखता है, उस महान और सर्वव्यापी परमात्मा को जानकर बुद्धिमान पुरुष कभी शोक नहीं करता।'

मंत्र 77

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्। ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते। एतद्वै तत्॥५॥

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ya imaṃ madhvadaṃ veda ātmānaṃ jīvam-antikāt | īśānaṃ bhūtabhavyasya na tato vijugupsate | etad-vai tat || 5 (4.5) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो मनुष्य कर्मों के फल भोगने वाले इस जीवात्मा को अत्यंत निकट से भूत और भविष्य के स्वामी रूप में जान लेता है, वह फिर कभी किसी से घृणा नहीं करता और न स्वयं को छिपाने की चेष्टा करता है। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 78

यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत। एतद्वै तत्॥६॥

•

yaḥ purvaṃ tapaso jātam-adbhyaḥ pūrvam-ajāyata | guhāṃ praviśya tiṣṭhantaṃ yo bhūtebhir-vyapaśyata | etad-vai tat || 6 (4.6) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो तप (ज्ञान) से उत्पन्न होकर, पंचमहाभूतों की रचना से भी पहले उत्पन्न हुआ, और जो हृदय रूपी गुहा में प्रवेश करके इंद्रियों के साथ स्थित है; जो उसे सभी प्राणियों में साक्षात देखता है, वही सत्य को देखता है। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 79

या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत। एतद्वै तत्॥७॥

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yā prāṇena sambhavaty-aditir-devatāmayī | guhāṃ praviśya tiṣṭhantīṃ yā bhūtebhir-vyajāyata | etad-vai tat || 7 (4.7) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो समस्त देवताओं से युक्त है, जो प्राण के रूप में प्रकट होती है, और जो हृदय रूपी गुहा में प्रवेश करके सभी प्राणियों के साथ उत्पन्न हुई है, वह साक्षात अदिति (अखंड चेतना शक्ति) है। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 80

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः। दिवे दिवे ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः। एतद्वै तत्॥८॥

•

araṇyor-nihito jātavedā garbha iva subhṛto garbhiṇībhiḥ | dive dive īḍyo jāgṛvadbhir-haviṣmadbhir-manuṣyebhir-agniḥ | etad-vai tat || 8 (4.8) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जैसे गर्भवती स्त्रियां अपने गर्भ की भली-भांति रक्षा करती हैं, वैसे ही दो अरणि काष्ठों के बीच छिपी हुई यह यज्ञीय अग्नि (जातवेदा) ऋषियों द्वारा सुरक्षित है। जाग्रत और हवि प्रदान करने वाले मनुष्यों द्वारा प्रतिदिन स्तुति योग्य यह अग्नि ही साक्षात परमात्मा है। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 81

यतश्चोदेति सूर्यो अस्तं यत्र च गच्छति। तं देवाः सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन। एतद्वै तत्॥९॥

•

yataś-code-ti sūryo astaṃ yatra ca gacchati | taṃ devāḥ sarve arpitās-tadu nātye-ti kaścana | etad-vai tat || 9 (4.9) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जहाँ से सूर्य उदय होता है, और जहाँ वह अस्त हो जाता है (अर्थात समस्त ब्रह्मांड का नियंता); सभी देवगण जिसमें समाहित हैं, और जिसका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता, वही यह परम तत्व है। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 82

यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥१०॥

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yad-eveha tad-amutra yad-amutra tad-anviha | mṛtyoḥ sa mṛtyum-āpnoti ya iha nāneva paśyati || 10 (4.10) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो यहाँ (इस शरीर में) है, वही वहाँ (ब्रह्मांड में) है; और जो वहाँ है, वही यहाँ है। जो मनुष्य इस सृष्टि में नानात्व (भेद) देखता है, वह बार-बार जन्म और मृत्यु को प्राप्त होता है।'

मंत्र 83

मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानाऽस्ति किञ्चन। मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति॥११॥

