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क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga • अध्याय 13

18
अध्याय सारांश

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

शरीर को 'क्षेत्र' (कर्मभूमि) और आत्मा/परमात्मा को 'क्षेत्रज्ञ' (जानने वाला) के रूप में विश्लेषित करने का ज्ञान।

श्लोक 1

अर्जुन उवाच | प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च | एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ||१३-१||

Meaning (Hindi)

अर्जुन बोले — हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, और ज्ञान तथा ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।

Meaning (English)

Arjuna said: O Keshava, I wish to know about Nature and the Spirit, the field and the knower of the field, and also knowledge and what is worth knowing.

🪔
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श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच | इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते | एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ||१३-२||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — हे कौन्तेय! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है; और जो इसे जानता है उसे तत्वज्ञ लोग क्षेत्रज्ञ कहते हैं।

Meaning (English)

Krishna said: O Arjuna, this body is called the field. And those who know it call the one who knows it the knower of the field.

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श्लोक 3

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ||१३-३||

Meaning (Hindi)

हे भारत! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है — मेरे मत में वही सच्चा ज्ञान है।

Meaning (English)

O Arjuna, know Me as the knower of the field in all fields. Knowing both the field and its knower — that, in My view, is true knowledge.

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श्लोक 4

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् | स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ||१३-४||

Meaning (Hindi)

वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, किन विकारों वाला है, कहाँ से हुआ है; और वह क्षेत्रज्ञ कौन है और कितना शक्तिशाली है — यह संक्षेप में मुझसे सुनो।

Meaning (English)

Hear from Me briefly what the field is, what it is like, what its modifications are, where it comes from, and who the knower of the field is and what His power is.

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श्लोक 5

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् | ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ||१३-५||

Meaning (Hindi)

इस विषय में ईश्वर ने अनेक तरह से तथा विविध छंदों में गाया है; और युक्तिपूर्ण, सुनिश्चित ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।

Meaning (English)

Sages have described this in many ways, in various meters and chants — and also through the conclusive, well-reasoned words of the Brahma Sutras.

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श्लोक 6

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च | इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ||१३-६||

Meaning (Hindi)

पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति, दस इन्द्रियाँ और एक मन, और इन्द्रियों के पांच विषय —

Meaning (English)

The five great elements, ego, intellect, the unmanifest Nature, the ten senses, the one mind, and the five objects of the senses —

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श्लोक 7

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ||१३-७||

Meaning (Hindi)

इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, संघात (स्थूल शरीर), चेतना और धृति — ये सब विकारों सहित क्षेत्र का संक्षेप वर्णन है।

Meaning (English)

Desire, hatred, pleasure, pain, the body as a whole, consciousness, and steadiness — this, in brief, is the field along with its modifications.

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श्लोक 8

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् | आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ||१३-८||

Meaning (Hindi)

मन में अहंकार न लाना, ड़िंग न करना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम —

Meaning (English)

Absence of pride, no pretension, non-violence, patience, straightforwardness, service to the teacher, purity, steadiness, and self-control —

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श्लोक 9

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च | जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ||१३-९||

Meaning (Hindi)

इन्द्रियों के विषयों से वैराग्य, अहंकार का अभाव; जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था, रोग और दुख — इनमें दोष देखना।

Meaning (English)

Detachment from sense objects, freedom from ego; seeing the suffering in birth, death, old age, and disease —

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श्लोक 10

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||१३-१०||

Meaning (Hindi)

पुत्र, पत्नी, घर आदि में आसक्ति न रखना और उनमें तादात्म्य न बनाना; और जो शुभ हो या अशुभ — दोनों में समता रखना।

Meaning (English)

Non-attachment, not clinging to son, wife, home and the like; and constant evenness of mind whether pleasant or unpleasant things happen —

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श्लोक 11

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ||१३-११||

Meaning (Hindi)

अनन्य योग से मुझमें अटल भक्ति; एकांत स्थानों में रहने की प्रवृत्ति और भीड़ वाली जगहों में अरुचि।

Meaning (English)

Unswerving devotion to Me through undivided yoga; love for solitary places; and no taste for the company of common crowds —

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श्लोक 12

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् | एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ||१३-१२||

Meaning (Hindi)

अध्यात्मज्ञान में निष्ठा और तत्त्वज्ञान के लक्ष्य रूप परमात्मा का दर्शन — यह सब ज्ञान कहा गया है; जो इससे विपरीत है वह अज्ञान है।

Meaning (English)

Steadiness in self-knowledge and seeing the Supreme as the goal of true understanding — all this is called knowledge. Whatever is opposite to this is ignorance.

