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गुणत्रयविभागयोग

Gunatraya Vibhaga Yoga • अध्याय 14

18
अध्याय सारांश

गुणत्रयविभागयोग

सत्त्व (प्रकाश), रज (कर्म/तृष्णा), और तम (अज्ञान/आलस्य) गुण कैसे जीव को बांधते हैं, और इनसे परे गुणातीत होने की विधि।

श्लोक 1

श्रीभगवानुवाच | परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् | यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ||१४-१||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — सभी ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ परम ज्ञान को मैं फिर से कहूँगा, जिसे जानकर सभी मुनि इस लोक से परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।

Meaning (English)

Krishna said: I will again share the highest of all knowledge — knowing which, all the sages attained supreme perfection after leaving this world.

🪔
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श्लोक 2

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः | सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ||१४-२||

Meaning (Hindi)

जो लोग इस ज्ञान का सहारा लेकर मेरे स्वरूप को पा लेते हैं, वे सृष्टि के आरंभ में जन्म नहीं लेते और प्रलय के समय घबराते भी नहीं।

Meaning (English)

Those who take refuge in this knowledge and attain oneness with Me are neither born at the time of creation nor troubled at the time of dissolution.

🪔
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श्लोक 3

मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् | सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ||१४-३||

Meaning (Hindi)

हे भारत! मेरी महद्ब्रह्म रूप प्रकृति ही सबकी जन्म-भूमि है; उसमें मैं चेतना का बीज डालता हूँ — इससे ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

Meaning (English)

O Arjuna, the great Brahman is My womb — the birthplace of all. In it I place the seed of life, and from that all beings are born.

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श्लोक 4

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः | तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ||१४-४||

Meaning (Hindi)

हे कौन्तेय! जितनी भी योनियों में शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी माँ महद्ब्रह्म है और बीज देने वाला पिता मैं हूँ।

Meaning (English)

O Arjuna, whatever forms are born in any womb, the great Brahman is their mother and I am the seed-giving father.

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श्लोक 5

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः | निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ||१४-५||

Meaning (Hindi)

हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम — ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न हैं और ये अविनाशी आत्मा को शरीर के साथ बाँध देते हैं।

Meaning (English)

O Arjuna, the three qualities — Sattva, Rajas, and Tamas — arise from Nature and bind the immortal soul to the body.

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श्लोक 6

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् | सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ||१४-६||

Meaning (Hindi)

हे निष्पाप अर्जुन! इन तीनों में सत्त्वगुण निर्मल, प्रकाशित करने वाला और रोगरहित है — यह सुख की आसक्ति और ज्ञान की आसक्ति से जीव को बाँधता है।

Meaning (English)

O sinless Arjuna, among these, Sattva is pure and luminous and free from disease. It binds the soul through attachment to happiness and attachment to knowledge.

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श्लोक 7

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् | तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ||१४-७||

Meaning (Hindi)

हे कौन्तेय! रजोगुण को राग का स्वरूप जानो — इससे तृष्णा और आसक्ति उत्पन्न होती है। यह कर्मों की आसक्ति से देही आत्मा को बाँधता है।

Meaning (English)

O Arjuna, know that Rajas is the nature of passion — it gives rise to thirst and attachment. It binds the soul through attachment to action.

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श्लोक 8

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् | प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ||१४-८||

Meaning (Hindi)

और हे भारत! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न जानो — यह सभी प्राणियों को मोहित करता है। यह प्रमाद, आलस्य और नींद से जीव को बाँधता है।

Meaning (English)

And O Arjuna, know that Tamas is born of ignorance and it deludes all beings. It binds the soul through carelessness, laziness, and sleep.

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श्लोक 9

सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत | ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ||१४-९||

Meaning (Hindi)

हे भारत! सत्त्वगुण सुख में आसक्त कर देता है, रजोगुण कर्म में — और तमोगुण ज्ञान को ढककर जीव को प्रमाद में डाल देता है।

Meaning (English)

O Arjuna, Sattva attaches to happiness, Rajas to action, and Tamas — covering knowledge — pulls the soul into carelessness.

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श्लोक 10

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत | रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ||१४-१०||

Meaning (Hindi)

हे भारत! कभी रज और तम को दबाकर सत्त्व बढ़ता है, कभी सत्त्व और तम को दबाकर रज बढ़ता है, और कभी सत्त्व और रज को दबाकर तम बढ़ता है।

Meaning (English)

O Arjuna, sometimes Sattva rises by overpowering Rajas and Tamas; sometimes Rajas rises by overpowering Sattva and Tamas; and sometimes Tamas rises by overpowering Sattva and Rajas.

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श्लोक 11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते | ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ||१४-११||

Meaning (Hindi)

जब इस देह की सभी इंद्रियों में ज्ञान का प्रकाश फैल जाता है, तब समझो कि सत्त्वगुण प्रबल हो गया है।

Meaning (English)

When the light of knowledge shines through all the sense-gates of this body, know that Sattva has become dominant.

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श्लोक 12

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा | रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ||१४-१२||

Meaning (Hindi)

हे भरतश्रेष्ठ! जब रजोगुण बढ़ता है तब लोभ, चेष्टा, कर्मों का आरंभ, बेचैनी और लालसा — ये सब उत्पन्न होते हैं।

Meaning (English)

O best of the Bharatas, when Rajas is dominant, greed, restless activity, the starting of projects, unease, and longing all arise.

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श्लोक 13

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च | तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ||१४-१३||

Meaning (Hindi)

हे कुरुनंदन! जब तमोगुण बढ़ता है तब अंधेरा, आलसपन, प्रमाद और मोह — ये सब उत्पन्न होते हैं।

Meaning (English)

O Arjuna, when Tamas is dominant, darkness, inertia, carelessness, and delusion arise.

