श्री माण्डूक्योपनिषद्
Mandukya Upanishad • अथर्ववेद
श्री माण्डूक्योपनिषद्
केवल १२ मन्त्रों का सबसे संक्षिप्त उपनिषद, जिसे आदि शंकराचार्य ने मुक्ति के लिए पर्याप्त बताया है; यह आत्मा की ४ अवस्थाओं का वर्णन करता है।
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥ ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devāḥ | bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ || sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhiḥ | vyaśema devahitaṃ yadāyuḥ || svasti na indro vṛddhaśravāḥ | svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ || svasti nastārkṣyo ariṣṭanemiḥ | svasti no bṛhaspatirdādhātu || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||
हे देवताओं! हम कानों से सदा कल्याणकारी बातें सुनें, यज्ञ करते हुए आँखों से सदा शुभ देखें। स्थिर अंगों और शरीर से आपकी स्तुति करते हुए, देवताओं द्वारा निर्धारित पूर्ण आयु का आनंद लें। महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सबके पोषणकर्ता और ज्ञानस्वरूप पूषा देव हमारा कल्याण करें, अमंगल का नाश करने वाले गरुड़ देव हमारा कल्याण करें, और बुद्धि के अधिपति बृहस्पति देव हमारा कल्याण करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!
ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव। यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥
oṃ ityetadakṣaramidaṃ sarvaṃ tasyopavyākhyānaṃ bhūtaṃ bhavad bhaviṣyaditi sarvamoṅkāra eva| yaccānyat trikālātītaṃ tadapyoṅkāra eva || 1 ||
यह अविनाशी 'ॐ' अक्षर ही सब कुछ है। भूत, वर्तमान और भविष्य — यह सब ॐकार ही है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी तीनों कालों से अतीत (परे) है, वह भी ॐकार ही है।
सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २ ॥
sarvaṃ hyetad brahmāyamātmā brahma so'yamātmā catuṣpāt || 2 ||
यह सब कुछ निश्चित रूप से ब्रह्म है। यह आत्मा भी ब्रह्म है। इस आत्मा के चार पाद (अवस्थाएँ) हैं।
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३ ॥
jāgaritasthāno bahiṣprajñaḥ saptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ sthūlabhugvaiśvānaraḥ prathamaḥ pādaḥ || 3 ||
जाग्रत अवस्था जिसका स्थान है, बाहर की ओर जिसकी चेतना (प्रज्ञा) है, जो सात अंगों और उन्नीस मुखों वाला है तथा जो स्थूल (भौतिक) विषयों का उपभोग करने वाला है—वह 'वैश्वानर' ही आत्मा का पहला पाद है।
स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
svapnasthāno'ntaḥprajñaḥ saptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ praviviktabhuktaijaso dvitīyaḥ pādaḥ || 4 ||
स्वप्न अवस्था जिसका स्थान है, भीतर की ओर जिसकी चेतना (प्रज्ञा) है, जो सात अंगों और उन्नीस मुखों वाला है तथा जो सूक्ष्म (मानसिक) विषयों का उपभोग करने वाला है—वह 'तैजस' ही आत्मा का दूसरा पाद है।
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम्। सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
yatra supto na kañcana kāmaṃ kāmayate na kañcana svapnaṃ paśyati tat suṣuptam| suṣuptasthāna ekībhūtaḥ prajñānaghana evānandamayo hyānandabhuk cetomukhaḥ prājñastṛtīyaḥ pādaḥ || 5 ||
जहाँ सोया हुआ पुरुष न तो किसी भोग की कामना करता है और न कोई स्वप्न देखता है, वह गहरी नींद (सुषुप्ति) की अवस्था है। इस सुषुप्ति स्थान में रहने वाला, एकीकृत चेतना वाला, प्रज्ञान का घन (ज्ञानपुंज), आनंदमय, आनंद का भोक्ता और चेतना रूपी मुख वाला 'प्राज्ञ' ही आत्मा का तीसरा पाद है।
एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥
eṣa sarveśvaraḥ eṣa sarvajña eṣo'ntaryāmyeṣa yoniḥ sarvasya prabhavāpyayau hi bhūtānām || 6 ||
यह (प्राज्ञ रूप आत्मा) ही सबका ईश्वर (नियंता) है, यही सर्वज्ञ है, यही अंतर्यामी (भीतर रहकर प्रेरणा देने वाला) है, यही सबका कारण (उत्पत्ति स्थान) है तथा समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय का मूल स्थान है।
नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७ ॥
nāntaḥprajñaṃ na bahiṣprajñaṃ nobhayataḥprajñaṃ na prajñānaghanaṃ na prajñaṃ nāprajñam| adṛṣṭamavyavahāryamagrāhyamalakṣaṇamacintyamavyapadeśyamekātmapratyayasāraṃ prapañcopaśamaṃ śāntaṃ śivamadvaitaṃ caturthaṃ manyante sa ātmā sa vijñeyaḥ || 7 ||
