

Moksha Sannyasa Yoga • अध्याय 18
संपूर्ण गीता का सारांश उपदेश: त्याग, कर्तव्य की शुद्धता, और भगवान की शरण में जाने पर मिलने वाले परम मोक्ष का अंतिम आश्वासन।
अर्जुन उवाच | संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् | त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ||१८-१||
अर्जुन बोले — हे महाबाहो! हे हृषीकेश! मैं संन्यास और त्याग का अलग-अलग तत्त्व जानना चाहता हूँ।
Arjuna said: O mighty-armed Krishna! I wish to know the truth about renunciation and surrender separately.
श्रीभगवानुवाच | काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः | सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ||१८-२||
श्रीकृष्ण बोले — कुछ विद्वान काम्य कर्मों के त्याग को 'संन्यास' कहते हैं; और विचारशील लोग समस्त कर्मों के फलों के त्याग को 'त्याग' कहते हैं।
Krishna said: The sages call the giving up of desire-motivated actions 'renunciation'; and the wise call the giving up of the fruits of all actions 'surrender.'
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः | यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ||१८-३||
कुछ विचारक कहते हैं कि सभी कर्म दोषयुक्त होने से त्यागनीय हैं; और अन्य लोग कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप को नहीं छोड़ना चाहिए।
Some thinkers say that all actions should be abandoned as they are tainted with flaws; others say that acts of sacrifice, charity, and austerity should not be given up.
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम | त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ||१८-४||
हे भरतश्रेष्ठ! इस विषय में मेरा निर्णय सुनो। त्याग तीन प्रकार का कहा गया है।
O best of the Bharatas, hear My conclusion on this matter. Surrender has been said to be of three kinds.
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् | यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ||१८-५||
यज्ञ, दान और तप के कर्म त्याज्य नहीं हैं — ये तो अवश्य करने चाहिए। यज्ञ, दान और तप ज्ञानीयों को पवित्र करने वाले हैं।
Acts of sacrifice, charity, and austerity should not be given up — they must indeed be performed. Sacrifice, charity, and austerity purify even the wise.
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च | कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ||१८-६||
हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फल को त्यागकर करना चाहिए — यही मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
O Arjuna, even these actions should be performed giving up attachment and the desire for results — this is My definite and highest view.
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते | मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ||१८-७||
नियत कर्म का त्याग उचित नहीं; मोहवश उसका त्याग करना तामसिक त्याग कहलाता है।
Giving up a prescribed duty is not right; abandoning it out of delusion is called Tamasic surrender.
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् | स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ||१८-८||
जो व्यक्ति कर्म को दुःखदायक समझकर शारीरिक कष्ट के डर से छोड़ देता है, वह राजसिक त्याग करता है और त्याग का फल नहीं पाता।
One who gives up action because it is painful or out of fear of physical trouble — that is Rajasic surrender and does not bring the fruit of surrender.
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन | सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ||१८-९||
हे अर्जुन! 'यह करना मेरा कर्तव्य है' — ऐसा जानकर, आसक्ति और फल की इच्छा छोड़कर जो नियत कर्म किया जाए — वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
O Arjuna, the action that is performed as duty, with the thought 'this must be done,' giving up attachment and desire for results — that is considered Sattvic surrender.
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते | त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ||१८-१०||
जो त्यागी सत्त्वगुण से युक्त, मेधावी और संशयरहित है — वह अशुभ कर्म से द्वेष नहीं करता और शुभ कर्म में आसक्त नहीं होता।
One who is a true renouncer, imbued with Sattva, clear-minded, and without doubt — neither hates unpleasant action nor is attached to pleasant action.
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः | यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ||१८-११||
देहधारी पुरुष के लिए समस्त कर्मों का संपूर्ण त्याग संभव नहीं; इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी कहलाता है।
For an embodied being, it is not possible to completely give up all actions; but one who gives up the fruits of action is called a true renouncer.
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् | भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ||१८-१२||
अत्यागी लोगों को मृत्यु के बाद कर्मों का शुभ, अशुभ और मिश्र — तीनों प्रकार का फल मिलता है; किन्तु संन्यासियों को कभी नहीं।
After death, those who have not surrendered receive threefold fruit of their actions — desirable, undesirable, and mixed. But for renunciates, there is none.
