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कर्मसंन्यासयोग

Karma Sannyasa Yoga • अध्याय 5

18
अध्याय सारांश

कर्मसंन्यासयोग

कर्म संन्यास और निष्काम कर्म योग की तुलना, और यह प्रतिपादन कि आंतरिक अनासक्ति ही परम शांति का मार्ग है।

श्लोक 1

अर्जुन उवाच | संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि | यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ||५-१||

Meaning (Hindi)

अर्जुन बोले — हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।

Meaning (English)

Arjuna said: O Krishna! You praise renunciation of actions, and then again Yoga (action). Tell me conclusively which one of these two is better.

🪔
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श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच | संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ | तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ||५-२||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — कर्मसंन्यास और कर्मयोग — दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं; परन्तु इन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।

Meaning (English)

Krishna said: Both renunciation of action and the Yoga of action lead to the highest good; but of the two, the Yoga of action is superior to the renunciation of action.

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श्लोक 3

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति | निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ||५-३||

Meaning (Hindi)

जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की कामना, वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि हे महाबाहो! द्वन्द्वों से रहित पुरुष सरलता से बंधन से मुक्त हो जाता है।

Meaning (English)

He who neither hates nor desires should be known as a perpetual renunciant (Sannyasi); for, O mighty-armed Arjuna, one who is free from all pairs of opposites is easily liberated from bondage.

🪔
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श्लोक 4

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः | एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ||५-४||

Meaning (Hindi)

अल्पज्ञानी लोग सांख्य और योग को अलग-अलग मानते हैं, परन्तु पंडित नहीं। जो किसी एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित है, वह दोनों का फल पा लेता है।

Meaning (English)

The childish (unwise), not the wise, speak of Sankhya (knowledge) and Yoga (action) as separate. One who is truly established in even one of them attains the fruit of both.

🪔
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श्लोक 5

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते | एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ||५-५||

Meaning (Hindi)

जो स्थान ज्ञानियों (सांख्ययोगियों) द्वारा प्राप्त किया जाता है, वही कर्मयोगियों द्वारा भी प्राप्त किया जाता है। जो सांख्य और योग को एक (समान फलदायी) देखता है, वही सच्चा दृष्टा है।

Meaning (English)

The state reached by the followers of Sankhya (knowledge) is also reached by the followers of Yoga (action). He who sees Sankhya and Yoga as one — he truly sees.

🪔
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श्लोक 6

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः | योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ||५-६||

Meaning (Hindi)

परन्तु हे महाबाहो! योग के बिना संन्यास प्राप्त करना कठिन है; किन्तु योगयुक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त होता है।

Meaning (English)

But O mighty-armed Arjuna, renunciation is hard to attain without Yoga; the sage who is harmonised by Yoga quickly attains Brahman.

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श्लोक 7

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः | सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ||५-७||

Meaning (Hindi)

जो योगयुक्त, विशुद्ध अन्तःकरण वाला, मन-शरीर को जीतने वाला, जितेन्द्रिय और सभी प्राणियों में आत्मा को देखने वाला है — वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।

Meaning (English)

He who is devoted to Yoga, whose mind is pure, who has conquered the self, who has subdued the senses, and who sees his Self as the Self in all beings — though he acts, he is not tainted.

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श्लोक 8

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् | पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ||५-८||

Meaning (Hindi)

मैं कुछ भी नहीं करता' — इस प्रकार तत्त्व को जानने वाला योगी निश्चय जानता है; चाहे वह देख रहा हो, सुन रहा हो, स्पर्श कर रहा हो, सूंघ रहा हो, खा रहा हो, चल रहा हो, सो रहा हो, श्वास ले रहा हो —

Meaning (English)

"I do nothing at all" — thus the knower of Truth, who is united with the Self, should know; whether seeing, hearing, touching, smelling, eating, walking, sleeping, or breathing —

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श्लोक 9

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ||५-९||

Meaning (Hindi)

बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए, आँखें खोलते और बंद करते हुए — यह निश्चय रखते हुए कि सभी इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में विचरण कर रही हैं।

Meaning (English)

Speaking, releasing, grasping, opening and closing the eyes — being firmly convinced that the senses move only among sense-objects.

