श्री प्रश्नोपनिषद्

Prashna Upanishad • अथर्ववेद

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अथर्ववेद

श्री प्रश्नोपनिषद्

पिप्पलाद ऋषि और छह जिज्ञासु शिष्यों के बीच छह मुख्य प्रश्नों के उत्तर के रूप में सृष्टिकर्ता और प्राण शक्ति का निरूपण।

अवसर: दार्शनिक शंका समाधान (Resolution of Philosophical Queries)
लाभ: प्राण, सृष्टि और आत्मा के उद्गम का ज्ञान (Understanding the origins of life, creation, and consciousness)
शांति पाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devāḥ | bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ || sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhiḥ | vyaśema devahitaṃ yadāyuḥ || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

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हे देवताओं! हम कानों से सदा कल्याणकारी बातें सुनें, यज्ञ करते हुए आँखों से सदा शुभ देखें। स्थिर अंगों और शरीर से आपकी स्तुति करते हुए, देवताओं द्वारा निर्धारित पूर्ण आयु का आनंद लें।

मंत्र 2

सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्याश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

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sukēśā ca bhāradvājaḥ śaibyaśca satyakāmaḥ sauryāyaṇī ca gārgyaḥ kausalyaścāśvalāyanō bhārgavō vaidarbhiḥ kabandhī kātyāyanastē haitē brahmaparā brahmaniṣṭhāḥ paraṁ brahmānvēṣamāṇā ēṣa ha vai tatsarvaṁ vakṣyatīti tē ha samitpāṇayō bhagavantaṁ pippalādamupasannāḥ || 1 ||

💡

भारद्वाज के पुत्र सुकेशा, शिबि के पुत्र सत्यकाम, गर्ग गोत्र के सौर्यायणी, अश्वल के पुत्र कौसल्या, भृगुवंशी वैदर्भि और कत्य के प्रपौत्र कबन्धी — ये सभी ब्रह्मपरायण और ब्रह्मनिष्ठ थे। परम ब्रह्म की खोज में वे हाथ में समिधा लेकर पूजनीय पिप्पलाद ऋषि के पास गए।

मंत्र 3

तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥

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tānha sa ṛṣiruvāca bhūya ēva tapasā brahmacaryēṇa śraddhayā saṁvatsaraṁ saṁvatsyatha yathākāmaṁ praśnānpṛcchata yadi vijñāsyāmaḥ sarvaṁ vō vakṣyāma iti || 2 ||

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उन मुनि ने उनसे कहा— तुम लोग तपस्या, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा के साथ एक वर्ष तक और यहाँ रहो। इसके बाद अपनी इच्छा अनुसार प्रश्न पूछना। यदि मुझे ज्ञात होगा, तो मैं सब कुछ बताऊंगा।

मंत्र 4

अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन्कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥

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atha kabandhī kātyāyana upētya papracchya | bhagavankutō ha vā imāḥ prajāḥ prajāyanta iti || 3 ||

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इसके बाद कबन्धी कात्यायन ने समीप जाकर पूछा— हे भगवन्! ये समस्त प्रजाएँ (जीव) किस कारण से उत्पन्न होती हैं?

मंत्र 5

तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयेते । रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥

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tasmai sa hōvāca prajākāmō vai prajāpatiḥ sa tapō'tapyata sa tapastaptvā sa mithunamutpādayatē | rayiṁ ca prāṇaṁ cētyētau mē bahudhā prajāḥ kariṣyata iti || 4 ||

💡

ऋषि ने उत्तर दिया— प्रजा की कामना वाले प्रजापति (सृष्टिकर्ता) ने तप किया। तप करके उन्होंने एक जोड़ा उत्पन्न किया — रयि (पदार्थ) और प्राण (ऊर्जा) — यह सोचकर कि ये दोनों मिलकर हमारे लिए अनेक प्रकार की प्रजाएँ उत्पन्न करेंगे।

मंत्र 6

आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मात्मुर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

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ādityō ha vai prāṇō rayirēva candramā rayirvā ētatsarvaṁ yanmūrtaṁ cāmūrtaṁ ca tasmātmurtirēva rayiḥ || 5 ||

💡

सूर्य ही साक्षात प्राण है और चन्द्रमा ही रयि है। जो कुछ भी स्थूल (मूर्त) और सूक्ष्म (अमूर्त) है, वह सब रयि ही है। इसलिए समस्त स्थूल आकृतियाँ रयि हैं।

मंत्र 7

अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते । यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥ ६ ॥

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athāditya udayanyatprācīm diśam praviśati tēna prācyānprāṇān raśmiṣu saṁnidhattē | yaddakṣiṇām yatpratīcīm yadudīcīm yadadhō yadūrdhvam yadantarā diśō yatsarvam prakāśayati tēna sarvānprāṇān raśmiṣu saṁnidhattē || 6 ||

💡

जब उदित होता हुआ सूर्य पूर्व दिशा में प्रवेश करता है, तब वह अपनी किरणों से पूर्व दिशा के सभी प्राणों को प्रकाशित और ऊर्जावान करता है। जब वह दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, नीचे, ऊपर, बीच की दिशाओं को और सब कुछ प्रकाशित करता है, तब वह सभी दिशाओं के प्राणों को अपनी किरणों में धारण करता है।

मंत्र 8

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥ ७ ॥

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sa ēṣa vaiśvānarō viśvarūpaḥ prāṇō'gnirudayatē | tadētadṛcābhyuktam || 7 ||

💡

वही यह वैश्वानर (समस्त जीवों की जठराग्नि), विश्वरूप (संपूर्ण रूपों में स्थित) प्राण और अग्नि देव उदित होता है। इस विषय में ऋग्वेद का यह मन्त्र कहा गया है।

मंत्र 9

विरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८ ॥

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viśvarūpaṃ hariṇaṃ jātavēdasaṃ parāyaṇaṃ jyōtirēkaṃ tapantam | sahasraraśmiḥ śatadhā vartamānaḥ prāṇaḥ prajānāmudayatyēṣa sūryah || 8 ||

💡

संपूर्ण रूपों वाले, हिरण्यवर्ण (स्वर्णमयी), सर्वज्ञ, सबके आश्रय, एकमात्र प्रकाश पुंज और तपते हुए सूर्य को जानकर ऋषियों ने स्तुति की। हजारों किरणों वाला, सैकड़ों रूपों में विद्यमान, प्रजा का प्राण रूप यह सूर्य उदित हो रहा है।