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श्लोक 14

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् | तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ||१४-१४||

Meaning (Hindi)

जब सत्त्वगुण प्रबल हो तब यदि जीव की मृत्यु हो, तो वह उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।

Meaning (English)

When a person dies while Sattva is dominant, they reach the pure, higher worlds of those who know the Supreme.

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श्लोक 15

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते | तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ||१४-१५||

Meaning (Hindi)

रजोगुण के काल में मृत्यु होने पर वह कर्मासक्त लोगों में जन्म लेता है; और तमोगुण के काल में मरने पर मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

Meaning (English)

One who dies while Rajas is dominant is reborn among people attached to action; and one who dies in Tamas is born in deluded, lower forms of life.

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श्लोक 16

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् | रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ||१४-१६||

Meaning (Hindi)

शुभ कर्म का फल सात्विक और निर्मल कहा गया है; रजोगुण का फल दुःख है और तमोगुण का फल अज्ञान।

Meaning (English)

The fruit of good action is said to be Sattvic and pure; the fruit of Rajas is pain; and the fruit of Tamas is ignorance.

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श्लोक 17

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च | प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ||१४-१७||

Meaning (Hindi)

सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ, और तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

Meaning (English)

From Sattva comes knowledge; from Rajas comes greed; and from Tamas come carelessness, delusion, and ignorance.

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श्लोक 18

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः | जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ||१४-१८||

Meaning (Hindi)

सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर के लोकों में जाते हैं, राजस लोग बीच में (मनुष्य लोक में) रहते हैं, और तामस लोग अधोगति को प्राप्त होते हैं।

Meaning (English)

Those who dwell in Sattva go upward; those in Rajas stay in the middle (the human realm); and those in Tamas, dwelling in the lowest tendencies, go downward.

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श्लोक 19

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति | गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ||१४-१९||

Meaning (Hindi)

जब साधक तीनों गुणों के अलावा किसी अन्य को कर्ता नहीं देखता और इन तीनों गुणों से परे मेरे तत्त्व को जानता है — तब वह मेरे स्वरूप को पा लेता है।

Meaning (English)

When the seer sees no doer other than the three qualities, and knows that which is beyond them — they attain My very nature.

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श्लोक 20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् | जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ||१४-२०||

Meaning (Hindi)

यह देही पुरुष इन तीनों गुणों से परे होकर जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःख से मुक्त हो जाता है और अमृतत्व को पा लेता है।

Meaning (English)

When the soul transcends these three qualities — which are the cause of the body — it is freed from birth, death, old age, and pain, and attains immortality.

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श्लोक 21

अर्जुन उवाच | कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ||१४-२१||

Meaning (Hindi)

अर्जुन बोले — हे प्रभो! जो तीनों गुणों से परे हो गया है, उसके क्या लक्षण होते हैं? वह कैसा आचरण करता है? और वह इन तीनों गुणों से परे कैसे होता है?

Meaning (English)

Arjuna said: O Lord, what are the signs of one who has gone beyond these three qualities? How does such a person behave? And how does one transcend these three qualities?

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श्लोक 22

श्रीभगवानुवाच | प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव | न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ||१४-२२||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — हे पाण्डव! जो ज्ञान का प्रकाश हो, प्रवृत्ति हो या मोह हो — इनके आने पर उनसे द्वेष नहीं करता और जाने पर उनकी कामना नहीं करता।

Meaning (English)

Krishna said: O Arjuna, when light, activity, or delusion arise — such a person neither hates them when they appear nor longs for them when they are gone.

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श्लोक 23

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते | गुणा वर्तन्त इत्येवं योऽवतिष्ठति नेङ्गते ||१४-२३||

Meaning (Hindi)

जो उदासीन की तरह बैठा रहता है, गुणों से विचलित नहीं होता, और यह जानकर कि 'गुण ही सब कार्य करते हैं' — अपने स्वरूप में स्थिर रहता है।

Meaning (English)

One who sits apart like an unconcerned witness, not shaken by the qualities — who knows that only the qualities are at work — and stays steady and unmoved.

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श्लोक 24

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः | तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ||१४-२४||

Meaning (Hindi)

जो सुख-दुःख में समान है, अपने स्वरूप में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने को एक समान देखता है; जो प्रिय-अप्रिय और निंदा-स्तुति में एकसमान रहता है।

Meaning (English)

One who is the same in pleasure and pain, who rests in the Self, who sees mud, stone, and gold as equal; who is the same toward the liked and disliked, steady in praise and blame alike.

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श्लोक 25

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः | सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ||१४-२५||

Meaning (Hindi)

जो मान और अपमान में समान है, शत्रु और मित्र में समान है, और सब कार्यों का आरंभ त्याग देता है — वह गुणातीत कहलाता है।

Meaning (English)

One who is equal in honor and dishonor, equal toward friend and enemy, who gives up all initiative — such a one is said to have transcended the three qualities.

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श्लोक 26

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते | स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ||१४-२६||

Meaning (Hindi)

और जो अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी उपासना करता है, वह इन तीनों गुणों से परे होकर ब्रह्म बनने का अधिकारी हो जाता है।

Meaning (English)

And one who serves Me with unwavering devotion — going beyond these three qualities — becomes fit to become Brahman.

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श्लोक 27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च | शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ||१४-२७||

Meaning (Hindi)

क्योंकि मैं ही अमृत, अव्यय ब्रह्म, शाश्वत धर्म और परम आनंद का आधार हूँ।

Meaning (English)

For I am the foundation of Brahman — the immortal, the imperishable, of eternal Dharma, and of absolute bliss.

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