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श्लोक 10

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः | लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||५-१०||

Meaning (Hindi)

जो पुरुष सब कर्म ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है — वह पाप से उसी तरह लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं भीगता।

Meaning (English)

He who performs actions by offering them to Brahman and abandoning all attachment is not tainted by sin, just as a lotus leaf is untouched by water.

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श्लोक 11

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि | योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ||५-११||

Meaning (Hindi)

योगीजन आत्मशुद्धि के लिए आसक्ति को त्यागकर शरीर, मन, बुद्धि और केवल इन्द्रियों द्वारा कर्म करते हैं।

Meaning (English)

Yogis perform actions only with body, mind, intellect and even the senses, having abandoned attachment, for the purification of the self.

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श्लोक 12

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् | अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ||५-१२||

Meaning (Hindi)

संयत पुरुष कर्मफल को त्यागकर परम शान्ति प्राप्त करता है; और असंयत पुरुष कामना के कारण फल में आसक्त होकर बँध जाता है।

Meaning (English)

The disciplined (Yukta) person, having abandoned the fruit of action, attains lasting peace; but the undisciplined person, driven by desire and attached to the fruit, remains bound.

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श्लोक 13

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी | नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ||५-१३||

Meaning (Hindi)

संयमी पुरुष मन से सब कर्मों का संन्यास करके, न खुद कर्म करता है और न करवाता है — वह नौ द्वारों वाली शरीर रूपी नगरी में सुखपूर्वक रहता है।

Meaning (English)

The self-controlled person, mentally renouncing all actions, dwells happily in the nine-gated city (the body), neither acting himself nor causing others to act.

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श्लोक 14

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः | न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ||५-१४||

Meaning (Hindi)

परमेश्वर मनुष्यों के लिए न कर्तृत्व, न कर्म और न कर्मफल का संयोग उत्पन्न करता है। यह सब तो प्रकृति (स्वभाव) ही करती है।

Meaning (English)

The Lord creates neither the sense of doership, nor the actions, nor the union of actions with their fruits for anyone. It is Nature (Prakriti) alone that acts.

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श्लोक 15

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः | अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ||५-१५||

Meaning (Hindi)

सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पाप को और न किसी के पुण्य को ग्रहण करता है। अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है, इसीलिए सभी जीव मोह को प्राप्त होते हैं।

Meaning (English)

The all-pervading Lord accepts neither the sin nor the merit of anyone. Knowledge is veiled by ignorance — that is why all beings fall into delusion.

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श्लोक 16

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः | तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ||५-१६||

Meaning (Hindi)

परन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो जाता है, उनके लिए वह ज्ञान सूर्य की भाँति परमात्मा (परम तत्त्व) को प्रकाशित कर देता है।

Meaning (English)

But for those whose ignorance is destroyed by the knowledge of the Self, that knowledge — like the sun — illumines the Supreme (Brahman).

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श्लोक 17

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः | गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ||५-१७||

Meaning (Hindi)

जिनकी बुद्धि उसी (परमात्मा) में स्थित है, जिनका मन उसी में तल्लीन है, उसी में जिनकी निष्ठा है और वही जिनका परम लक्ष्य है — ऐसे ज्ञान द्वारा पाप-रहित पुरुष पुनर्जन्म से मुक्त हो जाते हैं।

Meaning (English)

Those whose intellect is absorbed in That (Brahman), whose self is That, who are established in That, who have That as their supreme goal — their sins washed away by knowledge, they go to a state of no return.

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श्लोक 18

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि | शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ||५-१८||

Meaning (Hindi)

ऐसे ज्ञानीजन विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समभाव से देखते हैं।

Meaning (English)

Such wise persons see with equal eyes a learned and humble Brahmana, a cow, an elephant, a dog, and even an outcast.

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श्लोक 19

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः | निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः ||५-१९||

Meaning (Hindi)

जिनका मन समभाव में स्थित है, उन्होंने यहीं (इसी जीवन में) सृष्टि को जीत लिया; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

Meaning (English)

Those whose mind is established in equanimity have conquered creation (the cycle of birth and death) even here; since Brahman is spotless and equal, they are established in Brahman.

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श्लोक 20

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् | स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ||५-२०||

Meaning (Hindi)

स्थिर बुद्धि वाला, मोह-रहित, ब्रह्म को जानने वाला, ब्रह्म में स्थित पुरुष — न प्रिय वस्तु पाकर प्रसन्न होता है और न अप्रिय पाकर व्याकुल।

Meaning (English)

The knower of Brahman, with steady intellect, free from delusion, established in Brahman — neither rejoices on obtaining what is pleasant, nor grieves on obtaining what is unpleasant.