मंत्र 10

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९ ॥

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saṁvatsarō vai prajāpatistasyāyanē dakṣiṇaṁ cōttaraṁ ca | tadyē ha vai tadiṣṭāpūrtē kṛtamityupāsatē tē cāndramasamēva lōkamabhijayantē | ta ēva punarāvartantē tasmādēta ṛṣayaḥ prajākāmā dakṣiṇaṁ pratipadyantē | ēṣa ha vai rayiryaḥ pitṛyāṇaḥ || 9 ||

💡

संवत्सर (वर्ष) ही प्रजापति है, उसके दो मार्ग हैं— दक्षिणायन और उत्तरायण। जो लोग केवल यज्ञ-दान और जन कल्याण के कार्यों को ही परम कर्तव्य मानकर उपासना करते हैं, वे चन्द्रलोक (रयि) को प्राप्त करते हैं। वे वहाँ से पुनः लौट आते हैं। अतः प्रजा की कामना वाले गृहस्थ ऋषि दक्षिणायन मार्ग को अपनाते हैं। यही रयि और पितृयान मार्ग है।

मंत्र 11

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

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athōttarēṇa tapasā brahmacaryēṇa śraddhayā vidyayātmānamanviṣyādityamabhijayantē | ētadvai prāṇānāmāyatanamētadamṛtamabhayamētat parāyaṇamētasmānna punarāvartanta ityēṣa nirōdhastadēṣa ślōkaḥ || 10 ||

💡

परंतु जो तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या के द्वारा अपनी आत्मा की खोज करके उत्तरायण मार्ग से जाते हैं, वे सूर्यलोक (प्राण) को जीत लेते हैं। यह प्राणों का आश्रय है, यही अमृत और अभय धाम है, यही परम गति है। यहाँ से वे पुनः नहीं लौटते, यह पुनर्जन्म का निरोध है। इस विषय में यह श्लोक है।

मंत्र 12

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥

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pañcapādaṁ pitaraṁ dvādaśākṛtiṁ diva āhuḥ parē ardhē purīṣiṇam | athaimē anya u parē vicakṣaṇaṁ saptacakrē ṣaḍara āhurarpitamiti || 11 ||

💡

कुछ ज्ञानी काल के ज्ञाता सूर्य को पांच ऋतुओं (पादों) वाला, बारह महीनों (आकृतियों) वाला, और द्युलोक के उत्तर भाग में स्थित जल प्रदाता पिता कहते हैं। दूसरे ज्ञानी कहते हैं कि यह सात घोड़ों (चक्रों) और छह ऋतुओं (आरों) वाले रथ पर स्थित सर्वज्ञ देव है।

मंत्र 13

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्त्यन्तर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

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māsō vai prajāpatistasya kṛṣṇapakṣa ēva rayiḥ śuklaḥ prāṇastasmādēta ṛṣayaḥ śukla iṣṭaṁ kurvantyantara itarasmin || 12 ||

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मास (महीना) ही प्रजापति है, उसका कृष्णपक्ष रयि है और शुक्लपक्ष प्राण है। इसलिए ज्ञानी ऋषि शुक्लपक्ष में यज्ञ-कर्म करते हैं, और दूसरे कृष्णपक्ष में करते हैं।

मंत्र 14

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति । ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

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ahōrātrō vai prajāpatistasya-aharēva prāṇō rātrirēva rayiḥ prāṇaṁ vā ētē praskandanti | yē divā ratyā saṁyujyantē brahmacaryamēva tadyadrātrau ratyā saṁyujyantē || 13 ||

💡

दिन और रात ही प्रजापति हैं, उनमें दिन ही प्राण है और रात्रि ही रयि है। जो दिन में मैथुन (भोग) करते हैं, वे अपने प्राणों का ह्रास करते हैं। रात्रि में संयमपूर्वक संग करना ब्रह्मचर्य के समान ही माना जाता है।

मंत्र 15

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥

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annaṁ vai prajāpatistatō ha vai tadrētastasmādimāḥ prajāḥ prajāyanta iti || 14 ||

💡

अन्न ही प्रजापति है, उसी से वीर्य (रेत) उत्पन्न होता है, और उस वीर्य से ही ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं।

मंत्र 16

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयंते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥

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tadyē ha vai tatprajāpativrataṁ caranti tē mithunamutpādayantē | tēṣāmēvaiṣa brahmalōkō yēṣāṁ tapō brahmacaryaṁ yēṣu satyaṁ pratiṣṭhitam || 15 ||

💡

जो लोग प्रजापति के इस नियम (गृहस्थ धर्म) का पालन करते हैं, वे संतान उत्पन्न करते हैं। परंतु उन्हीं को वास्तविक ब्रह्मलोक प्राप्त होता है जिनमें तप, ब्रह्मचर्य और सत्य प्रतिष्ठित है।

मंत्र 17

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥

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tēṣāmasau virajō brahmalōkō na yēṣu jihmamanṛtaṁ na māyā cēti || 16 ||

💡

उनके लिए वह निष्पाप (शुद्ध) ब्रह्मलोक है, जिनमें न तो कुटिलता है, न असत्य है और न कोई माया (छल-कपट) है।

मंत्र 18

अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते कतर एतत्प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥

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atha hainaraṁ bhārgavō vaidarbhiḥ papracchya | bhagavankatyēva dēvāḥ prajāṁ vidhārayantē katara ētatprakāśayantē kaḥ punarēṣāṁ variṣṭha iti || 1 ||

💡

इसके बाद भृगुवंशी वैदर्भि ने पूछा— हे भगवन्! कितने देवता शरीर रूपी प्रजा को धारण करते हैं? उनमें से कौन-कौन इसे प्रकाशित (सक्रिय) करते हैं? और इन सब में परम श्रेष्ठ कौन है?