•

manasaivedam-āptavyaṃ neha nānā'sti kiñcana | mṛtyoḥ sa mṛtyuṃ gacchati ya iha nāneva paśyati || 11 (4.11) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यह एकत्व भाव केवल शुद्ध मन के द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। यहाँ अनेकता (नानात्व) कुछ भी नहीं है। जो यहाँ तनिक भी अनेकता देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु (बारंबार मरण) को प्राप्त होता है।'

मंत्र 84

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते। एतद्वै तत्॥१२॥

•

aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo madhya ātmani tiṣṭhati | īśāno bhūtabhavyasya na tato vijugupsate | etad-vai tat || 12 (4.12) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अंगूठे के परिमाण वाला (हृदय कमल में ध्यान का आलम्बन रूप) वह पुरुष (परमात्मा) शरीर के मध्य भाग में स्थित है। वह भूत और भविष्य का स्वामी है। उसे जानकर मनुष्य कभी स्वयं को छिपाना नहीं चाहता। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 85

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः। एतद्वै तत्॥१३॥

•

aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo jyotir-ivādhūmakaḥ | īśāno bhūtabhavyasya sa evādya sa u śvaḥ | etad-vai tat || 13 (4.13) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अंगूठे के परिमाण वाला वह पुरुष बिना धुएं की ज्योति के समान (परम निर्मल) है। वह भूत, भविष्य और वर्तमान का नियंता है। वह आज भी है और कल भी रहेगा। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 86

यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति। एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति॥१४॥

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yathodakaṃ durge vṛṣṭaṃ parvateṣu vidhāvati | evaṃ dharmān pṛthak paśyaṃs-tān-evānuvidhāvati || 14 (4.14) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जैसे ऊंचे पर्वत पर वर्षा का जल चारों ओर ढलानों पर बहकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही जो मनुष्य आत्मा के तत्वों को सत्य से पृथक (अनेक रूप) देखता है, वह उन्हीं अनेक रूपों के पीछे दौड़ता हुआ नष्ट हो जाता है।'

मंत्र 87

यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति। एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥१५॥

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yathodakaṃ śuddhe śuddham-āsiktaṃ tādṛg-eva bhavati | evaṃ muner-vijānata ātmā bhavati gautama || 15 (4.15) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जैसे शुद्ध जल में शुद्ध जल मिला देने पर वह वैसा ही (एकरूप) हो जाता है, वैसे ही हे गौतमवंशी नचिकेता! उस एकत्व को जानने वाले मुनि की आत्मा भी परमात्मा के साथ एकरूप हो जाती है।'

मंत्र 88

पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः। अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते। एतद्वै तत्॥१॥

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puram-ekādaśadvāram-ajasyāvakra-cetasaḥ | anuṣṭhāya na śocati vimuktaś-ca vimucyate | etad-vai tat || 1 (5.1) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जिसका ज्ञान कुटिलता से रहित है, उस अजन्मा परमात्मा का यह शरीर ग्यारह द्वारों वाला नगर है। इसका ध्यान करके मनुष्य शोक से रहित हो जाता है और जीवनमुक्त होकर सदा के लिए मुक्त हो जाता है। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 89

हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥२॥

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hansaḥ śuciṣad-vasur-antarikṣasad-hotā vediṣad-atithir-duroṇasat | nṛṣad-varasad-ṛtasad-vyomasad-abjā gojā ṛtajā adrijā ṛtaṃ bṛhat || 2 (5.2) ||

💡

यमराज ने कहा— 'वह परमात्मा द्युलोक में सूर्य (हंस), अंतरिक्ष में वायु (वसु), वेदी पर होता (अग्नि), और कलश या घर में अतिथि के रूप में स्थित है। वह मनुष्यों, देवताओं, सत्य, और आकाश में स्थित है। वह जल, पृथ्वी (अन्न), यज्ञ और पर्वतों से प्रकट होने वाला है। वह सत्य और महान है।'