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे | साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ||१८-१३||
हे महाबाहो! सांख्य सिद्धांत में समस्त कर्मों की सिद्धि के लिए ये पाँच कारण कहे गए हैं — इन्हें मुझसे जानो।
O mighty-armed, in the Sankhya teaching these five causes have been stated for the accomplishment of all actions — know them from Me.
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् | विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ||१८-१४||
शरीर (अधिष्ठान), कर्ता, विविध इंद्रियाँ, विविध प्रकार की चेष्टाएं, और पाँचवां कारण दैव — ये पाँच हैं।
The body (the seat of action), the doer, the various senses, the various kinds of effort, and the fifth — Divine Providence — these are the five.
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः | न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ||१८-१५||
मनुष्य अपने शरीर, वाणी और मन से जो कोई भी उचित या अनुचित कर्म करता है, उसके ये पाँचों कारण ही हैं।
Whatever action a person performs with body, speech, or mind — whether right or wrong — these five are its causes.
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः | पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ||१८-१६||
एसा होने पर भी जो असंस्कारित बुद्धि वाला व्यक्ति केवल शुद्ध आत्मा को कर्ता समझता है, वह दुर्मति यथार्थ नहीं देखता।
That being so, one whose understanding is not purified still sees the pure Self as the sole doer — that person sees incorrectly.
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते | हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ||१८-१७||
जिसके भीतर अहंकार का भाव नहीं और जिसकी बुद्धि किसी गुण-दोष से लिप्त नहीं होती — वह इन सबको मारकर भी वास्तव में न मारता है और न बँधता है।
One who has no ego-sense, whose intelligence is untainted — even if this person kills all these people, truly does not kill and is not bound.
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना | करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ||१८-१८||
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता — ये तीन कर्म की प्रेरणाएं हैं; और इंद्रिय, कर्म और कर्ता — ये तीन कर्म के आधार हैं।
Knowledge, the known, and the knower — these three are the impulses of action; and the senses, the action, and the doer — these three are the basis of action.
ज्ञानं कर्म च कर्ताच त्रिधैव गुणभेदतः | प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ||१८-१९||
ज्ञान, कर्म और कर्ता — गुणों के भेद से तीनों तीन-तीन प्रकार के कहे गए हैं — इन्हें मुझसे यथावत् सुनो।
Knowledge, action, and doer are said to be of three kinds according to the distinction of the qualities. Hear them duly from Me.
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते | अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ||१८-२०||
जिस ज्ञान से व्यक्ति समस्त भूतों में एक अविनाशी सत्ता को अविभक्त रूप में देखता है — उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।
That knowledge by which one sees a single, imperishable Reality in all beings, undivided within the divided — know that knowledge to be Sattvic.
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् | वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ||१८-२१||
जो ज्ञान समस्त भूतों में अलग-अलग नाना भावों को पृथक्-पृथक् देखता है, उस ज्ञान को राजसिक जानो।
That knowledge which sees many and various kinds of beings in all creatures as separate — know that knowledge to be Rajasic.
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् | अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ||१८-२२||
और जो ज्ञान एक ही वस्तु में आसक्त हो जाता है, मानो वही सब कुछ है, अतर्कसंगत, सत्य से रहित और संकुचित — वह तामसिक कहलाता है।
And that knowledge which clings to one single thing as if it were everything, which has no rational basis, is shallow, and misses the truth — that is declared Tamasic.
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् | अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ||१८-२३||
जो कर्म शास्त्रविधि से नियत, आसक्तिरहित, राग-द्वेष से मुक्त होकर, फल की इच्छा किए बिना किया जाए — वह सात्त्विक कर्म कहलाता है।
The action that is prescribed, performed without attachment, without desire or aversion, and without longing for results — that action is called Sattvic.
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः | क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ||१८-२४||
किन्तु जो कर्म फल की कामना से या अहंकार सहित बहुत परिश्रम से किया जाता है — वह राजसिक कर्म कहलाता है।
But the action that is performed with great effort, driven by desire for results, or out of ego — that is called Rajasic.
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् | मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ||१८-२५||
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य का विचार किए बिना केवल मोहवश शुरू किया जाए — वह तामसिक कर्म कहलाता है।
The action that is undertaken out of delusion, without considering one's capacity, consequences, loss, or harm to others — that is called Tamasic.