मंत्र 19

तस्मै स होवाच आकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥

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tasmai sa hōvāca ākāśō ha vā ēṣō dēvō vāyuragnirāpaḥ pṛthivī vāṅmanaścakṣuḥ śrōtraṁ ca | tē prakāśyābhivadanti vayamētadbāṇamavaṣṭabhya vidhārayāmaḥ || 2 ||

💡

ऋषि ने उनसे कहा— आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी, मन, चक्षु और श्रोत्र — ये ही वे देवता हैं। इन सबने अपने को अभिव्यक्त करके अभिमानपूर्वक कहा कि— हम ही इस शरीर रूपी रथ को सहारा देकर धारण करते हैं।

मंत्र 20

तान् वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमापद्यथा अहमेवैतत् पञ्चधात्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥

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tān variṣṭhaḥ prāṇa uvāca mā mōhamāpadyathā ahamēvaitat pañcadhātmānaṁ pravibhajyaitadbāṇamavaṣṭabhya vidhārayāmīti tē'śraddadhānā babhūvuḥ || 3 ||

💡

तब उन सब में श्रेष्ठ प्राण ने उनसे कहा— तुम लोग मोह में मत पड़ो। मैं ही अपने को पांच रूपों (प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान) में विभाजित करके इस शरीर को सहारा देकर धारण करता हूँ। परंतु वे इंद्रियाँ अश्रद्धालु (अविश्वास करने वाली) रहीं।

मंत्र 21

सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥

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sō'bhimānādūrdhvamutkrāmata iva tasminnutkrāmatyatḥētarē sarva ēvōtkrāmantē tasmiṁśca pratiṣṭhamānē sarva ēva prātiṣṭhantē | tadyathā makṣikā madhukararājānamutkrāmantaṁ sarva ēvōtkrāmantē tasmiṁśca pratiṣṭhamānē sarva ēva prātiṣṭhanta ēvaṁ vāṅmanaścakṣuḥ śrōtraṁ ca tē prītāḥ prāṇaṁ stunvanti || 4 ||

💡

तब प्राण ने स्वाभिमानवश शरीर से ऊपर उठने का अभिनय किया। जब वह ऊपर उठने लगा, तब अन्य सभी इंद्रियाँ भी ऊपर उठने लगीं, और जब वह स्थिर हुआ, तब सभी स्थिर हो गईं। जैसे मधुमक्खियाँ अपने रानी मक्खी के उड़ने पर सब उड़ने लगती हैं और उसके बैठने पर बैठ जाती हैं, वैसे ही वाणी, मन, चक्षु और श्रोत्र ने भी अनुभव किया। वे सब प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगे।

मंत्र 22

एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवान् एष वायुः । एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥

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ēṣō'gnistapatyēṣa sūrya ēṣa parjanyō maghavān ēṣa vāyuḥ | ēṣa pṛthivī rayirdēvaḥ sadasaccāmṛtaṁ ca yat || 5 ||

💡

यही प्राण अग्नि रूप में तपता है, यही सूर्य है, यही मेघ और इंद्र है, यही वायु है। यही देव पृथ्वी, रयि (पदार्थ), सत् (स्थूल), असत् (सूक्ष्म) और जो अमृत (अविनाशी) है, वह सब है।

मंत्र 23

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥

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arā iva rathanābhau prāṇē sarvaṁ pratiṣṭhitam | ṛcō yajūṁṣi sāmāni yajñaḥ kṣatraṁ brahma ca || 6 ||

💡

जैसे रथ के पहिये के चक्र में आरे टिके रहते हैं, वैसे ही प्राण में सब कुछ प्रतिष्ठित है — ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, यज्ञ, क्षत्रिय बल और ब्राह्मण तेज।

मंत्र 24

प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥

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prajāpatiścarasi garbhē tvamēva pratijāyēse | tubhyaṁ prāṇa prajāstvimā baliṁ haranti yaḥ prāṇaiḥ pratitiṣṭhasi || 7 ||

💡

हे प्राण! तुम ही प्रजापति रूप में माता के गर्भ में विचरते हो और तुम ही शिशु रूप में पुनः जन्म लेते हो। तुम जो समस्त इंद्रियों के अधिष्ठाता रूप में शरीर में निवास करते हो, तुम्हारे लिए ही ये प्रजाएँ भोग (बलि) समर्पित करती हैं।

मंत्र 25

देवानामसि वह्नितमः पित्ॄणां प्रथमा स्वधा । ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥

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dēvānāmasi vahnitamaḥ pitṝṇāṁ prathamā svadhā | ṛṣīṇāṁ caritaṁ satyamatharvāṅgirasāmasi || 8 ||

💡

तुम देवताओं को हवि पहुँचाने वाले मुख्य अग्नि (हविर्वाह) हो, पितरों के लिए प्रथम स्वधा हो, और अथर्वा तथा अंगिरस ऋषियों के सत्य आचरण (प्राण क्रिया) हो।

मंत्र 26

इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥

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indrastvaṁ prāṇa tējasā rudrō'si perirakṣitā | tvamantarikṣē carasi sūryastvaṁ jyōtiṣāṁ patiḥ || 9 ||

💡

हे प्राण! तुम अपने तेज से इंद्र हो, तुम संहार करने वाले और रक्षा करने वाले रुद्र हो। तुम अंतरिक्ष में विचरते हो और तुम ही प्रकाशकों के स्वामी सूर्य हो।

मंत्र 27

यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः । आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥

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yadā tvamabhivarṣasyathēmāḥ prāṇa tē prajāḥ | ānandarūpāstiṣṭhanti kāmāyānnaṁ bhaviṣyatīti || 10 ||

💡

हे प्राण! जब तुम वर्षा करते हो, तब तुम्हारी ये प्रजाएँ इस आशा से आनंदित हो उठती हैं कि अब हमारे लिए प्रचुर मात्रा में अन्न उत्पन्न होगा।

मंत्र 28

व्रात्यस्त्वं प्राणैकऋषिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्वनः ॥ ११ ॥

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vrātyastvaṁ prāṇāikaṛṣirattā viśvasya satpatiḥ | vayamadyasya dātāraḥ pitā tvaṁ mātariśvanaḥ || 11 ||

💡

हे प्राण! तुम स्वभाव से ही शुद्ध (व्रात्य) हो, तुम मुख्य अग्नि (एकर्षि) हो, संपूर्ण सृष्टि के भोक्ता और स्वामी हो। हम तुम्हारे ही दिए हुए अन्न को ग्रहण करने वाले हैं, तुम अंतरिक्ष में विचरने वाले मातरिश्वा (प्राण वायु) के पिता हो।

मंत्र 29

या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि संतता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥

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yā tē tanūrvāci pratiṣṭhitā yā śrōtrē yā ca cakṣuṣi | yā ca manasi saṁtatā śivām tāṁ kuru mōtkramīḥ || 12 ||

💡

तुम्हारी जो शक्ति वाणी में, कानों में, आँखों में और मन में निरंतर व्याप्त है, उसे हमारे लिए कल्याणकारी (शुभ) बनाओ, हमें छोड़कर शरीर से मत जाओ।

मंत्र 30

प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥

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prāṇasyēdaṁ vaśē sarvaṁ tridivē yatpratiṣṭhitam | mātēva putrān rakṣasva śrīśca prajñāṁ ca vidhēhi na iti || 13 ||

💡

इस संसार में जो कुछ भी है और स्वर्गलोक में जो कुछ भी प्रतिष्ठित है, वह सब प्राण के ही वश में है। हे प्राण! माता की तरह हमारी रक्षा करो, और हमें श्री (समृद्धि) तथा प्रज्ञा (बुद्धि) प्रदान करो।

मंत्र 31

अथ हैनं कौसल्याश्चाश्वलायनो पप्रच्छ । भगवन्कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्छरीरे आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥

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atha hainaraṁ kausalyaścāśvalāyanō papracchya | bhagavankuta ēṣa prāṇō jāyatē kathamāyātyasmiñcharyirē ātmānaṁ vā pravibhajya kathaṁ prātiṣṭhatē kēnōtkramatē kathaṁ bāhyamabhidhattē kathamadhyātmamiti || 1 ||

💡

इसके बाद अश्वल के पुत्र कौसल्या ने पूछा— हे भगवन्! यह प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है? यह इस शरीर में कैसे आता है? अपने को विभाजित करके किस प्रकार शरीर में ठहरता है? यह शरीर से कैसे बाहर जाता है? यह बाहरी जगत (अधिभूत) को कैसे धारण करता है, और अंतःकरण (अध्यात्म) को कैसे नियमित करता है?

मंत्र 32

तस्मै स होवाच अतिप्रश्नान् पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमी ॥ २ ॥

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tasmai sa hōvāca atipraśnān pṛcchasi brahmiṣṭhō'sīti tasmāttē'haṁ bravīmī || 2 ||

💡

ऋषि ने उत्तर दिया— तुम अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछ रहे हो, क्योंकि तुम ब्रह्मनिष्ठ (ब्रह्म के खोजी) हो। इसलिए मैं तुमसे इन प्रश्नों का उत्तर कहता हूँ।

मंत्र 33

आत्मन एष प्राणो जायते । यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे ॥ ३ ॥

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ātmana ēṣa prāṇō jāyatē | yathaiṣā puruṣē chāyaitasminnētadātataṁ manōkṛtēnāyātyasmiñcharīrē || 3 ||

💡

यह प्राण परमात्मा (आत्मा) से ही उत्पन्न होता है। जैसे मनुष्य के साथ उसकी छाया जुड़ी रहती है, वैसे ही यह प्राण आत्मा पर फैला (आश्रित) है। यह मन के संकल्पों और कर्मों के कारण ही इस शरीर में आता है।

मंत्र 34

यथा सम्राडेवाधिकृतान् विनियुङ्क्ते । एतान् ग्रामान् एतान् ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव संनिधत्ते ॥ ४ ॥

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yathā samrāḍēvādhikṛtān viniyuṅktē | ētān grāmān ētān grāmānadhitiṣṭhasvētyēvamēvaiṣa prāṇa itarān prāṇān pṛthak pṛthagēva saṁnidhattē || 4 ||

💡

जैसे कोई चक्रवर्ती सम्राट अपने अधिकारियों को नियुक्त करता है कि— तुम इन-इन गांवों का शासन संभालो; वैसे ही यह मुख्य प्राण अन्य सहायक प्राणों को उनके अपने-अपने पृथक कार्यों में नियुक्त करता है।

मंत्र 35

पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥ ५ ॥

•

pāyūpasthē'pānaṁ cakṣuḥśrōtrē mukhanāsikābhyāṁ prāṇaḥ svayaṁ prātiṣṭhatē madhyē tu samānaḥ | ēṣa hyētaddhutamannaṁ samaṁ nayati tasmādētāḥ saptārciṣō bhavanti || 5 ||

💡

गुदा और जननेंद्रिय में अपान वायु कार्य करती है; मुख, नासिका, आँख और कान के मार्गों में मुख्य प्राण स्वयं कार्य करता है; और शरीर के मध्य (नाभि) भाग में समान वायु कार्य करती है। यह समान वायु ग्रहण किए हुए अन्न को शरीर में समान रूप से वितरित करती है, जिससे मस्तिष्क में सात ज्योतिर्मय शक्तियां जाग्रत होती हैं।

मंत्र 36

हृदि ह्येष आत्मा । अत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतं एकैकस्यां द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यसु व्यानश्चरति ॥ ६ ॥

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hṛdi hyēṣa ātmā | atraitadēkaśataṁ nāḍīnāṁ tāsāṁ śataṁ śataṁ ēkaikasyāṁ dvāsaptatirdvāsaptatiḥ pratiśākhānāḍīsahasrāṇi bhavantyasu vyānaścarati || 6 ||

💡

यह आत्मा हृदय में निवास करती है। इस हृदय में १०१ मुख्य नाड़ियां हैं। उनमें से प्रत्येक नाड़ी की १००-१०० शाखाएं हैं, और प्रत्येक शाखा की ७२-७२ हजार उपशाखाएं हैं। इन सभी नाड़ियों में व्यान वायु विचरती है।

मंत्र 37

अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७ ॥

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athaikayōrdhva udānaḥ puṇyēna puṇyaṁ lōkaṁ nayati pāpēna pāpamubhābhyāmēva manuṣyalōkam || 7 ||

💡

उन नाड़ियों में से एक मुख्य नाड़ी (सुषुम्णा) द्वारा उदान वायु ऊपर की ओर गमन करती है। वह मनुष्य को उसके पुण्यों के प्रभाव से स्वर्गलोक में ले जाती है, पापों के प्रभाव से नरक में ले जाती है, और दोनों के मिश्रित प्रभाव से पुनः मनुष्य लोक में लाती है।

