श्री मुण्डकोपनिषद्

Mundaka Upanishad • अथर्ववेद

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अथर्ववेद

श्री मुण्डकोपनिषद्

अथर्ववेद से सम्बद्ध, जहाँ परा और अपरा विद्या का भेद बताते हुए आत्मा की मुक्ति के लिए ध्यान को 'धनुष' के समान बताया गया है।

अवसर: नित्य संध्या वंदन (Daily Evening Prayers)
लाभ: सत्य की विजय, अपरा और परा विद्या में भेद (Understanding lower and higher knowledge, victory of Truth)
शांति पाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥ ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devāḥ | bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ || sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhiḥ | vyaśema devahitaṃ yadāyuḥ || svasti na indro vṛddhaśravāḥ | svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ || svasti nastārkṣyo ariṣṭanemiḥ | svasti no bṛhaspatirdādhātu || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

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हे देवताओं! हम कानों से सदा कल्याणकारी बातें सुनें, यज्ञ करते हुए आँखों से सदा शुभ देखें। स्थिर अंगों और शरीर से आपकी स्तुति करते हुए, देवताओं द्वारा निर्धारित पूर्ण आयु का आनंद लें। महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सबके पोषणकर्ता और ज्ञानस्वरूप पूषा देव हमारा कल्याण करें, अमंगल का नाश करने वाले गरुड़ देव हमारा कल्याण करें, और बुद्धि के अधिपति बृहस्पति देव हमारा कल्याण करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

मंत्र 2

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥

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oṃ brahmā devānāṃ prathamaḥ saṃbabhūva viśvasya kartā bhuvanasya goptā | sa brahmavidyāṃ sarvavidyāpratiṣṭhāmatharvāya jyeṣṭhaputrāya prāha || 1 ||

💡

देवताओं में सबसे पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जो इस विश्व के रचयिता और संसार के संरक्षक हैं। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया, जो समस्त विद्याओं की आधारभूमि है।

मंत्र 3

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माऽथर्वा तं पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥

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atharvaṇe yāṃ pravadeta brahmā'tharvā taṃ purovācāṅgire brahmavidyām | sa bhāradvājāya satyavāhāya prāha bhāradvājo'ṅgirase parāvarām || 2 ||

💡

ब्रह्मा ने अथर्वा को जो ब्रह्मविद्या सिखाई थी, अथर्वा ने प्राचीन काल में उसे अंगी नामक ऋषि को दिया। अंगी ने उसे भरद्वाज-वंशी सत्यवाह को दिया और सत्यवाह ने उसे अंगिरस को दिया।

मंत्र 4

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥

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śaunako ha vai mahāśālo'ṅgirasaṃ vidhivadupasannaḥ papraccha | kasminnu bhagavo vijñāte sarvamidaṃ vijñātaṃ bhavatīti || 3 ||

💡

महान गृहस्थ शौनक ने विधिपूर्वक अंगिरस ऋषि के पास जाकर आदर सहित पूछा— हे भगवन! किस तत्व को जान लेने पर यह सब कुछ (संपूर्ण जगत) ज्ञात हो जाता है?

मंत्र 5

तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४ ॥

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tasmai sa hovāca | dve vidye veditavye iti ha sma yadbrahmavido vadanti parā caivāparā ca || 4 ||

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अंगिरस ने शौनक से कहा— जानने योग्य दो प्रकार की विद्याएँ हैं, एक परा (उच्च) और दूसरी अपरा (निम्न)। ऐसा ब्रह्मवेत्ता ऋषियों का कहना है।

मंत्र 6

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥

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tatrāparā ṛgvedo yajurvedaḥ sāmavedo'tharvavedaḥ śikṣā kalpo vyākaraṇaṃ niruktaṃ chando jyotiṣamiti | atha parā yayā tadakṣaramadhigamyate || 5 ||

💡

उनमें से अपरा विद्या वह है जिसके द्वारा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त होता है। और परा विद्या वह है जिसके द्वारा उस अविनाशी परमेश्वर का साक्षात्कार होता है।

मंत्र 7

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्ण मचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६ ॥

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yattadadreśyamagrāhyamagotramavarṇa macakṣuḥśrotraṃ tadapāṇipādam | nityaṃ vibhuṃ sarvagataṃ susūkṣmaṃ tadavyayaṃ yadbhūtayoniṃ paripaśyanti dhīrāḥ || 6 ||

💡

उस परा विद्या द्वारा बुद्धिमान पुरुष उस तत्व को सर्वत्र देखते हैं जो इन्द्रियों की पकड़ से परे है, जिसका कोई गोत्र या वर्ण नहीं है, जिसके आँख-कान और हाथ-पैर नहीं हैं, जो नित्य, सर्वव्यापी, अत्यंत सूक्ष्म, अविनाशी और समस्त प्राणियों का आदि कारण है।

मंत्र 8

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ७ ॥

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yathorṇanābhiḥ sṛjate gṛhṇate ca yathā pṛthivyāmoṣadhayaḥ saṃbhavanti | yathā sataḥ puruṣātkeśalomāni tathā'kṣarātsaṃbhavatīha viśvam || 7 ||