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः | सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ||१८-२६||
जो कर्ता आसक्तिरहित, अहंकाररहित, धैर्य और उत्साहयुक्त है, और सफलता-विफलता में निर्विकार रहता है — वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
The doer who is free from attachment, free from ego-talk, filled with steadiness and enthusiasm, and is unchanged in success or failure — is called a Sattvic doer.
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः | हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ||१८-२७||
रागी, कर्मफल का इच्छुक, लोभी, हिंसात्मक स्वभाव, अशुद्ध और हर्ष-शोक से भरा कर्ता राजसिक कहलाता है।
The doer who is passionate, desiring the fruits of action, greedy, violent by nature, impure, and overcome by joy and sorrow — is called a Rajasic doer.
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः | विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ||१८-२८||
असंयत, अशिक्षित, घमंडी, दगाबाज़, दूसरों का अहित करने वाला, आलसी, विषादी और काम टालने वाला कर्ता तामसिक कहलाता है।
The doer who is undisciplined, uneducated, arrogant, deceitful, harmful to others, lazy, despondent, and always procrastinating — is called a Tamasic doer.
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु | प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ||१८-२९||
हे धनंजय! मेरे द्वारा विस्तार से कही जाने वाली, गुणों से उतपन्न बुद्धि और धृति के तीनों भेदों को सुनो।
O Dhananjaya, hear the threefold distinction of intellect and resolve, described in full according to the qualities.
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये | बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ||१८-३०||
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय और अभय, बंधन और मोक्ष को तत्त्वत: जानती है — वह सात्त्विक बुद्धि है।
O Arjuna, the intellect that knows what action is and what it is not, what should be done and what should not be done, what is fear and what is fearlessness, what is bondage and what is liberation — that intellect is Sattvic.
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च | अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ||१८-३१||
हे पार्थ! जिस बुद्धि से धर्म और अधर्म, कर्तव्य और अकर्तव्य को यथावत् नहीं जाना जाता — वह राजसिक बुद्धि है।
O Arjuna, the intellect that does not correctly understand what is right and what is wrong, what should be done and what should not be done — that intellect is Rajasic.
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता | सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ||१८-३२||
हे पार्थ! अज्ञान के अंधकार से ढकी जो बुद्धि अधर्म को ही धर्म समझती है और सब वस्तुओं को उलटा देखती है — वह तामसिक बुद्धि है।
O Arjuna, the intellect wrapped in darkness that sees wrong as right and sees all things upside-down — that is a Tamasic intellect.
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः | योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ||१८-३३||
हे पार्थ! जो अव्यंग धृति योग से मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं को धारण करती है — वह सात्त्विक धृति है।
O Arjuna, the resolve by which one holds steady the activities of the mind, the life-breath, and the senses through unwavering yoga — that is a Sattvic resolve.
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन | प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ||१८-३४||
हे अर्जुन! जो धृति अति आसक्ति से धर्म, अर्थ और काम को फल की इच्छा से धारण करती है — वह राजसिक धृति है।
O Arjuna, the resolve by which one holds duty, pleasure, and wealth with great attachment, desiring their fruits — that is a Rajasic resolve.
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च | न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ||१८-३५||
हे पार्थ! जिस ध्रिति से दुर्बुद्धि व्यक्ति नींद, भय, शोक, विषाद और घमंड को नहीं छोड़ता — वह तामसिक ध्रिति है।
O Arjuna, the resolve by which a foolish person does not let go of sleep, fear, grief, despair, and pride — that is a Tamasic resolve.
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ | अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ||१८-३६||
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख के बारे में मुझसे सुनो; जिसमें अभ्यास से रमन होता है और दुःखों का अंत होता है।
O best of the Bharatas, now hear from Me the threefold happiness — in which one finds delight through practice and reaches the end of suffering.
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् | तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ||१८-३७||
जो सुख पहले विष जैसा लगता है किन्तु परिणाम में अमृत जैसा है — वह आत्मबुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न सुख सात्त्विक कहलाता है।
That happiness which feels like poison at first but like nectar in the end — born from the clarity of self-knowledge — that is called Sattvic happiness.