मंत्र 38

आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८ ॥

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ādityō ha vai bāhyaḥ prāṇō udayatyēṣa hyēnaṁ cākṣuṣaṁ prāṇamanugṛhṇānaḥ | pṛthivyāṁ yā dēvatā saiṣā puruṣasyāpānamavaṣṭabhyāntarā yadākāśaḥ sa samānō vāyurvyānaḥ || 8 ||

💡

सूर्य ही बाह्य प्राण रूप में उदित होता है, जो मनुष्य की आँखों की दर्शन शक्ति पर कृपा करता है। पृथ्वी में जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति है, वह मनुष्य के अपान को थामे रखती है। शरीर के भीतर जो आकाश है, वह समान वायु है, और संपूर्ण वायुमंडल व्यान वायु है।

मंत्र 39

तेजो ह वै उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः । पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ९ ॥

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tējō ha vai udānastasmādupaśāntatējāḥ | punarbhavamindriyāirmānasi sampadyamānaiḥ || 9 ||

💡

शरीर का तेज ही उदान वायु है। इसलिए जब मनुष्य का शारीरिक तेज शांत (मृत्यु के समय) हो जाता है, तब वह इंद्रियों के मन में लीन हो जाने के बाद पुनः जन्म की ओर जाता है।

मंत्र 40

यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः । सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥

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yaccittastēnaiṣa prāṇamāyāti prāṇastējasā yuktaḥ | sahātmanā yathāsaṅkalpitaṁ lōkaṁ nayati || 10 ||

💡

मृत्यु के समय मनुष्य का जैसा चित्त (विचार) होता है, उसी के अनुसार वह मुख्य प्राण में प्रवेश करता है। वह प्राण उदान तेज के साथ युक्त होकर, जीवात्मा के साथ मिलकर, मनुष्य को उसके संकल्पित लोक में ले जाता है।

मंत्र 41

य एवं विद्वान् प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ११ ॥

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ya ēvaṁ vidvān prāṇaṁ vēda na hāsya prajā hīyatē'mṛtō bhavati tadēṣa ślōkaḥ || 11 ||

💡

जो ज्ञानी पुरुष इस प्रकार प्राण के रहस्यों को जानता है, उसकी संतान (वंश) कभी नष्ट नहीं होती, और वह अमर हो जाता है। इस विषय में यह श्लोक है।

मंत्र 42

उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा । अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२ ॥

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utpattimāyatiṁ sthānaṁ vibhutvaṁ caiva pañcadhā | adhyātmaṁ caiva prāṇस्य vijñāyāmṛtamaśnutē vijñāyāmṛtamaśnuta iti || 12 ||

💡

प्राण की उत्पत्ति, उसका शरीर में आना, उसका स्थान, उसका पाँच प्रकार से विभाजन और उसकी आध्यात्मिक सत्ता को जानकर मनुष्य अमरता को प्राप्त करता है। हाँ, वह अमरता को प्राप्त करता है।

मंत्र 43

अथ हैनं सौर्यायणी च गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान्पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥

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atha hainaraṁ sauryāyaṇī ca gārgyaḥ papracchya | bhagavannētasmin puruṣē kāni svapanti kānyasmiñjāgrati katara ēṣa dēvō svapnānpaśyati kasyaitatsukhaṁ bhavati kasminnu sarvē saṁpratiṣṭhitā bhavanti iti || 1 ||

💡

इसके बाद गर्ग गोत्र के सौर्यायणी ने पूछा— हे भगवन्! इस मनुष्य शरीर में कौन-कौन सो जाते हैं? कौन-कौन जागते रहते हैं? इनमें से कौन सा देव स्वप्न देखता है? किसको सुख (आनंद) का अनुभव होता है? और ये सब अंततः किसमें प्रतिष्ठित होते हैं?

मंत्र 44

तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनः उदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत्सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति । तस्मादेष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते न वदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥

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tasmai sa hōvāca | yathā gārgya marīcayō'rkasyāstaṁ gacchataḥ sarvā ētasmiṁstējōmaṇḍala ēkībhavanti | tāḥ punaḥ punarudayataḥ pracarantyēvaṁ ha vai tatsarvaṁ parē dēvē manasyēkībhavati | tasmādēṣa puruṣō na śṛṇōti na paśyati na jighrati na rasayatē na spṛśatē na vadatē nādattē nānandayatē na visarjayatē nēyāyatē svapitītyācakṣatē || 2 ||

💡

ऋषि ने उत्तर दिया— हे गार्ग्य! जैसे सूर्यास्त के समय उसकी सभी किरणें सूर्य के तेजोमंडल में एक हो जाती हैं, और पुनः सूर्योदय के समय चारों ओर फैल जाती हैं; वैसे ही जीवात्मा की समस्त इंद्रियां परम देव 'मन' में एक हो जाती हैं। इसलिए उस अवस्था में मनुष्य न सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंद लेता है, न त्याग करता है और न चलता है। लोग कहते हैं कि वह 'सो रहा है'।

मंत्र 45

प्राणान्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद् गार्हपत्यात्प्रणीयते प्रनयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३ ॥

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prāṇāgnaya ēvaitasmin purē jāgrati | gārhapatyō ha vā ēṣō'pānō vyānō'nvāhāryapacanō yad gārhapatyātpraṇīyatē pranayanādāhavanīyaḥ prāṇaḥ || 3 ||

💡

उस सुषुप्ति अवस्था में इस शरीर रूपी नगर में केवल प्राण रूपी अग्नियां ही जागती रहती हैं। अपान वायु ही गार्हपत्य अग्नि है, व्यान वायु अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) है, और गार्हपत्य अग्नि से उत्पन्न होने वाली आहवनीय अग्नि मुख्य प्राण है।

मंत्र 46

यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनो ह वाव यजमान इष्टफलमेवोदानः स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४ ॥

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yaducchvāsaniḥśvāsāvētāvāhutī samaṁ nayatīti sa samānaḥ | manō ha vāva yajamāna iṣṭaphalāmēvōdānaḥ sa ēnaṁ yajamānamaharaharbrahma gamayati || 4 ||

💡

जो उच्छ्वास (श्वास का अंदर जाना) और निःश्वास (श्वास का बाहर आना) रूपी दोनों आहुतियों को समान रूप से शरीर में चलाता है, वह समान वायु है। मन ही यज्ञ करने वाला यजमान है, और उदान वायु यज्ञ का इच्छित फल है, जो इस यजमान (मन) को प्रतिदिन सुषुप्ति में ब्रह्म के निकट ले जाती है।