जो न भीतर की चेतना वाला है, न बाहर की चेतना वाला है, न दोनों ओर की चेतना वाला है, न ज्ञान का समूह (प्रज्ञानघन) है, न केवल ज्ञानस्वरूप है और न ही अज्ञानी है; जो अदृश्य, अव्यवहार्य (व्यवहार में न आने वाला), अग्राह्य (इंद्रियों की पकड़ से बाहर), अलक्षण (अज्ञेय), अचिंत्य, अव्यपदेश्य (अकथनीय), एकमात्र आत्म-अनुभव का सार, प्रपंच (संसार) से सर्वथा रहित, परम शांत, कल्याणकारी (शिव) और अद्वैत (एकमात्र) है—उसे ही चतुर्थ (तुरीय) पाद माना जाता है। वही आत्मा है और वही जानने योग्य है।
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥
so'yamātmādhyakṣaramoṅkāro'dhimātraṃ pādā mātrā mātrāśca pādā akāra ukāro makāra iti || 8 ||
वही पूर्वोक्त आत्मा अक्षरों की दृष्टि से 'ॐकार' है और मात्राओं की दृष्टि से पाद है। आत्मा के चारों पाद ही ॐकार की मात्राएँ हैं और मात्राएँ ही पाद हैं, जो कि 'अकार' (अ), 'उकार' (उ) और 'मकार' (म) हैं।
जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद्वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥
jāgaritasthāno vaiśvānaro'kāraḥ prathamā mātrā''pterādimattvādvā''pnoti ha vai sarvān kāmānādiśca bhavati ya evaṃ veda || 9 ||
जाग्रत स्थान वाला वैश्वानर ॐकार की पहली मात्रा 'अ' (अकार) है, क्योंकि वह सर्वव्यापक है और सबसे पहला है। जो मनुष्य इस रहस्य को इस प्रकार जानता है, वह सब कामनाओं को प्राप्त करता है और सबका आदि (प्रधान) हो जाता है।
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षादुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥
svapnasthānastaijasa ukāro dvitīyā mātrotkarṣādubhayatvādvotkarṣati ha vai jñānasantatiṃ samānaśca bhavati nāsyābrahmavitkule bhavati ya evaṃ veda || 10 ||
स्वप्न स्थान वाला तैजस ॐकार की दूसरी मात्रा 'उ' (उकार) है, क्योंकि वह उत्कृष्टता (अकार से श्रेष्ठ होने) के कारण श्रेष्ठ है अथवा दोनों (अकार और मकार) के मध्य में स्थित है। जो मनुष्य इसे इस प्रकार जानता है, वह ज्ञान की परंपरा को बढ़ाता है, सबके प्रति समभाव वाला होता है और उसके कुल में कोई भी ब्रह्म से अनभिज्ञ (अज्ञानी) नहीं होता।
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥
suṣuptasthānaḥ prājño makārastṛtīyā mātrā miterapītervā minoti ha vā idaṃ sarvamapītiśca bhavati ya evaṃ veda || 11 ||
सुषुप्ति स्थान वाला प्राज्ञ ॐकार की तीसरी मात्रा 'म' (मकार) है, क्योंकि वह परिमाण (सबको मापने वाला) है अथवा वह स्थान है जिसमें सब विलीन हो जाते हैं। जो मनुष्य इसे इस प्रकार जानता है, वह इस संपूर्ण जगत के सत्य को माप लेता है (तत्व को जान लेता है) और सबका लय-कारण (विलीन करने वाला) बन जाता है।
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
amātraścaturtho'vyavahāryaḥ prapañcopaśamaḥ śivo'dvaita evamoṅkāra ātmaiva saṃviśatyātmanā''tmānaṃ ya evaṃ veda || 12 ||
अमात्र (मात्रा से रहित), व्यवहार से परे, प्रपंच का उपशमन (शांत करने वाला), परम कल्याणकारी और अद्वैत ही आत्मा का चतुर्थ (तुरीय) पाद है। इस प्रकार ॐकार ही साक्षात् आत्मा है। जो मनुष्य इस रहस्य को जानता है, वह अपनी जीवात्मा को परमात्मा (परम आत्मा) में विलीन कर देता है।
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः। व्यशेम देवहितं यदायुः॥ ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devāḥ | bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ || sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhiḥ | vyaśema devahitaṃ yadāyuḥ || svasti na indro vṛddhaśravāḥ | svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ || svasti nastārkṣyo ariṣṭanemiḥ | svasti no bṛhaspatirdādhātu || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||
हे देवताओं! हम कानों से सदा कल्याणकारी बातें सुनें, यज्ञ करते हुए आँखों से सदा शुभ देखें। स्थिर अंगों और शरीर से आपकी स्तुति करते हुए, देवताओं द्वारा निर्धारित पूर्ण आयु का आनंद लें। महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सबके पोषणकर्ता और ज्ञानस्वरूप पूषा देव हमारा कल्याण करें, अमंगल का नाश करने वाले गरुड़ देव हमारा कल्याण करें, और बुद्धि के अधिपति बृहस्पति देव हमारा कल्याण करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!
पठन और मनन सम्पूर्ण
आपने श्री माण्डूक्योपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।