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||१८-३८||
जो सुख विषयों और इंद्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है, पहले अमृत की तरह किन्तु अंत में विष की तरह — वह राजसिक सुख कहलाता है।
That happiness which arises from the contact of the senses with their objects — first like nectar but in the end like poison — that is called Rajasic happiness.
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः | निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ||१८-३९||
जो सुख प्रारंभ और बाद में आत्मा को मोहित करता है, जो नींद, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है — वह तामसिक सुख कहलाता है।
That happiness which deludes the self both in the beginning and in the end, arising from sleep, laziness, and carelessness — that is called Tamasic happiness.
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः | सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ||१८-४०||
पृथ्वी पर या स्वर्ग के देवताओं में ऐसा कोई प्राणी नहीं जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से मुक्त हो।
There is no being on earth or in heaven among the gods who is free from these three qualities born of Nature.
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप | कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ||१८-४१||
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं।
O Arjuna, the duties of Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, and Shudras are divided according to the qualities born from their own nature.
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||१८-४२||
शम, दम, तप, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता — ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं।
Serenity, self-control, austerity, purity, forgiveness, uprightness, knowledge, wisdom, and belief in God — these are the natural duties of a Brahmin.
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ||१८-४३||
शौर्य, तेज, धैर्य, निपुणता, युद्ध में न भागना, दान, और ईश्वरीय स्वभाव — ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं।
Valor, vigor, courage, skill, not fleeing in battle, generosity, and a kingly character — these are the natural duties of a Kshatriya.
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ||१८-४४||
खेती, गोपालन और व्यापार — ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं; और सेवा शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।
Agriculture, cattle-rearing, and trade — these are the natural duties of a Vaishya; and service is the natural duty of a Shudra.
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः | स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||१८-४५||
मनुष्य अपने-अपने कर्मों में तत्पर रहकर परमसिद्धि को प्राप्त कर सकता है। यह सिद्धि कैसे प्राप्त होती है — सुनो।
Each person, devoted to their own natural duty, can attain the highest perfection. Hear how this perfection is attained.
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ||१८-४६||
जिस कारण से समस्त प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, जिससे यह सारा जगत परिपूर्ण है — उसकी पूजा से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
By worshipping through one's own duty that Being from whom all creatures arise and by whom all this is pervaded — a person attains perfection.
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||१८-४७||
अपने धर्म की अपेक्षा अन्य के धर्म को अच्छी तरह निभाना स्वीकार्य नहीं। अपने स्वभावनुसार किया गया कर्म, चाहे दोषयुक्त हो, पाप नहीं लगाता।
Better is one's own duty, though imperfectly performed, than the duty of another well discharged. Performing the duty ordained by one's own nature, one does not incur sin.
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् | सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ||१८-४८||
हे अर्जुन! दोष से युक्त स्वाभाविक कर्म को भी नहीं छोड़ना चाहिए, जैसे धुएँ से अग्नि ढकी होती है, वैसे ही सभी कर्म किसी न किसी दोष से ढके हैं।
O Arjuna, one should not abandon one's natural duty even if it has flaws — for all undertakings are covered by some imperfection, just as fire is covered by smoke.
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः | नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ||१८-४९||
जिसकी बुद्धि हर जगह आसक्तिरहित है, जिसने अपने आप को जीत लिया है, जिसमें कामना नहीं — वह संन्यास से सर्वोच्च सिद्धि को प्राप्त होता है।
One whose intellect is unattached everywhere, who has conquered the self, from whom desire has departed — through renunciation such a person attains the supreme state of freedom from action.
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे | समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ||१८-५०||
हे अर्जुन! वह सर्वोच्च सिद्धि क्या है और कैसे मिलती है — यह संक्षेप में मुझसे सुनो, जो ज्ञान की पराकाष्ठा है।
O Arjuna, learn from Me in brief how one who has attained perfection also attains Brahman — the highest culmination of knowledge.