मंत्र 47

अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च शुभ्रं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥ ५ ॥

•

atraiṣa dēvaḥ svapnē mahimānamanubhavati | yaddṛṣṭaṁ dṛṣṭamanupaśyati śrutaṁ śrutamēvārthamanuśṛṇōti dēśadigantaraiśca pratyanubhūtaṁ punaḥ punaḥ pratyanubhavati dṛṣṭaṁ cādṛṣṭaṁ ca śrutaṁ cāshrutaṁ ca anubhūtaṁ ca ananubhūtaṁ ca saccāsacca sarvaṁ paśyati sarvaḥ paśyati || 5 ||

💡

इस स्वप्नावस्था में यह मन देव अपनी महिमा का अनुभव करता है। जो कुछ पहले देखा है, उसे वह पुनः देखता है; जो सुना है, उसे पुनः सुनता है; विभिन्न देशों और दिशाओं में जो अनुभव किया है, उसे पुनः अनुभव करता है। जो देखा है और जो नहीं देखा है, जो सुना है और जो नहीं सुना है, जो अनुभव किया है और जो नहीं किया है, जो सत्य है और जो असत्य है — वह सब का स्वरूप होकर स्वयं सब कुछ देखता है।

मंत्र 48

स यदा तेजसाभिभूतो भवति । अत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ तदैतस्मिञ्छरीरे एतत्सुखं भवति ॥ ६ ॥

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sa yadā tējasābhibhūtō bhavati | atraiṣa dēvaḥ svapnān na paśyatyatha tadaitasmiñcharīrē ētatsukhaṁ bhavati || 6 ||

💡

जब वह मन देव पित्त आदि के दिव्य तेज (आत्मा के प्रकाश) से अभिभूत हो जाता है, तब वह कोई स्वप्न नहीं देखता। उस अवस्था में इस शरीर में परम सुख (गहरी सुषुप्ति का आनंद) होता है।

मंत्र 49

तद्यथा गार्ग्य वयंसि वासोवृक्षं संप्रतिष्ठन्ते । एवं ह वै तत्सर्वं पर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ७ ॥

•

tadyathā gārgya vayaṁsi vāsōvṛkṣaṁ saṁpratiṣṭhantē | ēvaṁ ha vai tatsarvaṁ para ātmani saṁpratiṣṭhatē || 7 ||

💡

हे गार्ग्य! जैसे पक्षी शाम के समय अपने घोंसले वाले वृक्ष पर विश्राम के लिए लौट आते हैं, वैसे ही यह सब कुछ अंततः उस परम आत्मा (परमात्मा) में विलीन और प्रतिष्ठित हो जाता है।

मंत्र 50

पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च पादौ च गंतव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं च अहंकारश्च अहंकर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ८ ॥

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pṛthivī ca pṛthivīmātrā ca āpaśca āpōmātrā ca tējasca tējōmaṇḍalamātrā ca vāyusca vāyumātrā ca ākāśascākāśamātrā ca cakṣusca draṣṭavyaṁ ca śrōtraṁ ca śrōtavyaṁ ca ghrāṇaṁ ca ghrātavyaṁ ca rasasca rasayitavyaṁ ca tvakca sparśayitavyaṁ ca vākca vaktavyaṁ ca hastou cādātavyaṁ cōpasthascānandayitavyaṁ ca pāyusca visarjayitavyaṁ ca pādou ca gaṁtavyaṁ ca manasca maṁtavyaṁ ca buddhīsca bōddhavyaṁ ca ahaṅkārasca ahaṅkartavyaṁ ca cittaṁ ca cētayitavyaṁ ca tējasca vidyōtayitavyaṁ ca prāṇasca vidhārayitavyaṁ ca || 8 ||

💡

पृथ्वी और उसकी सूक्ष्म मात्रा, जल और उसकी सूक्ष्म मात्रा, तेज और उसकी सूक्ष्म मात्रा, वायु और उसकी सूक्ष्म मात्रा, आकाश और उसकी सूक्ष्म मात्रा; आँख और उसका विषय, कान और उसका विषय, नाक और उसका विषय, जीभ और उसका विषय, त्वचा और उसका विषय; वाणी और उसका विषय, हाथ और उसका विषय, जननेंद्रिय और उसका विषय, गुदा और उसका विषय, पैर और उसका विषय; मन और उसके विचार, बुद्धि और उसके जानने योग्य विषय, अहंकार और उसका विषय, चित्त और उसका विषय, तेज और उसका विषय, तथा प्राण और उसका विषय — ये सब परमात्मा में विलीन होते हैं।

मंत्र 51

एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः । स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥ ९ ॥

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ēṣa hi draṣṭā spṛṣṭā śrōtā ghrātā rasayitā maṁtā bōddhā kartā vijñānātmā puruṣah | sa parē'kṣarē ātmani saṁpratiṣṭhatē || 9 ||

💡

यही जीवात्मा वास्तव में देखने वाला, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सूँघने वाला, चखने वाला, विचार करने वाला, निश्चय करने वाला, करने वाला और ज्ञान स्वरूप पुरुष है। वह अंततः उस अविनाशी परम आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है।

मंत्र 52

परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

•

paramēvākṣaraṁ pratipadyatē sa yō ha vai tadacchāyamaśarīramalōhitaṁ śubhramakṣaraṁ vēdayatē yastu sōmya | sa sarvajñaḥ sarvō bhavati tadēṣa ślōkah || 10 ||

💡

हे प्रिय सोम्य! जो मनुष्य उस छाया-रहित, शरीर-रहित, नाम-रूप-रहित, परम शुद्ध और अविनाशी परमेश्वर को जान लेता है, वह उस परम अविनाशी को ही प्राप्त हो जाता है। वह सर्वज्ञ होकर सब का स्वरूप हो जाता है। इस विषय में यह श्लोक है।

मंत्र 53

विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि संप्रतिष्ठन्ति यत्र । तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११ ॥

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vijñānātmā saha dēvaiśca sarvaiḥ prāṇā bhūtāni saṁpratiṣṭhanti yatra | tadakṣaraṁ vēdayatē yastu sōmya sa sarvajñaḥ sarvamēvāvīvēśēti || 11 ||