मंत्र 90

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते॥३॥

•

ūrdhvaṃ prāṇam-unnayaty-apānaṃ pratyag-asyati | madhye vāmanam-āsīnaṃ viśve devā upāsate || 3 (5.3) ||

💡

यमराज ने कहा— 'वह परमात्मा प्राणवायु को ऊपर की ओर उठाता है और अपानवायु को नीचे की ओर फेंकता है। हृदय के मध्य भाग में बैठे हुए उस पूजनीय वामन (अंगुष्ठ मात्र पुरुष) की सभी इंद्रियां (देवता) उपासना करती हैं।'

मंत्र 91

अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः। देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते। एतद्वै तत्॥४॥

•

asya visraṃsamānasya śarīrasthasya dehinaḥ | dehād-vimucyamānasya kim-atra pariśiṣyate | etad-vai tat || 4 (5.4) ||

💡

यमराज ने कहा— 'शरीर में स्थित इस जीवात्मा के शरीर से निकल जाने पर यहाँ (इस मृत शरीर में) क्या शेष बचता है? (अर्थात कुछ नहीं)। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 92

न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ॥५॥

•

na prāṇena nāpānena martyo jīvati kaścana | itareṇa tu jīvanti yasmin-netāv-upāśritau || 5 (5.5) ||

💡

यमराज ने कहा— 'मनुष्य न तो प्राण से और न अपान वायु से जीवित रहता है, अपितु वे किसी अन्य (आत्मा) के बल पर जीवित रहते हैं जिसके आश्रय में ये दोनों (प्राण और अपान) स्थित हैं।'

मंत्र 93

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्। यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम॥६॥

•

hanta ta idaṃ pravakṣyami guhyaṃ brahma sanātanam | yathā ca maraṇaṃ prāpya ātmā bhavati gautama || 6 (5.6) ||

💡

यमराज ने कहा— 'हे गौतमवंशी नचिकेता! अब मैं तुम्हें उस अत्यंत गोपनीय सनातन ब्रह्म के विषय में और मृत्यु के बाद जीवात्मा की जो गति होती है, उसके विषय में बताऊंगा।'

मंत्र 94

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥७॥

•

yonim-anye prapadyante śarīratvāya dehinaḥ | sthāṇum-anye'nusaṃyanti yathā-karma yathā-śrutam || 7 (5.7) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अपने-अपने कर्मों और ज्ञान (श्रुत) के अनुसार, कुछ जीवात्मा शरीर धारण करने के लिए गर्भ (योनि) में प्रवेश करते हैं, और कुछ अत्यंत निम्न योनियों को तथा जड़ पदार्थों (स्थाणु/वृक्ष आदि) को प्राप्त होते हैं।'

मंत्र 95

य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते। तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वै तत्॥८॥

•

ya eṣa supteṣu jāgarti kāmaṃ kāmaṃ puruṣo nirmimāṇaḥ | tad-eva śukraṃ tad brahma tad-evāmṛtam-ucyate | tasmin-lokāḥ śritāḥ sarve tadu nātye-ti kaścana | etad-vai tat || 8 (5.8) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो पुरुष (परमात्मा) इंद्रियों के सो जाने पर भी जागता रहता है और नाना प्रकार के मनोरथों का निर्माण करता है, वही अत्यंत शुद्ध (शुक्र) है, वही ब्रह्म है, और उसी को अमृत कहा जाता है। संपूर्ण लोक उसी के आश्रित हैं, उसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 96

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥९॥

•

agnir-yathaiko bhuvanaṃ praviṣṭo rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo babhūva | ekas-tathā sarvabhūtāntarātmā rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo bahiś-ca || 9 (5.9) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जैसे एक ही अग्नि संसार में प्रवेश करके प्रत्येक जलने वाली वस्तु के आकार के अनुरूप (भिन्न-भिन्न रूपों में) दिखाई देती है, वैसे ही समस्त प्राणियों का एक ही अंतरात्मा अनेक रूपों में स्थित है, और वह उन सब से बाहर (अलिप्त) भी है।'