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च | शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ||१८-५१||
शुद्ध बुद्धि से युक्त, मन को दृढ़ता से वश में करके, शब्द आदि विषयों को छोड़कर, राग-द्वेष को त्यागकर —
Endowed with a pure intellect, firmly controlling the self, giving up sound and other objects, setting aside attraction and aversion —
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः | ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ||१८-५२||
एकांत में रहकर, संयमित आहार लेकर, वाणी, शरीर और मन को वश में करके, ध्यानयोग में लगकर, वैराग्य का आश्रय लेकर —
Living in solitude, eating lightly, controlling speech, body, and mind, ever engaged in meditation, taking refuge in dispassion —
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् | विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ||१८-५३||
अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह को त्यागकर, शांत होकर — वह ब्रह्म बनने का अधिकारी हो जाता है।
Freeing oneself from ego, force, pride, desire, anger, and possessiveness, and with no sense of 'mine,' tranquil — such a one becomes fit to be one with Brahman.
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति | समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||१८-५४||
ब्रह्मभूत होकर, प्रसन्नात्मा, न किसी के लिए शोक करता है और न किसी की कामना करता है; सब प्राणियों में समभाव से देखता है — वह मेरी परम भक्ति को प्राप्त होता है।
Becoming one with Brahman, serene in self, one neither grieves nor desires. Seeing all beings equally, one attains supreme devotion to Me.
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः | ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ||१८-५५||
भक्ति से मुझे तत्त्वतः जानता है कि मैं कौन हूँ और कितना हूँ — फिर उस भक्ति से मुझे जानकर तत्काल मेरे में प्रवेश करता है।
Through devotion one comes to know Me in truth — who and how much I am. Then, knowing Me truly through that devotion, one enters into Me at once.
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः | मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ||१८-५६||
मेरा आश्रय लेकर, मेरी कृपा से, मेरे कर्म करते हुए भी वह सनातन अव्यय परम पद को प्राप्त होता है।
Taking refuge in Me, performing all actions always — by My grace one attains the eternal, imperishable supreme abode.
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः | बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ||१८-५७||
चित्त से सब कर्म मुझे अर्पण करके, मुझे परम गति मानकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर — निरंतर मुझमें चित्त लगाओ।
Mentally surrendering all actions to Me, holding Me as the Supreme, taking refuge in the yoga of wisdom — keep your mind fixed on Me always.
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि | अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ||१८-५८||
मुझमें ही चित्त लगाकर, मेरी कृपा से समस्त विघ्नों को पार करोगे; और यदि अहंकारवश न सुनोगे तो नष्ट हो जाओगे।
With your mind fixed on Me, you will overcome all difficulties by My grace. But if out of ego you do not listen, you will perish.
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे | मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ||१८-५९||
जो अहंकारवश मानता है 'मैं नहीं लड़ूँगा' — उसका यह निश्चय व्यर्थ है। तुम्हारा स्वभाव ही तुम्हें युद्ध में ले जाएगा।
If out of ego you think 'I will not fight' — your resolve is in vain. Your own nature will compel you to fight.
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा | कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत् ||१८-६०||
हे अर्जुन! तुम्हारा कर्म मोहवश तुम नहीं करना चाहते; अपने स्वभाव से उत्पन्न वह कर्म तुम्हें बाध्य कर देगा।
O Arjuna, what you out of delusion do not wish to do — you will be made to do by your own nature-born duty. You are bound by it.
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति | भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ||१८-६१||
हे अर्जुन! ईश्वर सबके हृदय में विराजमान है। वह माया से समस्त प्राणियों को यंत्र पर आरूढ़ की तरह घुमाता है।
O Arjuna, God dwells in the hearts of all beings. By His power of illusion, He causes all beings to revolve as if mounted on a machine.
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत | तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ||१८-६२||
हे भारत! उसी की शरण में जाओ — समस्त भाव से। उसकी कृपा से तुम परम शांति और शाश्वत धाम को प्राप्त होगे।
O Arjuna, take refuge in Him alone with all your heart. By His grace you will attain supreme peace and the eternal abode.
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया | विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ||१८-६३||
मैंने तुम्हें इस गुप्ततम ज्ञान को सुनाया है। इसे पूरी तरह विचारकर जो चाहो वही करो।
I have shared this most secret knowledge with you. Reflect on it fully, then do as you choose.