💡

जैसे मकड़ी अपने भीतर से धागा निकालती और समेट लेती है, जैसे पृथ्वी पर अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, और जैसे जीवित मनुष्य के शरीर पर बाल उगते हैं, वैसे ही उस अविनाशी ब्रह्म से यह संपूर्ण ब्रह्मांड उत्पन्न होता है।

मंत्र 9

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८ ॥

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tapasā cīyate brahma tato'nnamabhijāyate | annātprāṇo manaḥ satyaṃ lokāḥ karmasu cāmṛtam || 8 ||

💡

तप (ज्ञानमय संकल्प) के द्वारा ब्रह्म का विस्तार होता है, उससे अन्न (अव्याकृत प्रकृति) उत्पन्न होता है। अन्न से प्राण (हिरण्यगर्भ), उससे मन, मन से पंचमहाभूत (सत्य), उससे विभिन्न लोक, और उन लोकों में कर्मों का अमर फल उत्पन्न होता है।

मंत्र 10

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९ ॥

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yaḥ sarvajñaḥ sarvavidyasya jñānamayaṃ tapaḥ | tasmādetadbrahma nāma rūpamannaṃ ca jāyate || 9 ||

💡

जो परमात्मा सर्वज्ञ (सामान्य रूप से सब जानने वाला) और सर्वविद् (विशेष रूप से सब जानने वाला है) और जिसका तप ज्ञानमय संकल्प है; उसी अविनाशी से यह हिरण्यगर्भ (कार्य-ब्रह्म), नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं।

मंत्र 11

तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १ ॥

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tadetatsatyaṃ mantreṣu karmāṇi kavayo yānyapaśyaṃstāni tretāyāṃ bahudhā saṃtatāni | tānyācaratha niyataṃ satyakāmā eṣa vaḥ panthāḥ sukṛtasya loke || 1 ||

💡

यह सत्य है कि ऋषियों ने मन्त्रों में जिन कर्मों (यज्ञों) को देखा था, वे त्रेता युग में अनेक प्रकार से विस्तारित हुए। स्वर्ग की इच्छा रखने वाले तुम लोग उनका निरंतर श्रद्धापूर्वक पालन करो। तुम्हारे शुभ कर्मों के फल की प्राप्ति का यही एकमात्र मार्ग है।

मंत्र 12

यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने । तदाऽऽज्यभागावन्तरेणाऽऽहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥

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yadā lelāyate hyarciḥ samiddhe havyavāhane | tadā''jyabhāgāvantareṇā''hutīḥ pratipādayet || 2 ||

💡

जब यज्ञ की वेदी में अग्नि प्रज्वलित होकर लपटें उठने लगें, तब साधक को आज्य-भाग के मध्य में (जहाँ आहुति देनी हो) श्रद्धापूर्वक आहुतियाँ देनी चाहिए।

मंत्र 13

(प्रतिपादयेच्छ्रद्धया हुतम्) यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमास मचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च । अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुत मासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३ ॥

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(pratipādayecchraddhayā hutam) yasyāgnihotramadarśamapaurṇamāsa macāturmāsyamanāgrayaṇamatithivarjitaṃ ca | ahutamavaiśvadevamavidhinā huta māsaptamāṃstasya lokān hinasti || 3 ||

💡

जिसका अग्निहोत्र यज्ञ दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य और आग्रयण यज्ञों से रहित है, जिसमें अतिथियों का सत्कार नहीं किया जाता, जो समय पर नहीं किया जाता, जिसमें वैश्वदेव यज्ञ नहीं किया जाता और जो विधिहीन किया जाता है, वह यजमान के सातों लोकों को नष्ट कर देता है।

मंत्र 14

काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४ ॥

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kālī karālī ca manojavā ca sulohitā yā ca sudhūmravarṇā | sphuliṅginī viśvarucī ca devī lelāyamānā iti sapta jihvāḥ || 4 ||

💡

काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी और विश्वरुचि—ये प्रज्वलित अग्नि की सात लपटें (जिह्वाएँ) हैं।

मंत्र 15

एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् । तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र (तन्नयन्त्येताः) देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥

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eteṣu yaścarate bhrājamāneṣu yathākālaṃ cāhutayo hyādadāyan | taṃ nayantyetāḥ sūryasya raśmayo yatra (tannayantyetāḥ) devānāṃ patireko'dhivāsaḥ || 5 ||

💡

जो मनुष्य अग्नि की इन चमकती हुई लपटों के समय सही विधि से आहुति देता है, वे आहुतियाँ उसे सूर्य की किरणों के रूप में वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओं का एकमात्र स्वामी (इन्द्र) निवास करता है।

मंत्र 16

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥

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ehyehīti tamāhutayaḥ suvarcasaḥ sūryasya raśmibhiryajamānaṃ vahanti | priyāṃ vācamabhivadantyo'rcayantya eṣa vaḥ puṇyaḥ sukṛto brahmalokaḥ || 6 ||

💡

वे प्रकाशमान आहुतियाँ 'आओ, आओ' कहती हुई यजमान को सूर्य की किरणों के मार्ग से ले जाती हैं, और मीठे वचनों से उसकी प्रशंसा करती हुई कहती हैं— 'यह आपके शुभ कर्मों का फल है, जो आपके लिए स्वर्गलोक में तैयार है।'