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श्लोक 13

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते | अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ||१३-१३||

Meaning (Hindi)

जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व को प्राप्त होता है, उस ज्ञेय वस्तु को मैं स्पष्ट कहूँगा — वह है अनादि परम ब्रह्म, जो न सत् कहा जा सकता है न असत्।

Meaning (English)

I will now clearly describe what is worth knowing — knowing which, one attains immortality. It is the beginningless Supreme Brahman, which can be called neither being nor non-being.

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श्लोक 14

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् | सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ||१३-१४||

Meaning (Hindi)

उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं — वह समस्त जगत् को व्याप्त करके स्थित है।

Meaning (English)

It has hands and feet everywhere; eyes, heads, and mouths on all sides; ears on all sides — it exists in the world enveloping everything.

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श्लोक 15

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ||१३-१५||

Meaning (Hindi)

वह समस्त इन्द्रियों के कार्यों से चमकता प्रतीत होता है, पर वास्तव में सभी इन्द्रियों से रहित है। आसक्ति से मुक्त होते हुए भी सबका पालन-पोषण करने वाला, गुणरहित होते हुए भी गुणों का अनुभव करने वाला है।

Meaning (English)

It appears to function through all the senses, yet it is without any sense organ. Unattached, yet sustaining all; free from the qualities, yet experiencing them.

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श्लोक 16

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च | सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ||१३-१६||

Meaning (Hindi)

वह सभी प्राणियों के बाहर-भीतर स्थित है; चर भी है और अचर भी। सूक्ष्म होने से वह जानने में कठिन है; वह बहुत दूर भी है और बहुत पास भी।

Meaning (English)

It is outside and inside all beings, both moving and unmoving. Because it is subtle, it cannot be known directly. It is far away and yet very near.

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श्लोक 17

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ||१३-१७||

Meaning (Hindi)

वह अविभक्त है, पर जीवों में विभक्त सा स्थित है। वह ज्ञेय ब्रह्म सभी प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला, संहारकर्ता और साथ ही सृष्टिकर्ता है।

Meaning (English)

Though undivided, it appears as if divided among all beings. It is the sustainer of all, the destroyer, and the creator — this is what is worth knowing.

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श्लोक 18

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते | ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ||१३-१८||

Meaning (Hindi)

वह ज्योतियों की वी ज्योति है और अज्ञान के अंधकार से परे है। वह ज्ञान है, ज्ञेय है और ज्ञान से जानने योग्य है; वह सबके हृदय में विराजमान है।

Meaning (English)

It is the light of all lights, said to be beyond darkness. It is knowledge, the knowable, and the goal of knowledge — and it dwells in the hearts of all.

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श्लोक 19

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः | मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ||१३-१९||

Meaning (Hindi)

इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय को संक्षेप में कहा गया। मेरा भक्त इसे तत्त्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

Meaning (English)

Thus the field, knowledge, and what is worth knowing have been described in brief. My devotee, knowing this truly, enters into My being.

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श्लोक 20

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि | विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ||१३-२०||

Meaning (Hindi)

प्रकृति और पुरुष — इन दोनों को अनादि जानो। सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं, यह भी जानो।

Meaning (English)

Know both Nature and the Spirit to be beginningless. And know that all transformations and qualities arise from Nature alone.

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श्लोक 21

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते | पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ||१३-२१||

Meaning (Hindi)

कार्य और कारण उत्पन्न करने में प्रकृति हेतु कही जाती है; और सुख-दुख का अनुभव करने में पुरुष हेतु कहा जाता है।

Meaning (English)

In producing effects and causes, Nature is said to be the reason. In experiencing pleasure and pain, the individual soul is said to be the reason.

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श्लोक 22

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् | कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ||१३-२२||

Meaning (Hindi)

प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से जन्मे गुणों को भोगता है। इन गुणों का संग ही इस जीव के शुभ-अशुभ योनियों में जन्म लेने का कारण है।

Meaning (English)

The soul, dwelling in Nature, experiences the qualities born of Nature. Its attachment to these qualities is the cause of its birth in good and bad wombs.

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श्लोक 23

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः | परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ||१३-२३||

Meaning (Hindi)

इस देह में परम पुरुष ही उपद्रष्टा (साक्षी), अनुमता (अनुमति देने वाला), भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा — इन नामों से कहा जाता है।

Meaning (English)

The supreme Spirit in this body is also called the witness, the permitter, the sustainer, the experiencer, the great Lord, and the Supreme Self.