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः | इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ||१८-६४||
समस्त गोपनीय बातों में से सबसे गुप्त मेरी बात फिर सुनो — तुम मेरे अत्यंत प्रिय हो, इसलिए तुम्हें यह कहता हूँ —
Hear again My most secret word of all — you are My dearest, so I will tell you what is good for you —
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ||१८-६५||
मेरे में मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। तुम मुझे ही प्राप्त होगे — यह मैं सत्य वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे अत्यंत प्रिय हो।
Fix your mind on Me, be My devotee, worship Me, bow down to Me. You will come to Me. I promise you truly, for you are dear to Me.
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||१८-६६||
समस्त धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण तक आ जाओ — मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो।
Abandon all duties and come to Me alone for refuge. I will free you from all sins. Do not grieve.
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन | न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ||१८-६७||
यह ज्ञान कभी उसे न सुनाओ जो तपस्वी नहीं, जो भक्त नहीं, जो सुनना नहीं चाहता, और जो मुझमें दोष निकालता हो।
Never speak this to one who lacks austerity, who is not devoted, who does not wish to hear, or who finds fault with Me.
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति | भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ||१८-६८||
जो व्यक्ति मेरे भक्तों को यह गुप्ततम शास्त्र सुनाता है, वह निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होता है।
One who shares this supreme secret with My devotees — performing the highest devotion to Me — will come to Me without a doubt.
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः | भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ||१८-६९||
न कोई मनुष्य इससे अधिक प्रिय कार्य कर सकता है, न ही इस संपूर्ण पृथ्वी पर कोई मुझे इससे अधिक प्रिय होगा।
And no one among humans does anything more pleasing to Me than this; nor will there be anyone on this whole earth more dear to Me.
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः | ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ||१८-७०||
और जो व्यक्ति इस धर्मयुक्त संवाद का अध्ययन करेगा, वह ज्ञानयज्ञ से मुझे पूजेगा — ऐसा मेरा मत है।
And one who studies this sacred dialogue of ours — by them I will be worshipped through the sacrifice of knowledge. This is My view.
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः | सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ||१८-७१||
और जो श्रद्धा से, दोष न निकालते हुए, सुनता है — वह भी मुक्त होकर शुभकर्मियों के उत्तम लोकों को प्राप्त होता है।
And even the one who only listens with faith and without finding fault — even they, freed from sin, will reach the auspicious worlds of those who do good.
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा | कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ||१८-७२||
हे पार्थ! क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनंजय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हो गया?
O Arjuna, have you listened to this with a focused mind? O Dhananjaya, has your delusion born of ignorance been destroyed?
अर्जुन उवाच | नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||१८-७३||
अर्जुन बोले — हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है। मुझे स्मृति मिल गई है। मैं निर्डर होकर खड़ा हूँ — आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।
Arjuna said: O Achyuta! By Your grace my delusion has been destroyed. My memory has returned. I stand free from doubt. I will do Your bidding.
सञ्जय उवाच | इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः | संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ||१८-७४||
संजय बोले — इस प्रकार मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत पवित्र संवाद को सुना।
Sanjaya said: Thus I heard this wonderful, sacred conversation between Krishna and the great-souled Arjuna.
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् | योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ||१८-७५||
व्यासजी की कृपा से मुझे यह गुप्ततम योग साक्षात स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण से सुनने का सौभाग्य मिला।
By the grace of Vyasa, I heard this most secret yoga directly from Krishna, the Lord of Yoga Himself.
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् | केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ||१८-७६||
हे राजन्! इस पवित्र, अद्भुत और हर्षवर्धक संवाद को बार-बार स्मरण करके मेरा मन बार-बार पुलकित होता है।
O King, as I recall again and again this wonderful, holy conversation, I am thrilled with joy every time.
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः | विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ||१८-७७||
हे राजन्! कृष्ण का वह अति अद्भुत रूप भी मुझे बार-बार याद आता है; और मेरा मन बार-बार विस्मय से भर जाता है।
O King, as I recall again and again that most wondrous form of Krishna, great is my amazement; and I rejoice again and again.
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः | तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||१८-७८||
हे राजन्! जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं — वहीं श्री, विजय, विभूति और अटल नीति है — ऐसा मेरा निश्चित विचार है।
Wherever there is Krishna, the Lord of Yoga, and wherever there is Arjuna, the archer — there will be prosperity, victory, greatness, and unwavering righteousness. This is my firm conviction.