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श्लोक 21

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् | स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ||५-२१||

Meaning (Hindi)

जो पुरुष बाह्य विषयों में आसक्त नहीं है, वह आत्मा में ही सुख पाता है। ब्रह्म के ध्यान में लगे हुए ऐसे पुरुष को अक्षय (अविनाशी) सुख की प्राप्ति होती है।

Meaning (English)

He whose mind is unattached to external sense-contacts finds happiness within the Self. Such a person, with the self united in meditation on Brahman, attains everlasting bliss.

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श्लोक 22

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते | आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ||५-२२||

Meaning (Hindi)

हे कौन्तेय! इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न जो भोग हैं — वे दुःख के ही कारण हैं, क्योंकि उनका आदि और अंत होता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनमें आनन्द नहीं लेता।

Meaning (English)

O Arjuna! The pleasures born of contact with sense-objects are only sources of pain, for they have a beginning and an end. The wise person does not find delight in them.

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श्लोक 23

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् | कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ||५-२३||

Meaning (Hindi)

जो मनुष्य इस लोक में, शरीर छोड़ने से पहले ही, काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है — वही योगी है, वही सुखी मनुष्य है।

Meaning (English)

He who is able, right here in this world and before leaving the body, to withstand the impulse arising from desire and anger — he is a true Yogi, he is a truly happy person.

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श्लोक 24

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः | स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ||५-२४||

Meaning (Hindi)

जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुखी है, आत्मा में ही आनन्दित है और आत्मा में ही प्रकाश पाता है — वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्मनिर्वाण (परम मोक्ष) को प्राप्त होता है।

Meaning (English)

He who finds happiness within, who rejoices within, and who is illumined from within — that Yogi, becoming one with Brahman, attains Brahma-nirvana (absolute liberation).

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श्लोक 25

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः | छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ||५-२५||

Meaning (Hindi)

वे ऋषिगण, जिनके पाप नष्ट हो गए हैं, जो सभी संशयों से मुक्त हैं, संयमी हैं और सभी प्राणियों के हित में रत हैं — वे ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।

Meaning (English)

Those sages whose sins are destroyed, whose doubts are cut asunder, who are self-controlled, and who are devoted to the welfare of all beings — they attain Brahma-nirvana (liberation).

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श्लोक 26

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् | अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ||५-२६||

Meaning (Hindi)

काम और क्रोध से मुक्त, संयत चित्त वाले तथा आत्मा को जानने वाले संन्यासियों के लिए — सब ओर ब्रह्मनिर्वाण (मोक्षानंद) विद्यमान रहता है।

Meaning (English)

For those self-controlled ascetics who are free from desire and anger, who have restrained their minds, and who have realised the Self — Brahma-nirvana (divine bliss) exists on all sides.

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श्लोक 27

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः | प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ||५-२७||

Meaning (Hindi)

बाह्य विषयों को बाहर ही रोककर, दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच स्थिर करके, नासिका में चलने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके —

Meaning (English)

Shutting out all external sense-contacts, fixing the gaze between the two eyebrows, and equalising the outgoing and incoming breaths moving within the nostrils —

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श्लोक 28

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः | विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ||५-२८||

Meaning (Hindi)

इन्द्रियों, मन और बुद्धि को संयत रखने वाला, मोक्ष को परम लक्ष्य मानने वाला, इच्छा, भय और क्रोध से रहित मुनि — सदा के लिए मुक्त ही है।

Meaning (English)

The sage whose senses, mind and intellect are controlled, who has liberation as his supreme goal, who is free from desire, fear and anger — he is truly and forever liberated.

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श्लोक 29

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् | सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ||५-२९||

Meaning (Hindi)

मुझे यज्ञों और तपों का भोक्ता, सम्पूर्ण लोकों का महान् ईश्वर और सभी प्राणियों का सच्चा मित्र जानकर — साधक परम शान्ति को प्राप्त होता है।

Meaning (English)

Knowing Me as the enjoyer of all sacrifices and austerities, the great Lord of all worlds, and the sincere friend of all beings — the seeker attains supreme peace.

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