श्री केनोपनिषद्

Kena Upanishad • सामवेद

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सामवेद

श्री केनोपनिषद्

सामवेद के तलवकार ब्राह्मण के अन्तर्गत आने वाला उपनिषद जो बुद्धि, मन और इन्द्रियों के परम प्रेरक तत्व 'ब्रह्म' की जिज्ञासा करता है।

अवसर: ज्ञान योग चिंतन (Contemplation on Knowledge)
लाभ: बुद्धि और प्राणों के प्रेरक परमेश्वर का ज्ञान (Knowledge of the Prime Mover of mind and breath)
शांति पाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om āpyāyantu mamāṅgāni vāk-prāṇaś-cakṣuḥ śrotram-atho balam-indriyāṇi ca sarvāṇi | sarvaṃ brahmaupaniṣadaṃ mā'haṃ brahma nirākuryāṃ mā mā brahma nirākarod-anirākaraṇam-astv-anirākaraṇaṃ me'stu | tad-ātmani nirate ya upaniṣatsu dharmās-te mayi santu te mayi santu || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

💡

हे परमात्मा! मेरे सभी अंग, वाणी, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, बल और समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट हों। उपनिषदों में वर्णित सब कुछ ब्रह्म ही है। मैं कभी ब्रह्म का तिरस्कार न करूँ, और न ही ब्रह्म मेरा त्याग करे। उपनिषदों के परम धर्म मुझमें निवास करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

मंत्र 2

केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति॥१॥

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keneṣitaṃ patati preṣitaṃ manaḥ kena prāṇaḥ prathamaḥ praiti yuktaḥ | keneṣitāṃ vācamimāṃ vadanti cakṣuḥ śrotraṃ ka u devo yunakti || 1 ||

💡

मन किसकी इच्छा और प्रेरणा से अपने विषयों की ओर जाता है? मुख्य प्राण किससे नियुक्त होकर सर्वप्रथम गतिशील होता है? मनुष्य किसकी इच्छा से इस वाणी को बोलते हैं? नेत्र और कान को उनके अपने-अपने कार्यों में कौन सा देव नियुक्त करता है?

मंत्र 3

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः। चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥२॥

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śrotrasya śrotraṃ manaso mano yadvāco ha vācaṃ sa u prāṇasya prāṇaḥ | cakṣuṣas-cakṣur-atimucya dhīrāḥ pretyāsmāl-lokād-amṛtā bhavanti || 2 ||

💡

वह (परमात्मा) कान का कान, मन का मन, वाणी की वाणी, प्राण का प्राण और आँख की आँख है। धीर पुरुष इस सत्य को जानकर और इंद्रियों से तादात्म्य छोड़ कर, इस लोक से विदा होने पर अमर हो जाते हैं।

मंत्र 4

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वागच्छति नो मनः। न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात्॥ अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे॥३॥

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na tatra cakṣur-gacchati na vāg-gacchati no manaḥ | a vidmo na vijānīmo yathaitad-anuśiṣyāt || anyad-eva tad-viditād-atho aviditād-adhi | iti śuśruma pūrveṣāṃ ye nas-tad-vyācacakṣire || 3 ||

💡

वहाँ न तो आँख पहुँच पाती है, न वाणी और न ही मन। हम नहीं जानते और न ही यह समझ पाते हैं कि इस परब्रह्म का उपदेश किस प्रकार दिया जाए। वह ज्ञात से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। ऐसा हमने पूर्वजों (गुरुओं) से सुना है जिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी।

मंत्र 5

यद्वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥४॥

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yad-vācā'nabhyuditaṃ yena vāg-abhyudyate | tad-eva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yad-idam-upāsate || 4 ||

💡

जो वाणी द्वारा प्रकट नहीं किया जा सकता, परंतु जिसके द्वारा वाणी प्रकट होती है—उसी को तुम ब्रह्म समझो, न कि उसे जिसकी लोग यहाँ उपासना करते हैं।

मंत्र 6

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥५॥

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yan-manasā na manute yenāhur-mano matam | tad-eva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yad-idam-upāsate || 5 ||