मंत्र 17

प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥

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plavā hyete adṛḍhā yajñarūpā aṣṭādaśoktamavaraṃ yeṣu karma | etacchreyo ye'bhinandanti mūḍhā jarāmṛtyuṃ te punarevāpi yanti || 7 ||

💡

अठारह व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले ये यज्ञ रूपी नौकाएँ अत्यंत निर्बल और नाशवान हैं। जो मूर्ख लोग इसे ही परम कल्याण मानकर इसकी सराहना करते हैं, वे बार-बार बुढ़ापे और मृत्यु के चक्र में फँसते हैं।

मंत्र 18

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥

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avidyāyāmantare vartamānāḥ svayaṃ dhīrāḥ paṇḍitaṃmanyamānāḥ | jaṅghanyamānāḥ pariyanti mūḍhā andhenaiva nīyamānā yathāndhāḥ || 8 ||

💡

अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए मूर्ख लोग स्वयं को बुद्धिमान और ज्ञानी मानते हुए, वैसे ही भटकते रहते हैं जैसे किसी अंधे के पीछे चलने वाले अंधे गड्ढे में गिर जाते हैं।

मंत्र 19

अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः । यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागा त्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥

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avidyāyāṃ bahudhā vartamānā vayaṃ kṛtārthā ityabhimanyanti bālāḥ | yatkarmiṇo na pravedayanti rāgā ttenāturāḥ kṣīṇalokāścyavante || 9 ||

💡

अविद्या में डूबे हुए अज्ञानी अनेक प्रकार से गर्व करते हुए सोचते हैं कि 'हम कृतार्थ हो गए हैं'। क्योंकि सकाम कर्म करने वाले राग के कारण सत्य को नहीं जानते, इसलिए वे पुण्य क्षीण होने पर स्वर्गलोक से गिर जाते हैं।

मंत्र 20

इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥

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iṣṭāpūrtaṃ manyamānā variṣṭhaṃ nānyacchreyo vedayante pramūḍhāḥ | nākasya pṛṣṭhe te sukṛte'nubhūtvemaṃ lokaṃ hīnataraṃ vā viśanti || 10 ||

💡

यज्ञ और कुआँ-बावड़ी आदि बनवाने (इष्ट और पूर्त) कर्मों को ही परम पुरुषार्थ मानने वाले मूर्ख लोग इससे श्रेष्ठ अन्य किसी मार्ग को नहीं जानते। वे स्वर्गलोक में कर्मों का सुख भोगकर पुनः इस मनुष्य लोक या इससे भी नीचे के लोकों में जन्म लेते हैं।

मंत्र 21

तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥

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tapaḥśraddhe ye hyupavasantyaraṇye śāntā vidvāṃso bhaikṣyacaryāṃ carantaḥ | sūryadvāreṇa te virajāḥ prayānti yatrāmṛtaḥ sa puruṣo hyavyayātmā || 11 ||

💡

परंतु जो वन में निवास करने वाले शांत तपस्वी और सन्यासी भिक्षा मांगकर जीवन व्यतीत करते हैं, वे श्रद्धा और तप के द्वारा सूर्य-द्वार (उत्तरायण मार्ग) से वहाँ जाते हैं जहाँ वह अविनाशी परम पुरुष निवास करता है।

मंत्र 22

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥

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parīkṣya lokān karmacitān brāhmaṇo nirvedamāyānnāstyakṛtaḥ kṛtena | tadvijñānārthaṃ sa gurumevābhigacchet samitpāṇiḥ śrotriyaṃ brahmaniṣṭham || 12 ||

💡

कर्मों से प्राप्त होने वाले लोकों की नश्वरता को देखकर बुद्धिमान ब्राह्मण वैराग्य को प्राप्त हो। क्योंकि अकृत (परमात्मा) कर्मों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उस परम तत्व को जानने के लिए वह हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में जाए।

मंत्र 23

तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥

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tasmai sa vidvānupasannāya samyak praśāntacittāya śamānvitāya | yenākṣaraṃ puruṣaṃ veda satyaṃ provāca tāṃ tattvato brahmavidyām || 13 ||

💡

उस शरणागत शिष्य को, जिसका चित्त शांत और इन्द्रियाँ वश में हैं, वह ज्ञानी गुरु सत्य ब्रह्मविद्या का उपदेश दे, जिससे वह उस अविनाशी सत्य परमेश्वर को जान सके।

मंत्र 24

तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १ ॥

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tadetatsatyaṃ yathā sudīptātpāvakādvisphuliṅgāḥ sahasraśaḥ prabhavante sarūpāḥ | tathā'kṣarādvividhāḥ somya bhāvāḥ prajāyante tatra caivāpiyanti || 1 ||

💡

यह सत्य है कि जैसे जलती हुई अग्नि से हजारों चिनगारियाँ उसी के समान रूप वाली निकलती हैं, वैसे ही उस अविनाशी परमात्मा से अनेक प्रकार के जीव उत्पन्न होते हैं और अंत में उसी में लीन हो जाते हैं।

मंत्र 25

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥

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divyo hyamūrtaḥ puruṣaḥ sabāhyābhyantaro hyajaḥ | aprāṇo hyamanāḥ śubhro hyakṣarātparataḥ paraḥ || 2 ||