मंत्र 97

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च॥१०॥

•

vāyur-yathaiko bhuvanaṃ praviṣṭo rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo babhūva | ekas-tathā sarvabhūtāntarātmā rūpaṃ rūpaṃ pratirūpo bahiś-ca || 10 (5.10) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जैसे एक ही वायु संसार में प्रवेश करके प्रत्येक पात्र या स्थान के आकार के अनुरूप दिखाई देती है, वैसे ही समस्त प्राणियों का एक ही अंतरात्मा अनेक रूपों में भासता है, और वह उन सब से बाहर भी विद्यमान है।'

मंत्र 98

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः॥११॥

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sūryo yathā sarvalokasya cakṣur-na lipyate cākṣuṣair-bāhyadoṣaiḥ | ekas-tathā sarvabhūtāntarātmā na lipyate lokaduḥkhena bāhyaḥ || 11 (5.11) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जैसे संपूर्ण जगत की आँख रूप सूर्य आँखों के बाहरी दोषों या अपवित्र दृश्यों से लिप्त नहीं होता, वैसे ही समस्त प्राणियों का एक ही अंतरात्मा संसार के दुखों से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह प्रकृति के विकारों से सर्वथा परे (बाह्य) है।'

मंत्र 99

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥१२॥

•

eko vaśī sarvabhūtāntarātmā ekaṃ rūpaṃ bahudhā yaḥ karoti | tam-ātmasthaṃ ye'nupaśyati dhīrās-teṣāṃ sukhaṃ śāśvataṃ netareṣām || 12 (5.12) ||

💡

यमराज ने कहा— 'वह एक, सबको वश में रखने वाला, संपूर्ण प्राणियों का अंतरात्मा अपने एक ही स्वरूप को अनेक रूपों में प्रकट करता है। जो बुद्धिमान पुरुष उस परमात्मा को अपने हृदय में स्थित देखते हैं, उन्हें ही शाश्वत सुख मिलता है, अन्यों को नहीं।'

मंत्र 100

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥१३॥

•

nityo'nityānāṃ cetanaś-cetanānām-eko bahūnāṃ yo vidadhāti kāmān | tam-ātmasthaṃ ye'nupaśyati dhīrās-teṣāṃ śāntiḥ śāśvatī netareṣām || 13 (5.13) ||

💡

यमराज ने कहा— 'जो अनित्य वस्तुओं में नित्य है, जो चेतन प्राणियों में मुख्य चेतना है, और जो अकेला ही बहुतों की कामनाओं को पूर्ण करता है; जो बुद्धिमान पुरुष उसे अपने भीतर स्थित देखते हैं, उन्हें ही शाश्वत शांति मिलती है, अन्यों को नहीं।'

मंत्र 101

तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्। कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा॥१४॥

•

tad-etad-iti manyante'nirdeśyaṃ paramaṃ sukham | kathaṃ nu tad-vijānīyāṃ kimu bhāti vibhāti vā || 14 (5.14) ||

💡

साधकों का विचार है— 'वह अनिर्वचनीय परम सुख ही ब्रह्म है।' यमराज विचार करते हैं— 'मैं उस तत्व को कैसे जानूं? क्या वह स्वयं प्रकाशमान है, अथवा किसी अन्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है?'

मंत्र 102

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥१५॥

•

na tatra sūryo bhāti na candra-tārakaṃ nemā vidyuto bhānti kuto'yam-agniḥ | tam-eva bhāntam-anubhāti sarvaṃ tasya bhāsā sarvam-idaṃ vibhāti || 15 (5.15) ||

💡

यमराज ने उत्तर दिया— 'वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और तारे; न वहाँ ये बिजलियाँ चमकती हैं, फिर यह लौकिक अग्नि तो कैसे जल सकती है? उसके प्रकाशित होने पर ही संपूर्ण जगत प्रकाशित होता है; उसी के प्रकाश से यह सब कुछ प्रकाशित है।'

मंत्र 103

ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते। तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वै तत्॥१॥