💡

हे प्रिय सोम्य! जिसमें यह ज्ञानात्मा (जीवात्मा), सभी इंद्रियों (देवगण), प्राण और पंचमहाभूत प्रतिष्ठित होते हैं; जो उस अविनाशी तत्व को जान लेता है, वह सर्वज्ञ होकर सब में प्रवेश कर जाता है (एकात्म हो जाता है)।

मंत्र 54

अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति ॥ १ ॥

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atha hainaraṁ śaibyaḥ satyakāmaḥ papracchya | sa yō ha vai tadbhagavan manuṣyēṣu prāyaṇāntamōṅkāramabhidhyāyīta | katamaṁ vāva sa tēna lōkaṁ jayatīti || 1 ||

💡

इसके बाद शिबि के पुत्र सत्यकाम ने पूछा— हे भगवन्! मनुष्यों में जो कोई जीवन के अंत काल तक निरंतर 'ॐकार' का ध्यान करता रहता है, वह उस ध्यान से किस लोक को जीतता है?

मंत्र 55

तस्मै स होवाच । एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २ ॥

•

tasmai sa hōvāca | ētadvai satyakāma paraṁ cāparaṁ ca brahma yadōṅkāraḥ | tasmādvidvānētēnaivāyatanēnaikataramanvēti || 2 ||

💡

ऋषि ने उत्तर दिया— हे सत्यकाम! यह ॐकार ही साक्षात परब्रह्म (निराकार) और अपरब्रह्म (सगुण) दोनों है। इसलिए ज्ञानी पुरुष इस ॐकार रूपी मार्ग का आश्रय लेकर इनमें से किसी एक को प्राप्त करता है।

मंत्र 56

स यद्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनेव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥ ३ ॥

•

sa yadyēkamātramabhidhyāyīta sa tēnēva saṁvēditastūrṇamēva jagatyāmabhisampadyatē | tamaṛcō manuṣyalōkamupanayantē sa tatra tapasā brahmacaryēṇa śraddhayā sampannō mahimānamanubhavati || 3 ||

💡

यदि वह केवल एक मात्रा (अकार) का ध्यान करता है, तो वह उसी से प्रेरित होकर शीघ्र ही पृथ्वी लोक पर जन्म लेता है। ऋग्वेद की ऋचाएँ उसे पुनः मनुष्य लोक में ले आती हैं। वह वहाँ तपस्या, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से युक्त होकर जीवन की महिमा का अनुभव करता है।

मंत्र 57

अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पद्यते स अन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४ ॥

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atha yadi dvimātrēṇa manasi sampadyatē sa antarikṣaṁ yajurbhirunnīyatē sōmalōkam | sa sōmalōkē vibhūtimanubhūya punarāvartatē || 4 ||

💡

और यदि वह दो मात्राओं (अकार और उकार) के ध्यान द्वारा मन में एकाग्र होता है, तो यजुर्वेद के मन्त्र उसे अंतरिक्ष में स्थित सोमलोक (चन्द्रलोक) में ले जाते हैं। वह सोमलोक में ऐश्वर्य का अनुभव करके पुनः लौट आता है।

मंत्र 58

यः पुनःरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्य संपन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परत्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते । तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५ ॥

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yaḥ punarētaṁ trimātrēṇōmityētēnaivākṣerēṇa paraṁ puruṣamabhidhyāyīta sa tējasi sūryē sampannaḥ | yathā pādōdarastvacā vinirmucyata ēvaṁ ha vai sa pāpmanā vinirmuktaḥ sa sāmabhirunnīyatē brahmalōkaṁ sa ētasmājjīvaghanātparatparaṁ puriśayaṁ puruṣamīkṣatē | tadētō ślōkō bhavataḥ || 5 ||

💡

परंतु जो मनुष्य तीन मात्राओं (अ, उ और म) से युक्त इस ॐकार अक्षर के द्वारा उस परम पुरुष (परमात्मा) का ध्यान करता है, वह सूर्यलोक में लीन हो जाता है। जैसे सांप अपनी केंचुली (त्वचा) को उतार फेंकता है, वैसे ही वह अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। सामवेद के मन्त्र उसे ब्रह्मलोक में ले जाते हैं। वह इस जीवसमूह रूपी जगत् से परे, हृदय में शयन करने वाले परात्पर परम पुरुष के दर्शन करता है। इस विषय में ये दो श्लोक हैं।

मंत्र 59

तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु समं प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६ ॥

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tisrō mātrā mṛtyumatyaḥ prayuktā anyōnyasaktā anaviprayuktāḥ | kriyāsu bāhyābhyantaramadhyamāsu samyakprayuktāsu na kampatē jñaḥ || 6 ||

💡

ॐकार की तीनों मात्राएँ स्वतंत्र रूप से विनाशशील (मृत्यु से घिरी) हैं। परंतु जब वे एक-दूसरे से भली-भांति जुड़कर बाह्य, आन्तरिक और मध्यवर्ती क्रियाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) में सम्यक रूप से प्रयोग की जाती हैं, तब आत्मज्ञानी पुरुष कभी विचलित नहीं होता।

मंत्र 60

ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैवायतनेनेन्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७ ॥

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ṛgbhirētaṁ yajurbhirantarikṣaṁ sāmabhiryattatkavayō vēdayantē | tamōṅkārēṇaivāyatanēnēnvēti vidvān yattacchāntamajaramamṛtamabhayaṁ paraṁ cēti || 7 ||

💡

ऋग्वेद के मन्त्रों से इस मनुष्य लोक को, यजुर्वेद के मन्त्रों से अंतरिक्ष (सोमलोक) को, और सामवेद के मन्त्रों से उस लोक को प्राप्त करते हैं जिसे केवल ज्ञानी पुरुष ही जानते हैं। विद्वान् पुरुष इस ॐकार के आश्रय से ही उस परम धाम को प्राप्त करता है जो शांत, अजर, अमृत, अभय और सर्वश्रेष्ठ है।

मंत्र 61

अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्य प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ तमहं कुमारमब्रुवं नाहमिमं वेद यद्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हाम्यनृतं वक्तुं स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वसौ पुरुष इति ॥ १ ॥