💡

वह परम पुरुष (परमात्मा) दिव्य, निराकार, जन्मरहित, भीतर और बाहर सर्वत्र व्याप्त, प्राण और मन से रहित, परम शुद्ध और अविनाशी प्रकृति से भी परे है।

मंत्र 26

एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥

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etasmājjāyate prāṇo manaḥ sarvendriyāṇi ca | khaṃ vāyurjyotirāpaḥ pṛthivī viśvasya dhāriṇī || 3 ||

💡

उसी परमात्मा से प्राण, मन, समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, अग्नि, जल और संपूर्ण विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी उत्पन्न होती है।

मंत्र 27

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४ ॥

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agnirmūrdhā cakṣuṣī candrasūryau diśaḥ śrotre vāgvivṛtāśca vedāḥ | vāyuḥ prāṇo hṛdayaṃ viśvamasya padbhyāṃ pṛthivī hyeṣa sarvabhūtāntarātmā || 4 ||

💡

अग्नि (द्युलोक) जिसका मस्तक है, सूर्य और चंद्रमा जिसके नेत्र हैं, दिशाएँ जिसके कान हैं, वेदों की वाणी जिसकी वाणी है, वायु जिसका प्राण है, संपूर्ण विश्व जिसका हृदय है, और जिसके चरणों से पृथ्वी उत्पन्न हुई है—वही समस्त प्राणियों का अंतरात्मा है।

मंत्र 28

तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्संप्रसूताः ॥ ५ ॥

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tasmādagniḥ samidho yasya sūryaḥ somātparjanya oṣadhayaḥ pṛthivyām | pumān retaḥ siñcati yoṣitāyāṃ bahvīḥ prajāḥ puruṣātsaṃprasūtāḥ || 5 ||

💡

उसी परमात्मा से अग्नि (द्युलोक) उत्पन्न होती है जिसका ईंधन सूर्य है, चन्द्रमा से बादल (पर्जन्य), बादलों से पृथ्वी पर औषधियाँ, और पुरुष द्वारा स्त्री में वीर्य सींचने से अनेक प्रकार की प्रजाएँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार सब कुछ उसी परम पुरुष से उत्पन्न होता है।

मंत्र 29

तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च । संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥

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tasmādṛcaḥ sāma yajūṃṣi dīkṣā yajñāśca sarve kratavo dakṣiṇāśca | saṃvatsaraśca yajamānaśca lokāḥ somo yatra pavate yatra sūryaḥ || 6 ||

💡

उसी परमात्मा से ऋचाएँ (ऋग्वेद), साम (सामवेद), यजुष् (यजुर्वेद), दीक्षा के नियम, समस्त यज्ञ, अनुष्ठान, दान, संवत्सर (काल), यजमान, और वे लोक उत्पन्न होते हैं जहाँ चन्द्रमा और सूर्य प्रकाशित होते हैं।

मंत्र 30

तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥

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tasmācca devā bahudhā saṃprasūtāḥ sādhyā manuṣyāḥ paśavo vayāṃsi | prāṇāpānau vrīhiyavau tapaśca śraddhā satyaṃ brahmacaryaṃ vidhiśca || 7 ||

💡

उसी से अनेक श्रेणियों के देवता, साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण और अपान, धान और जौ, तपस्या, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और नियम उत्पन्न होते हैं।

मंत्र 31

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मा त्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥

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sapta prāṇāḥ prabhavanti tasmā tsaptārciṣaḥ samidhaḥ sapta homāḥ | sapta ime lokā yeṣu caranti prāṇā guhāśayā nihitāḥ sapta sapta || 8 ||

💡

उसी परमात्मा से सात प्राण (ज्ञानेन्द्रियाँ), सात लपटें (विषयों का ग्रहण), सात समिधाएँ (विषय भोग), सात होम (ज्ञान क्रियाएँ) और सात स्थान (हृदय की वृत्तियाँ) उत्पन्न होते हैं जहाँ प्राण विचरते हैं।

मंत्र 32

अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मा त्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥

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ataḥ samudrā girayaśca sarve'smā tsyandante sindhavaḥ sarvarūpāḥ | ataśca sarvā oṣadhayo rasaśca yenaiṣa bhūtaistiṣṭhate hyantarātmā || 9 ||

💡

उसी परमात्मा से समस्त समुद्र, पर्वत, नदियाँ और नाना प्रकार की वनस्पतियाँ तथा उनके रस उत्पन्न होते हैं, जिनके द्वारा यह जीवात्मा शरीर के भीतर रहकर पंचभूतों से घिरा रहता है।

मंत्र 33

पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥

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puruṣa evedaṃ viśvaṃ karma tapo brahma parāmṛtam | etadyo veda nihitaṃ guhāyāṃ so'vidyāgranthiṃ vikiratīha somya || 10 ||

💡

यह संपूर्ण ब्रह्मांड—कर्म, तप, और ज्ञान—परम ब्रह्म ही है। जो बुद्धिमान मनुष्य इस हृदय रूपी गुफा में छिपे हुए परम सत्य को जान लेता है, वह इसी जन्म में अज्ञान की ग्रंथि को काट डालता है।

मंत्र 34

आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १ ॥

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āviḥ saṃnihitaṃ guhācaraṃ nāma mahatpadamatraitatsamarpitam | ejatprāṇannimiṣacca yadetajjānatha sadasadvareṇyaṃ paraṃ vijñānādyadvariṣṭhaṃ prajānām || 1 ||