•

ūrdhvamūlo'vākśākha eṣo'śvatthaḥ sanātanaḥ | tad-eva śukraṃ tad brahma tad-evāmṛtam-ucyate | tasmin-lokāḥ śritāḥ sarve tadu nātye-ti kaścana | etad-vai tat || 1 (6.1) ||

💡

यमराज ने संसार वृक्ष का वर्णन किया— 'इस सनातन संसार रूपी पीपल (अश्वत्थ) के वृक्ष की जड़ ऊपर (परमात्मा में) है और शाखाएं नीचे फैली हुई हैं। वही शुद्ध तत्व है, वही ब्रह्म है, और उसी को अमृत कहा जाता है। संपूर्ण लोक उसी के आश्रित हैं, उसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। वही यह आत्मा है।'

मंत्र 104

यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्। महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥२॥

•

yad-idaṃ kiñca jagat sarvaṃ prāṇa ejati niḥsṛtam | mahad-bhayaṃ vajram-udyataṃ ya etad-vidur-amṛtās-te bhavanti || 2 (6.2) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यह संपूर्ण जगत उसी प्राण (परमेश्वर) की सत्ता से प्रकट होकर उसी में चेष्टा (गति) कर रहा है। वह उठे हुए वज्र के समान अत्यंत भयदायक है (अर्थात उसके कठोर नियमों में सृष्टि बंधी है)। जो इसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।'

मंत्र 105

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥३॥

•

bhayād-asyāgnis-tapati bhayāt-tapati sūryaḥ | bhayād-indraś-ca vāyuś-ca mṛtyur-dhāvati pañcamaḥ || 3 (6.3) ||

💡

यमराज ने कहा— 'उसी परमात्मा के भय (शासन) से अग्नि तपती है, उसी के भय से सूर्य तपता है; और उसी के शासन के भय से इंद्र, वायु तथा पांचवें मृत्युदेव अपने-अपने कार्यों में दौड़ते हैं।'

मंत्र 106

इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः। ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते॥४॥

•

iha ced-aśakad-boddhuṃ prāk śarīrasya visrasaḥ | tataḥ sargeṣu lokeṣu śarīratvāya kalpate || 4 (6.4) ||

💡

यमराज ने कहा— 'यदि कोई मनुष्य शरीर नष्ट होने से पहले यहाँ ही उस परमात्मा को जानने में समर्थ हो गया, तो वह मुक्त हो जाता है। अन्यथा, उसे अनेक युगों तक विभिन्न लोकों में शरीर धारण करने के लिए बाध्य होना पड़ता है।'

मंत्र 107

यथा दर्पणे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके। यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायायुतपयोरिव ब्रह्मलोके॥५॥

•

yathā darpaṇe tathātmani yathā svapne tathā pitṛloke | yathāpsu parīva dadṛśe tathā gandharvaloke chāyāyutapayor-iva brahmaloke || 5 (6.5) ||

💡

यमराज ने दर्शन की स्पष्टता बताई— 'जैसे दर्पण में चेहरा साफ दिखता है, वैसे ही बुद्धि में आत्मा का स्पष्ट दर्शन होता है। जैसे स्वप्न में धुंधला दिखता है, वैसे ही पितृलोक में; जैसे जल में परछाईं दिखती है, वैसे ही गंधर्वलोक में; परंतु धूप और छाया के समान अत्यंत स्पष्ट भेद केवल ब्रह्मलोक में ही दिखाई देता है।'

मंत्र 108

इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत्। पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति॥६॥

•

indriyāṇāṃ pṛthag-bhāvam-udayāstamayau ca yat | pṛthag-utpadyamānānāṃ matvā dhīro na śocati || 6 (6.6) ||

💡

यमराज ने कहा— 'इंद्रियों के पृथक-पृथक स्वरूप को, और आत्मा से भिन्न रूप में उत्पन्न होने वाली इन इंद्रियों के जाग्रत होने (उदय) और सुप्त होने (अस्त) को जानकर, धीर पुरुष कभी शोक नहीं करता।'