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atha hainaraṁ sukēśā bhāradvājaḥ papracchya | bhagavan hiraṇyanābhaḥ kausalyō rājaputrō māmuptyē praśnamapṛcchata | ṣōḍaśakalaṁ bhāradvāja puruṣaṁ vēttha tamahaṁ kumāramabruvaṁ nāhamimaṁ vēda yadyahamimamavēdiṣaṁ kathaṁ tē nāvakṣyamiti samūlō vā ēṣa pariśuṣyati yō'nṛtamabhivadati tasmānnārhāmyanṛtāṁ vaktuṁ sa tūṣṇīm rathamāruhya pravavrāja | taṁ tvā pṛcchāmi kvasou puruṣa iti || 1 ||

💡

इसके बाद भारद्वाज के पुत्र सुकेशा ने पूछा— हे भगवन्! कोसल देश के राजकुमार हिरण्यनाभ ने मेरे पास आकर यह प्रश्न पूछा था— 'हे भारद्वाज! क्या तुम सोलह कलाओं वाले पुरुष को जानते हो?' मैंने उस राजकुमार से कहा— 'मैं उसे नहीं जानता। यदि मैं उसे जानता, तो तुम्हें क्यों नहीं बताता? जो मनुष्य झूठ बोलता है, वह जड़ सहित सूख जाता है, इसलिए मैं झूठ बोलने योग्य नहीं हूँ।' वह चुपचाप रथ पर चढ़कर चला गया। अब मैं आपसे पूछता हूँ— वह सोलह कलाओं वाला पुरुष कहाँ स्थित है?

मंत्र 62

तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडश कला प्रभवन्तीति ॥ २ ॥

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tasmai sa hōvāca | ihaivāntaḥśarīrē sōmya sa puruṣō yasminnētāḥ ṣōḍaśa kalā prabhavantīti || 2 ||

💡

ऋषि ने उत्तर दिया— हे प्रिय सोम्य! वह परम पुरुष इसी शरीर के भीतर विद्यमान है, जिसमें से ये सोलह कलाएँ उत्पन्न होती हैं।

मंत्र 63

स ईक्षाञ्चक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३ ॥

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sa ēkṣāñcakrē | kasminnahamutkrānta utkrāntō bhaviṣyāmi kasmin vā pratiṣṭhitē pratiṣṭhasyāmīti || 3 ||

💡

उस पुरुष ने संकल्प किया— 'किस तत्व के शरीर से निकल जाने पर मैं भी निकल जाऊंगा, और किसके शरीर में स्थिर रहने पर मैं भी स्थिर रहूंगा?'

मंत्र 64

स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः । अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकानां नाम च ॥ ४ ॥

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sa prāṇamasṛjata prāṇācchraddhāṁ khaṁ vāyurjyōtirāpaḥ pṛthivīndriyaṁ manaḥ | annamannādvīryaṁ tapō mantrāḥ karma lōkā lōkēṣu ca nāma ca || 4 ||

💡

उसने सबसे पहले प्राण की रचना की। प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, पाँचों इंद्रियां, मन, अन्न, अन्न से बल (वीर्य), तप, मन्त्र, कर्म, विभिन्न लोक और उन लोकों में नाम का निर्माण किया।

मंत्र 65

स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५ ॥

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sa yathēmā nadyaḥ syandamānāḥ samudrāyaṇāḥ samudraṁ prāpyāstaṁ gacchanti bhidyētē tāsāṁ nāmarūpē samudra ityēvaṁ prōcyatē | ēvamēvāsya paridraṣṭurimāḥ ṣōḍaśa kalāḥ puruṣāyaṇāḥ puruṣaṁ prāpyāstaṁ gacchanti bhidyētē tāsāṁ nāmarūpē puruṣa ityēvaṁ prōcyatē sa ēṣō'kalō'mṛtō bhavati tadēṣa ślōkah || 5 ||

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जैसे बहती हुई नदियाँ समुद्र की ओर जाती हैं और समुद्र को प्राप्त करके उसी में लीन हो जाती हैं, जिससे उनके नाम और रूप नष्ट हो जाते हैं और लोग केवल 'समुद्र' ही कहते हैं; वैसे ही इस सर्वदर्शी परमात्मा की ये सोलह कलाएँ पुरुष में लीन हो जाती हैं, जिससे उनके नाम और रूप नष्ट हो जाते हैं और केवल 'पुरुष' ही कहा जाता है। वह कलाओं से रहित और अमर हो जाता है। इस विषय में यह श्लोक है।

मंत्र 66

अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः । तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६ ॥

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arā iva rathanābhau kalā yasminpratiṣṭhitāḥ | taṁ vēdyaṁ puruṣaṁ vēda yathā mā vō mṛtyuḥ parivyathā iti || 6 ||

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जैसे रथ के पहिये के नाभि में आरे टिके रहते हैं, वैसे ही जिसमें ये सोलह कलाएँ प्रतिष्ठित हैं — उस जानने योग्य परम पुरुष को तुम जानो, ताकि तुम्हें मृत्यु का भय पीड़ित न कर सके।

मंत्र 67

तान् होवाचैतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७ ॥

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tān hōvācaitāvadēvāhamētat paraṁ brahma vēda | nātaḥ paramastīti || 7 ||

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उन पिप्पलाद ऋषि ने उन शिष्यों से कहा— मैं इस परब्रह्म के विषय में इतना ही जानता हूँ, इससे परे और कुछ नहीं है।

मंत्र 68

ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८ ॥

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tē tamarcayantastvaṁ hi naḥ pitā yō'smākamavidyāyāḥ paraṁ pāraṁ tārayasīti | namaḥ paramaṛṣibhyō namaḥ paramaṛṣibhyaḥ || 8 ||

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उन शिष्यों ने गुरुदेव की पूजा (आरती) करते हुए कहा— आप ही हमारे वास्तविक पिता हैं, जिन्होंने हमें अज्ञान रूपी संसार सागर से पार कराया है। परम ऋषियों को नमस्कार है! परम ऋषियों को नमस्कार है।

शांति पाठ

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om saha nāvavatu | saha nau bhunaktu | saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

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हे परमात्मा! आप हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम दोनों साथ मिलकर पुरुषार्थ और सामर्थ्य प्राप्त करें। हमारी पढ़ी हुई विद्या तेजस्वी हो, और हम आपस में कभी द्वेष न करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

अथर्ववेद
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पठन और मनन सम्पूर्ण

आपने श्री प्रश्नोपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।