💡

वह ब्रह्म प्रकाशमान, हृदय के अत्यंत निकट रहने वाला, बुद्धि रूपी गुफा में स्थित और सबका महान आश्रय है। इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी गतिशील, श्वास लेने वाला और आँख झपकाने वाला है, वह सब उसी में स्थापित है। वह सत् और असत् से परे, जानने योग्य और सबसे श्रेष्ठ है।

मंत्र 35

यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २ ॥

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yadarcimadyadaṇubhyo'ṇu ca yasmi~llokā nihitā lokinaśca | tadetadakṣaraṃ brahma sa prāṇastadu vāṅmanaḥ tadetatsatyaṃ tadamṛtaṃ tadveddhavyaṃ somya viddhi || 2 ||

💡

जो प्रकाशमान है, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, जिसमें समस्त लोक और उनके निवासी स्थित हैं; वही अविनाशी ब्रह्म है। वही प्राण है, वही वाणी और मन है। वही परम सत्य और अमृत है। हे साधक! तुम उसी को अपना लक्ष्य बनाओ।

मंत्र 36

धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं संधयीत । (संदधीत) आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३ ॥

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dhanurgṛhītvaupaniṣadaṃ mahāstraṃ śaraṃ hyupāsāniśitaṃ saṃdhayīta | (saṃdadhīta) āyamya tadbhāvagatena cetasā lakṣyaṃ tadevākṣaraṃ somya viddhi || 3 ||

💡

उपनिषदों के महान ज्ञान रूपी धनुष को लेकर, उस पर निरंतर उपासना द्वारा तीक्ष्ण किए गए ध्यान रूपी बाण को चढ़ाओ। हे प्रिय! परमात्मा के ध्यान में मग्न होकर उस अविनाशी ब्रह्म को अपना लक्ष्य मानकर वेधो।

मंत्र 37

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥

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praṇavo dhanuḥ śaro hyātmā brahma tallakṣyamucyate | apramattena veddhavyaṃ śaravattanmayo bhavet || 4 ||

💡

ॐकार धनुष है, जीवात्मा बाण है, और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा गया है। प्रमादरहित होकर उस लक्ष्य को वेधना चाहिए, जिससे बाण की तरह आत्मा ब्रह्म में लीन (तद्रूप) हो जाए।

मंत्र 38

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५ ॥

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yasmin dyauḥ pṛthivī cāntarikṣamotaṃ manaḥ saha prāṇaiśca sarvaiḥ | tamevaikaṃ jānatha ātmānamanyā vāco vimuñcathāmṛtasyaiṣa setuḥ || 5 ||

💡

जिस परमात्मा में द्युलोक, पृथ्वी, अंतरिक्ष, मन और समस्त इन्द्रियाँ पिरोई हुई हैं; उस अद्वितीय आत्मा को ही जानो और अन्य सभी व्यर्थ की बातों को छोड़ दो। यही अमृतत्व प्राप्ति का परम सेतु है।

मंत्र 39

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः । स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः । ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६ ॥

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arā iva rathanābhau saṃhatā yatra nāḍyaḥ | sa eṣo'ntaścarate bahudhā jāyamānaḥ | omityevaṃ dhyāyatha ātmānaṃ svasti vaḥ pārāya tamasaḥ parastāt || 6 ||

💡

जैसे रथ के पहिये के नाभि में आरे जुड़े रहते हैं, वैसे ही जहाँ हृदय की समस्त नाड़ियाँ मिलती हैं, वहाँ वह परमात्मा निवास करता है। उस परमात्मा का 'ॐ' के रूप में ध्यान करो। अज्ञान रूपी अंधकार से पार जाने में तुम्हारा कल्याण हो।

मंत्र 40

(पराय) यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि । दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥ (संप्रतिष्ठितः) मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं संनिधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥ ७ ॥

•

(parāya) yaḥ sarvajñaḥ sarvavidyasyaiṣa mahimā bhuvi | divye brahmapure hyeṣa vyomnyātmā pratiṣṭhitaḥ | | (saṃpratiṣṭhitaḥ) manomayaḥ prāṇaśarīranetā pratiṣṭhito'nne hṛdayaṃ saṃnidhāya | tadvijñānena paripaśyanti dhīrā ānandarūpamamṛtaṃ yadvibhāti || 7 ||

💡

वह सर्वज्ञ और सर्वविद् है और जिसकी महिमा इस संसार में फैली हुई है; वह परमात्मा आकाश रूपी दिव्य हृदय-कमल में प्रतिष्ठित है। वह मन का नियामक और प्राणों का अधिष्ठाता होकर अन्नमय शरीर में स्थित है।

मंत्र 41

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८ ॥

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bhidyate hṛdayagranthiśchidyante sarvasaṃśayāḥ | kṣīyante cāsya karmāṇi tasmindṛṣṭe parāvare || 8 ||

💡

जब साधक उस कार्य-कारण रूप परमेश्वर का साक्षात्कार कर लेता है, तब उसके हृदय की अज्ञान रूपी ग्रंथि टूट जाती है, सारे संशय समाप्त हो जाते हैं और उसके संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं।