मंत्र 109

इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम्। सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम्॥७॥

•

indriyebhyaḥ paraṃ mano manasaḥ sattvam-uttamam | sattvād-adhi mahān-ātmā mahato'vyaktam-uttamam || 7 (6.7) ||

💡

यमराज ने पुनः क्रम दोहराया— 'इंद्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि (सत्त्व) है, बुद्धि से श्रेष्ठ महान आत्मा है, और महान आत्मा से श्रेष्ठ अव्यक्त (प्रकृति) है।'

मंत्र 110

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति॥८॥

•

avyaktāt-tu paraḥ puruṣo vyāpako'liṅga eva ca | yaṃ jñāत्वा mucyate jantur-amṛtatvaṃ ca gaccati || 8 (6.8) ||

💡

यमराज ने कहा— 'अव्यक्त से परे वह परम पुरुष (परमात्मा) है जो सर्वव्यापी और लिंग-रहित (चिह्न-रहित/निराकार) है, जिसे जानकर जीवात्मा मुक्त हो जाता है और अमरता को प्राप्त करता है।'

मंत्र 111

न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥९॥

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na saṃdṛśe tiष्ठति rūpam-asya na cakṣuṣā paśyati kaścanainam | hṛdā manīṣā manasābhiklṛpto ya etad-vidur-amṛtās-te bhavanti || 9 (6.9) ||

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यमराज ने कहा— 'इस परमात्मा का स्वरूप आँखों के सामने दिखाई नहीं देता, कोई भी इसे आँखों से नहीं देख सकता। यह हृदय में स्थित बुद्धि और मन की शुद्धता (मनीषा) द्वारा अनुभव किया जाता है। जो इसे इस प्रकार जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं।'

मंत्र 112

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्॥१०॥

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yadā pañcāvatiṣṭhante jñānāni manasā saha | buddhiś-ca na viceṣṭate tām-āhuḥ paramāṃ gatim || 10 (6.10) ||

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यमराज ने योग की परिभाषा दी— 'जब पांचों ज्ञानेंद्रियां मन के सहित शांत हो जाती हैं, और बुद्धि भी किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करती (स्थिर हो जाती है), उस अवस्था को परम गति कहते हैं।'

मंत्र 113

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्। अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥११॥

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tāṃ yogam-iti manyante sthirām-indriya-dhāraṇām | apramattas-tadā bhavati yogo hi prabhavāpyayau || 11 (6.11) ||

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यमराज ने कहा— 'इंद्रियों की उस स्थिर धारणा (नियंत्रण) को ही "योग" मानते हैं। उस समय साधक सर्वथा प्रमाद-रहित (सावधान) हो जाता है, क्योंकि योग की अवस्था आती और जाती है (अतः सतत सावधानी आवश्यक है)।'

मंत्र 114

नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा। अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते॥१२॥

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naiva vācā na manasā prāptuṃ śakyo na cakṣuṣā | astīti bruvato'nyatra kathaṃ tad-upalabhyate || 12 (6.12) ||

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यमराज ने कहा— 'वह परमात्मा न वाणी से, न मन से, और न आँखों से ही प्राप्त किया जा सकता है। "वह अस्तित्ववान है (अस्ति)"— ऐसा कहने वाले के अतिरिक्त वह किसी अन्य को कैसे प्राप्त हो सकता है?'

मंत्र 115

अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः। अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति॥१३॥

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astīty-evopalabdhavyas-tattva-bhāvena cobhayoḥ | astīty-evopalabdhasya tattva-bhāvaḥ prasīdati || 13 (6.13) ||

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यमराज ने कहा— 'उस परमात्मा को "वह है (अस्ति)" इस रूप में और उसके वास्तविक स्वरूप (तत्त्वभाव) इन दोनों रूपों में जानना चाहिए। जब मनुष्य उसे "वह है" इस रूप में दृढ़ता से स्वीकार कर लेता है, तब उसका वास्तविक स्वरूप उस पर प्रकट हो जाता है।'