💡

जिसका मन के द्वारा मनन नहीं किया जा सकता, परंतु जिसके विषय में ज्ञानी कहते हैं कि मन उसी के द्वारा जाना जाता है—उसी को तुम ब्रह्म समझो, न कि उसे जिसकी लोग यहाँ उपासना करते हैं।

मंत्र 7

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥६॥

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yac-cakṣuṣā na paśyati yena cakṣūṃṣi paśyati | tad-eva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yad-idam-upāsate || 6 ||

💡

जिसे आँखों से कोई नहीं देख पाता, परंतु जिसके द्वारा आँखें देखती हैं—उसी को तुम ब्रह्म समझो, न कि उसे जिसकी लोग यहाँ उपासना करते हैं।

मंत्र 8

यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥७॥

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yac-chrotreṇa na śṛṇoti yena śrotram-idaṃ śrutam | tad-eva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yad-idam-upāsate || 7 ||

💡

जिसे कानों से कोई नहीं सुन पाता, परंतु जिसके द्वारा कानों को सुनने की शक्ति प्राप्त होती है—उसी को तुम ब्रह्म समझो, न कि उसे जिसकी लोग यहाँ उपासना करते हैं।

मंत्र 9

यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥८॥

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yat-prāṇena na prāṇiti yena prāṇaḥ praṇīyate | tad-eva brahma tvaṃ viddhi nedaṃ yad-idam-upāsate || 8 ||

💡

जो श्वास (प्राण) के द्वारा जीवित नहीं रहता, अपितु जिसके द्वारा प्राण स्वयं संचालित होता है—उसी को तुम ब्रह्म समझो, न कि उसे जिसकी लोग यहाँ उपासना करते हैं।

मंत्र 10

यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्। यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम्॥९॥

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yadi manyase suvedeti dahram-evāpi nūnaṃ tvaṃ vettha brahmaṇo rūpam | yad-asya tvaṃ yad-asya deveṣv-atha nu mīmāṃsy-eva te manye viditam || 9 ||

💡

यदि तुम सोचते हो कि 'मैं ब्रह्म को भली-भांति जानता हूँ', तो निश्चित ही तुम ब्रह्म के स्वरूप को बहुत कम जानते हो; तुम केवल उसका वही रूप जानते हो जो इंद्रियों या देवताओं द्वारा सीमित है। अतः वह तुम्हारे लिए और अधिक विचारणीय (खोजने योग्य) है।

मंत्र 11

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च। यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥१०॥

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nāhaṃ manye suvedeti no na vedeti veda ca | yo nas-tad-veda tad-veda no na vedeti veda ca || 10 ||

💡

मैं ऐसा नहीं मानता कि मैं इसे बहुत अच्छी तरह जानता हूँ, न ही मैं यह मानता हूँ कि मैं इसे नहीं जानता। हममें से जो कोई इस वाक्य का रहस्य समझता है कि 'न तो मैं नहीं जानता और न मैं जानता हूँ', वही वास्तव में जानता है।

मंत्र 12

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥११॥

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yasyāmataṃ tasya mataṃ mataṃ yasya na veda saḥ | avijñātaṃ vijānatāṃ vijñātam-avijānatām || 11 ||

💡

जिसके मत में ब्रह्म अज्ञात है (अर्थात जो मानता है कि ब्रह्म बुद्धि का विषय नहीं है), वही उसे जानता है; और जो मानता है कि वह उसे जानता है, वह उसे नहीं जानता। ब्रह्म उनके लिए अविज्ञात (अजाना) है जो स्वयं को ज्ञानी मानते हैं, और उनके लिए विज्ञात (जाना हुआ) है जो स्वयं को अज्ञानी मानते हैं।

मंत्र 13

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते। आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्॥१२॥

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pratibodha-viditaṃ matam-amṛtatvaṃ hi vindate | ātmanā vindate vīryaṃ vidyayā vindate'mṛtam || 12 ||