मंत्र 42

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९ ॥

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hiraṇmaye pare kośe virajaṃ brahma niṣkalam | tacchubhraṃ jyotiṣāṃ jyotistadyadātmavido viduḥ || 9 ||

💡

परम प्रकाशमान स्वर्णमयी कोश (बुद्धि गुफा) में निष्कल (अंगहीन) और निर्मल ब्रह्म स्थित है। वह शुद्ध ज्योति स्वरूप है, और उसे आत्मज्ञानी पुरुष ही प्रकाशित देखते हैं।

मंत्र 43

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १० ॥

•

na tatra sūryo bhāti na candratārakaṃ nemā vidyuto bhānti kuto'yamagniḥ | tameva bhāntamanubhāti sarvaṃ tasya bhāsā sarvamidaṃ vibhāti || 10 ||

💡

वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है, न चंद्रमा, न तारे और न ही यह बिजली चमकती है; फिर इस अग्नि की तो बात ही क्या? उसी के प्रकाशित होने पर यह सब प्रकाशित होता है और उसी के प्रकाश से यह संपूर्ण जगत प्रकाशित है।

मंत्र 44

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११ ॥

•

brahmaivedamamṛtaṃ purastādbrahma paścādbrahma dakṣiṇataścottareṇa | adhaścordhvaṃ ca prasṛtaṃ brahmaivedaṃ viśvamidaṃ variṣṭham || 11 ||

💡

वह अमृत स्वरूप ब्रह्म ही सामने है, वही पीछे है, वही दाईं ओर है और वही बाईं ओर है। वह ऊपर और नीचे सर्वत्र फैला हुआ है। यह संपूर्ण दिखाई देने वाला ब्रह्मांड केवल सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है।

मंत्र 45

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १ ॥

•

dvā suparṇā sayujā sakhāyā samānaṃ vṛkṣaṃ pariṣasvajāte | tayoranyaḥ pippalaṃ svādvattyanaśnannanyo abhicākaśīti || 1 ||

💡

दो सुंदर पंखों वाले पक्षी (जीवात्मा और परमात्मा) जो सदा साथ रहने वाले मित्र हैं, एक ही वृक्ष (शरीर) पर निवास करते हैं। उनमें से एक (जीवात्मा) वृक्ष के मीठे-कड़वे फलों को खाता है, और दूसरा (परमात्मा) बिना खाए केवल देखता रहता है।

मंत्र 46

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो ऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥

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samāne vṛkṣe puruṣo nimagno 'nīśayā śocati muhyamānaḥ | juṣṭaṃ yadā paśyatyanyamīśa masya mahimānamiti vītaśokaḥ || 2 ||

💡

एक ही वृक्ष पर बैठा हुआ जीवात्मा अज्ञान और मोह के कारण दुःखी होकर व्याकुल रहता है। परंतु जब वह अपने परम पूज्य मित्र (परमात्मा) और उसकी महिमा को देखता है, तब वह शोक से मुक्त हो जाता है।

मंत्र 47

यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥

•

yadā paśyaḥ paśyate rukmavarṇaṃ kartāramīśaṃ puruṣaṃ brahmayonim | tadā vidvān puṇyapāpe vidhūya nirañjanaḥ paramaṃ sāmyamupaiti || 3 ||

💡

जब साधक उस सुवर्णमय, सृष्टिकर्ता, सर्वव्यापी परम पुरुष को देख लेता है, तब वह ज्ञानी पुरुष पुण्य और पाप दोनों को धोकर परम पवित्रता और समता को प्राप्त होता है।

मंत्र 48

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी । आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावा नेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥

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prāṇo hyeṣa yaḥ sarvabhūtairvibhāti vijānan vidvān bhavate nātivādī | ātmakrīḍa ātmaratiḥ kriyāvā neṣa brahmavidāṃ variṣṭhaḥ || 4 ||

💡

वह परमात्मा ही समस्त प्राणियों में प्राण रूप में प्रकाशित हो रहा है। इसे जानकर ज्ञानी पुरुष व्यर्थ का विवाद नहीं करता। वह आत्मा में ही क्रीड़ा करने वाला, आत्मा में ही रमण करने वाला और श्रेष्ठ कर्म करने वाला ब्रह्मवेत्ताओं में सर्वश्रेष्ठ होता है।

मंत्र 49

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५ ॥

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satyena labhyastapasā hyeṣa ātmā samyagjñānena brahmacaryeṇa nityam | antaḥśarīre jyotirmayo hi śubhro yaṃ paśyanti yatayaḥ kṣīṇadoṣāḥ || 5 ||

💡

यह आत्मा सदा सत्य, तप, सम्यक ज्ञान और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त करने योग्य है। अंतःकरण में स्थित वह ज्योतिर्मय, शुद्ध परमात्मा देह के भीतर ही विद्यमान है, जिसे निष्पाप सन्यासी ही देख पाते हैं।

मंत्र 50

सत्यमेव जयते नानृतं (जयति) सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥

•

satyameva jayate nānṛtaṃ (jayati) satyena panthā vitato devayānaḥ | yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam || 6 ||

💡

सत्य की ही सदा विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य के मार्ग से ही दिव्य देवयान मार्ग का विस्तार होता है, जिस पर चलकर पूर्णकाम ऋषिगण उस परम धाम को प्राप्त करते हैं जहाँ सत्य का श्रेष्ठ खजाना है।