मंत्र 116

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥१४॥

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yadā sarve pramucyante kāmā ye'sya hṛdi śritāḥ | atha martyo'mṛto bhavaty-atra brahma samaśnute || 14 (6.14) ||

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यमराज ने कहा— 'जब हृदय में आश्रय लेकर रहने वाली मनुष्य की संपूर्ण सांसारिक कामनाएं सर्वथा नष्ट हो जाती हैं, तब मरणधर्मा मनुष्य अमर हो जाता है और इसी शरीर में ब्रह्म का अनुभव कर लेता है।'

मंत्र 117

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥१५॥

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yadā sarve prabhidyante hṛdayasyeha granthayaḥ | atha martyo'mṛto bhavaty-etāvaddhy-anuśāsanam || 15 (6.15) ||

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यमराज ने कहा— 'जब हृदय की अज्ञान जनित सभी ग्रंथियां (गांठें) यहीं टूट जाती हैं, तब मरणधर्मा मनुष्य अमर हो जाता है। बस, इतना ही संपूर्ण शास्त्रों का उपदेश है।'

मंत्र 118

शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति॥१६॥

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śataṃ caikā ca हृदयस्य nāḍyastāsāṃ mūrdhānam-abhiniḥsṛtaikā | tayordhvam-āyann-amṛtatvam-eti viṣvaṅṅ-anyā utkramaṇe bhavanti || 16 (6.16) ||

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यमराज ने देहोत्क्रमण का मार्ग बताया— 'हृदय की एक सौ एक मुख्य नाड़ियां हैं, उनमें से एक नाड़ी (सुषुम्णा) मस्तक के मध्य भाग की ओर ऊपर गई है। मृत्यु के समय उसके द्वारा ऊपर की ओर जाने वाला मनुष्य अमरता को प्राप्त करता है। अन्य नाड़ियां शरीर के अन्य द्वारों से निकलने वाली हैं जो संसृति (पुनर्जन्म) का कारण बनती हैं।'

मंत्र 119

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण। तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति॥१७॥

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aṅguṣṭhamātraḥ puruṣo'ntarātmā sadā janānāṃ hṛdeye saṃniviṣṭhaḥ | taṃ svāc-charīrāt-pravṛhen-muñjād-iveṣīkāṃ dhairyeṇa | taṃ vidyāc-chukram-amṛtaṃ taṃ vidyāc-chukram-amṛtam-iti || 17 (6.17) ||

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यमराज ने कहा— 'अंगूठे के परिमाण वाला अंतरात्मा पुरुष सदा सभी मनुष्यों के हृदय में स्थित रहता है। साधक को चाहिए कि वह मूंज घास में से उसकी सींक की तरह, धैर्यपूर्वक उसे अपने शरीर से पृथक कर ले। उसे ही शुद्ध और अमर जानो; हाँ, उसे ही परम शुद्ध और अमर जानो।'

मंत्र 120

मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्। ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्यु रन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव॥१८॥

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mṛtyu-proktāṃ nāciketo'tha labdhvā vidyām-etāṃ yoga-vidhiṃ ca kṛtsnam | brahmaprāpto virajo'bhūd-vimṛtyur-anyo'py-evaṃ yo vid-adhyātmam-eva || 18 (6.18) ||

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यमराज द्वारा उपदिष्ट इस ब्रह्मविद्या और संपूर्ण योग विधि को प्राप्त करके, नचिकेता राग-द्वेष से रहित (विरज) और मृत्यु-भय से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त हो गया। जो कोई अन्य मनुष्य भी इस अध्यात्म विद्या को इसी प्रकार जान लेता है, वह भी ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

शांति पाठ

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om saha nāvavatu | saha nau bhunaktu | saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

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हे परमात्मा! आप हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ मिलकर पुरुषार्थ और सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारी पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी हो, और हम आपस में कभी द्वेष न करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

कृष्ण यजुर्वेद
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पठन और मनन सम्पूर्ण

आपने श्री कठोपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।