💡

ब्रह्म तब जाना जाता है जब उसका प्रत्येक अनुभव या बोध में साक्षात्कार होता है, क्योंकि इसी से मनुष्य अमरता प्राप्त करता है। आत्मा से मनुष्य को (आत्मिक) बल मिलता है और ब्रह्मविद्या से अमरता।

मंत्र 14

इहैव चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥१३॥

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iha ced-avedīd-atha satyam-asti na ced-ihāvedīn-mahatī vinaṣṭiḥ | bhūteṣu bhūteṣu vicitya dhīrāḥ pretyāsmāl-lokād-amṛtā bhavanti || 13 ||

💡

यदि किसी ने इस जन्म में उस परम तत्व को जान लिया, तो उसका जीवन सार्थक और सत्य है। यदि इस जन्म में उसे नहीं जाना, तो बहुत बड़ा विनाश है (अर्थात जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है)। बुद्धिमान पुरुष सभी प्राणियों में उस एक परमात्मा को देखकर इस लोक से जाने पर अमर हो जाते हैं।

मंत्र 15

ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त॥१४॥

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brahma ha devebhyo vijigye tasya ha brahmaṇo vijaye devā amahīyanta || 14 ||

💡

एक बार ब्रह्म ने देवताओं की भलाई के लिए (असुरों पर) विजय प्राप्त की। ब्रह्म की उस विजय से देवता लोग अत्यंत महिमावान और आनंदित हो उठे (उन्हें लगा कि यह उनकी स्वयं की शक्ति है)।

मंत्र 16

त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति। तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति॥१५॥

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ta aikṣantāsmākamevāyaṃ vijayo'smākamevāyaṃ mahimeti | taddhaiṣāṃ vijajñau tebhyo ha prādurbabhūva tanna vyajānata kimidaṃ yakṣamiti || 15 ||

💡

वे सोचने लगे— 'यह विजय हमारी ही है, और यह महिमा (प्रतिष्ठा) भी हमारी ही है।' ब्रह्म उनके इस अहंकार को जान गया और उनके सामने एक यक्ष (विचित्र दिव्य प्राणी) के रूप में प्रकट हुआ। देवता समझ नहीं पाए कि यह यक्ष कौन है।

मंत्र 17

तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति॥१६॥

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te'gnimabruvañ-jātaveda etad-vijānīhi kim-idaṃ yakṣam-iti tatheti || 16 ||

💡

उन्होंने अग्निदेव से कहा— 'हे जातवेदा! जाकर पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है।' अग्निदेव ने कहा— 'ठीक है'।

मंत्र 18

तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति॥१७॥

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tad-abhyadravat-tam-abhyavadat-ko'sīty-agnir-vā aham-asmīty-abravīj-jātavedā vā aham-asmīti || 17 ||

💡

अग्नि उस यक्ष की ओर दौड़े। यक्ष ने उनसे पूछा— 'तुम कौन हो?' अग्नि ने उत्तर दिया— 'मैं अग्नि हूँ, मैं ही जातवेदा (सब कुछ जानने वाला) हूँ'।

मंत्र 19

तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति॥१८॥

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tasmins-tvayi kiṃ vīryam-ity-apīdaṃ sarvaṃ daheyaṃ yad-idaṃ pṛthivyām-iti || 18 ||

💡

यक्ष ने पूछा— 'तुममें ऐसी कौन सी शक्ति है?' अग्नि ने कहा— 'पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उस सब को जलाकर भस्म कर सकता हूँ'।

मंत्र 20

तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति॥१९॥

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tasmai tṛṇaṃ nidadhāv-etad-daheti | tad-upapreyāya sarva-javena tan-na śaśāka dagdhuṃ sa tata eva nivavṛte naitad-aśakaṃ vijñātuṃ yad-etad-yakṣam-iti || 19 ||

💡

यक्ष ने उनके सामने एक तिनका (तृण) रख दिया और कहा— 'इसे जलाओ।' अग्नि पूरे वेग के साथ उस तिनके की ओर गए, परंतु उसे जला न सके। वे लज्जित होकर वहाँ से लौट आए और देवताओं से बोले— 'मैं नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है'।