मंत्र 51

बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति । दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥

•

bṛhacca taddivyamacintyarūpaṃ sūkṣmācca tatsūkṣmataraṃ vibhāti | dūrātsudūre tadihāntike ca paśyatsvihaiva nihitaṃ guhāyām || 7 ||

💡

वह ब्रह्म महान, दिव्य, अचिन्त्य (विचार से परे) और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है। वह दूर से भी बहुत दूर है और बहुत निकट भी है। वह आत्मज्ञानी पुरुषों के हृदय रूपी गुफा में स्थित रहता है।

मंत्र 52

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व- स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥

•

na cakṣuṣā gṛhyate nāpi vācā nānyairdevaistapasā karmaṇā vā | jñānaprasādena viśuddhasattva- statastu taṃ paśyate niṣkalaṃ dhyāyamānaḥ || 8 ||

💡

वह न तो नेत्रों से ग्रहण किया जा सकता है, न वाणी से, न अन्य इन्द्रियों से, न तप से और न कर्मों से। बुद्धि के शुद्ध होने पर ध्यान योग द्वारा ही मनुष्य उस निराकार परमेश्वर का साक्षात्कार कर पाता है।

मंत्र 53

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥

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eṣo'ṇurātmā cetasā veditavyo yasminprāṇaḥ pañcadhā saṃviveśa | prāṇaiścittaṃ sarvamotaṃ prajānāṃ yasminviśuddhe vibhavatyeṣa ātmā || 9 ||

💡

यह सूक्ष्म आत्मा बुद्धि द्वारा हृदय में जानने योग्य है, जहाँ पाँच प्रकार के प्राण निवास करते हैं। जीवात्मा का मन इन्द्रियों के साथ ओत-प्रोत है। बुद्धि के शुद्ध होने पर ही आत्मा का स्वरूप प्रकाशित होता है।

मंत्र 54

यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् । तं तं लोकं जयते तांश्च कामां स्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥ १० ॥

•

yaṃ yaṃ lokaṃ manasā saṃvibhāti viśuddhasattvaḥ kāmayate yāṃśca kāmān | taṃ taṃ lokaṃ jayate tāṃśca kāmāṃ stasmādātmajñaṃ hyarcayedbhūtikāmaḥ || 10 ||

💡

शुद्ध चित्त वाला ज्ञानी पुरुष मन से जिस-जिस लोक की कामना करता है और जिन-किन भोगों को चाहता है, वह उन लोकों और भोगों को प्राप्त कर लेता है। इसलिए ऐश्वर्य चाहने वाला व्यक्ति ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष का आदर-सत्कार करे।

मंत्र 55

स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् । उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥

•

sa vedaitatparamaṃ brahma dhāma yatra viśvaṃ nihitaṃ bhāti śubhram | upāsate puruṣaṃ ye hyakāmāste śukrametadativartanti dhīrāḥ || 1 ||

💡

वह आत्मज्ञानी पुरुष उस परम ब्रह्म धाम को जानता है जहाँ यह संपूर्ण ब्रह्मांड प्रतिष्ठित है और जो शुद्ध ज्योति से प्रकाशित है। जो निष्काम साधक ऐसे आत्मज्ञानी पुरुष की सेवा करते हैं, वे इस संसार चक्र (पुनर्जन्म) से मुक्त हो जाते हैं।

मंत्र 56

कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र । पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥

•

kāmān yaḥ kāmayate manyamānaḥ sa kāmabhirjāyate tatra tatra | paryāptakāmasya kṛtātmanastu ihaiva sarve pravilīyanti kāmāḥ || 2 ||

💡

जो मनुष्य भोगों की कामना करता हुआ उनका चिंतन करता है, वह अपनी कामनाओं के अनुसार उन-उन स्थानों में पुनः जन्म लेता है। परंतु जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है और जिसकी सभी कामनाएँ शांत हो गई हैं, उसके समस्त राग यहीं नष्ट हो जाते हैं।

मंत्र 57

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३ ॥

•

nāyamātmā pravacanena labhyo na medhayā na bahunā śrutena | yamevaiṣa vṛṇute tena labhya stasyaiṣa ātmā vivṛṇute tanūṃ svām || 3 ||

💡

यह आत्मा न तो प्रवचन देने से प्राप्त होती है, न बुद्धि से, और न बहुत सुनने से। जिसे यह आत्मा स्वयं चुनती है, उसी को प्राप्त होती है; उसके समक्ष आत्मा अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर देती है।

मंत्र 58

(आत्मा वृणुते) नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वां- स्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥

•

(ātmā vṛṇute) nāyamātmā balahīnena labhyo na ca pramādāttapaso vāpyaliṅgāt | etairupāyairyatate yastu vidvāṃ- stasyaiṣa ātmā viśate brahmadhāma || 4 ||

💡

यह आत्मा बलहीन मनुष्य द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती, न प्रमाद (लापरवाही) से, और न बिना वैराग्य के तप से। परंतु जो बुद्धिमान मनुष्य इन उपायों से यत्न करता है, उसकी आत्मा ब्रह्मधाम में प्रवेश कर जाती है।

मंत्र 59

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः । ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥

•

saṃprāpyainamṛṣayo jñānatṛptāḥ kṛtātmāno vītarāgāḥ praśāntāḥ | te sarvagaṃ sarvataḥ prāpya dhīrā yuktātmānaḥ sarvamevāviśanti || 5 ||

💡

उस परमात्मा को प्राप्त करके ऋषिगण ज्ञान से तृप्त, शोकरहित, जितेन्द्रिय और शांत हो जाते हैं। वे सर्वव्यापी परमात्मा को सर्वत्र अनुभव करते हुए अंततः उसी में विलीन हो जाते हैं।

मंत्र 60

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥

•

vedāntavijñānasuniścitārthāḥ saṃnyāsayogādyatayaḥ śuddhasattvāḥ | te brahmalokeṣu parāntakāle parāmṛtāḥ parimucyanti sarve || 6 ||

💡

वेदान्त ज्ञान के निश्चय द्वारा जिनका अंतःकरण शुद्ध हो गया है, वे सन्यासी मृत्यु के समय ब्रह्मलोक में परम ब्रह्म के साथ एकाकार होकर सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।

मंत्र 61

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्वे एकीभवन्ति ॥ ७ ॥

•

gatāḥ kalāḥ pañcadaśa pratiṣṭhā devāśca sarve pratidevatāsu | karmāṇi vijñānamayaśca ātmā pare'vyaye sarve ekībhavanti || 7 ||

💡

मुक्त होने पर शरीर की पन्द्रह कलाएँ अपने-अपने कारणों (पंचभूतों) में लीन हो जाती हैं, समस्त इन्द्रियाँ अपने-अपने देवताओं में मिल जाती हैं, और यजमान के कर्म तथा बुद्धि रूपी आत्मा सब मिलकर उस अविनाशी ब्रह्म में एकाकार हो जाते हैं।

मंत्र 62

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥

•

yathā nadyaḥ syandamānāḥ samudre 'staṃ gacchanti nāmarūpe vihāya | tathā vidvān nāmarūpādvimuktaḥ parātparaṃ puruṣamupaiti divyam || 8 ||

💡

जैसे बहती हुई नदियाँ अपने नाम और रूप को त्यागकर समुद्र में लीन हो जाती हैं, वैसे ही आत्मज्ञानी पुरुष अपने नाम और रूप से मुक्त होकर उस परम दिव्य पुरुष (परमात्मा) को प्राप्त हो जाता है।

मंत्र 63

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥

•

sa yo ha vai tatparamaṃ brahma veda brahmaiva bhavati nāsyābrahmavitkule bhavati | tarati śokaṃ tarati pāpmānaṃ guhāgranthibhyo vimukto'mṛto bhavati || 9 ||

💡

जो कोई उस परम ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। उसके कुल में कोई भी ब्रह्म से अनभिज्ञ नहीं रहता। वह शोक और पापों से तर जाता है और हृदय की ग्रंथियों से मुक्त होकर अमर हो जाता है।

मंत्र 64

तदेतदृचाऽभ्युक्तम् । क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः । तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १० ॥

•

tadetadṛcā'bhyuktam | kriyāvantaḥ śrotriyā brahmaniṣṭhāḥ svayaṃ juhvata ekarṣiṃ śraddhayantaḥ | teṣāmevaitāṃ brahmavidyāṃ vadeta śirovrataṃ vidhivadyaistu cīrṇam || 10 ||

💡

इस ब्रह्मविद्या के उपदेश के विषय में यह ऋग्वेद का नियम कहा गया है— जो लोग शास्त्रानुकूल कर्म करने वाले, वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ, स्वयं आहुति देने वाले और सिर पर समिधा धारण करने का व्रत (शिरोव्रत) नियमपूर्वक पालन करते हैं, उन्हीं को यह ब्रह्मविद्या दी जानी चाहिए।

मंत्र 65

तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥

•

tadetatsatyamṛṣiraṅgirāḥ purovāca naitadacīrṇavrato'dhīte | namaḥ paramaṛṣibhyo namaḥ paramaṛṣibhyaḥ || 11 ||

💡

यह परम सत्य ज्ञान प्राचीन काल में अंगिरस ऋषि ने शौनक को दिया था। जिसने व्रत का नियमपूर्वक पालन न किया हो, वह इसे न पढ़े। परम ऋषियों को नमस्कार है! परम ऋषियों को नमस्कार है!

शांति पाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥ ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

•

Om bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devāḥ | bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ || sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhiḥ | vyaśema devahitaṃ yadāyuḥ || svasti na indro vṛddhaśravāḥ | svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ || svasti nastārkṣyo ariṣṭanemiḥ | svasti no bṛhaspatirdādhātu || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

💡

हे देवताओं! हम कानों से सदा कल्याणकारी बातें सुनें, यज्ञ करते हुए आँखों से सदा शुभ देखें। स्थिर अंगों और शरीर से आपकी स्तुति करते हुए, देवताओं द्वारा निर्धारित पूर्ण आयु का आनंद लें। महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सबके पोषणकर्ता और ज्ञानस्वरूप पूषा देव हमारा कल्याण करें, अमंगल का नाश करने वाले गरुड़ देव हमारा कल्याण करें, और बुद्धि के अधिपति बृहस्पति देव हमारा कल्याण करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

अथर्ववेद
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पठन और मनन सम्पूर्ण

आपने श्री मुण्डकोपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।