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श्लोक 24

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह | सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ||१३-२४||

Meaning (Hindi)

जो मनुष्य इस प्रकार पुरुष और गुणों सहित प्रकृति को जानता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करते हुए भी पुनः जन्म नहीं लेता।

Meaning (English)

One who truly knows the Spirit and Nature together with its qualities — no matter in what condition they live — will not be born again.

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श्लोक 25

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना | अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ||१३-२५||

Meaning (Hindi)

कोई ध्यान से आत्मा को आत्मा में देखते हैं, कोई सांख्ययोग से, और कोई कर्मयोग से — अनेक रास्ते हैं।

Meaning (English)

Some perceive the Self within the self through meditation; others through the path of knowledge; and still others through the path of action — there are many ways.

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श्लोक 26

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते | तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ||१३-२६||

Meaning (Hindi)

और जो इस प्रकार नहीं जानते, पर दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं — वे भी श्रवण को ही परम साधन मानकर मृत्यु को निःसंदेह पार कर जाते हैं।

Meaning (English)

Others who do not know these paths, but simply worship having heard from others — they too cross beyond death, treating what they have heard as their supreme refuge.

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श्लोक 27

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् | क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ||१३-२७||

Meaning (Hindi)

हे भरतश्रेष्ठ! चराचर सहित जो कुछ भी उत्पन्न होता है, उस सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जानो।

Meaning (English)

O best of the Bharatas, know that whatever comes into existence — whether moving or unmoving — is born of the union between the field and its knower.

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श्लोक 28

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् | विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ||१३-२८||

Meaning (Hindi)

जो मनुष्य समस्त नश्वर प्राणियों में अनश्वर परमेश्वर को समभाव से स्थित देखता है — वही वास्तव में देखता है।

Meaning (English)

One who sees the Supreme Lord dwelling equally in all perishable beings, imperishable within the perishable — that one truly sees.

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श्लोक 29

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् | न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ||१३-२९||

Meaning (Hindi)

जो सर्वत्र समआन रूप से स्थित ईश्वर को देखता है, वह अपने आप से अपने आप को नष्ट नहीं करता और इसीलिए वह परम गति को प्राप्त होता है।

Meaning (English)

Because one who sees the same Lord equally present everywhere does not harm the Self through the self — and thereby reaches the highest goal.

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श्लोक 30

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः | यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ||१३-३०||

Meaning (Hindi)

जो समस्त कर्मों को प्रकृति द्वारा ही किया हुआ देखता है, और आत्मा को अकर्ता देखता है — वही वास्तव में देखता है।

Meaning (English)

One who sees that all actions are performed by Nature alone, and that the Self does nothing — that one truly sees.

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श्लोक 31

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति | तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ||१३-३१||

Meaning (Hindi)

जब यह मनुष्य समस्त भूतों के अलग-अलग भावों को एक परमात्मा में स्थित देखता है और उसी से सबका विस्तार जानता है — तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

Meaning (English)

When one sees the separate existence of all beings resting in the One, and spreading out from that One alone — then one attains Brahman.

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श्लोक 32

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः | शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ||१३-३२||

Meaning (Hindi)

हे कौन्तेय! अनादि और गुणरहित होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में रहते हुए भी वह न कुछ करता है न किसी फल से लिप्त होता है।

Meaning (English)

O Arjuna, this Supreme Self is beginningless and without qualities — it is imperishable. Though dwelling in the body, it neither acts nor is touched by anything.

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श्लोक 33

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते | सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ||१३-३३||

Meaning (Hindi)

जिस प्रकार सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म होने से किसी से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र स्थित आत्मा किसी से लिप्त नहीं होता।

Meaning (English)

Just as all-pervading space is not stained because of its subtlety, similarly the Self, present everywhere in the body, is not tainted.

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श्लोक 34

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः | क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ||१३-३४||

Meaning (Hindi)

हे भारत! जिस प्रकार एक सूर्य इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही क्षेत्री (आत्मा) सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है।

Meaning (English)

O Arjuna, just as the one sun illumines this entire world, so the one knower of the field illumines the entire field.

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श्लोक 35

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा | भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ||१३-३५||

Meaning (Hindi)

इस प्रकार जो लोग ज्ञानचक्षु से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मुक्ति को जानते हैं, वे परम ं ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

Meaning (English)

Those who, with the eye of knowledge, perceive this difference between the field and its knower — and the liberation from the bondage of Nature — they go to the Supreme.

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