मंत्र 21

अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति॥२०॥

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atha vāyum-abruvan-vāyav-etad-vijānīhi kim-etad-yakṣam-iti tatheti || 20 ||

💡

तब देवताओं ने वायुदेव से कहा— 'हे वायु! जाकर पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है।' वायुदेव ने कहा— 'ठीक है'।

मंत्र 22

तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति॥२१॥

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tad-abhyadravat-tam-abhyavadat-ko'sīti vāyur-vā aham-asmīty-abravīn-mātariśvā vā aham-asmīti || 21 ||

💡

वायु यक्ष की ओर दौड़े। यक्ष ने पूछा— 'तुम कौन हो?' वायु ने उत्तर दिया— 'मैं वायु हूँ, मैं ही मातरिश्वा (अंतरिक्ष में विचरण करने वाला) हूँ'।

मंत्र 23

तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति॥२२॥

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tasmins-tvayi kiṃ vīryam-ity-apīdaṃ sarvam-ādadīya yad-idaṃ pṛthivyām-iti || 22 ||

💡

यक्ष ने पूछा— 'तुममें ऐसी कौन सी शक्ति है?' वायु ने कहा— 'पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उस सब को उड़ाकर ले जा सकता हूँ या ग्रहण कर सकता हूँ'।

मंत्र 24

तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति॥२३॥

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tasmai tṛṇaṃ nidadhāv-etad-ādatsveti tad-upapreyāya sarva-javena tan-na śaśākādātuṃ sa tata eva nivavṛte naitad-aśakaṃ vijñātuṃ yad-etad-yakṣam-iti || 23 ||

💡

यक्ष ने पुनः वही तिनका रख दिया और कहा— 'इसे उठाओ।' वायु पूरे वेग के साथ उसकी ओर गए, परंतु उसे हिला भी न सके। वे लौट आए और देवताओं से बोले— 'मैं नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है'।

मंत्र 25

अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे॥२४॥

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athaindram-abruvan-maghavann-etad-vijānīhi kim-etad-yakṣam-iti tatheti tad-abhyadravat-tasmāt-tirodadhe || 24 ||

💡

तब देवताओं ने इंद्र से कहा— 'हे मघवन! जाकर पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है।' इंद्र ने कहा— 'ठीक है।' वे यक्ष की ओर बढ़े, परंतु यक्ष उनके सामने से अंतर्धान (लुप्त) हो गया।

मंत्र 26

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं तां होवाच किमेतद्यक्षमिति॥२५॥

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sa tasmin-nevākāśe striyam-ājagāma bahu-śobhamānām-umāṃ haimavatīṃ tāṃ hovāca kim-etad-yakṣam-iti || 25 ||

💡

इंद्र उसी आकाश में खड़े रहे। तभी वहाँ अत्यंत शोभायमान देवी उमा (पार्वती/ब्रह्मविद्या का स्वरूप) प्रकट हुईं। इंद्र ने उनसे पूछा— 'यह यक्ष कौन था?'

मंत्र 27

सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥२६॥

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sā brahmeti hovāca brahmaṇo vā etad-vijaye mahīyadhvam-iti tato haiva vidāñcakāra brahmeti || 26 ||

💡

उमा देवी ने कहा— 'वह परब्रह्म थे। ब्रह्म की ही विजय में तुम लोग गौरवान्वित (महिमावान) हो रहे हो।' तब जाकर इंद्र को समझ आया कि वह यक्ष वास्तव में ब्रह्म थे।

मंत्र 28

तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्शुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥२७॥

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tasmād-vā ete devā atitarām-ivānyān-devān-yad-agnir-vāyur-indras-te hy-enan-nediṣṭhaṃ pasparśus-te hy-enat-prathamo vidāñcakāra brahmeti || 27 ||

💡

यही कारण है कि ये तीनों देवता (अग्नि, वायु और इंद्र) अन्य देवताओं की तुलना में श्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले ब्रह्म को अत्यंत निकट से स्पर्श किया (अनुभव किया) और जाना कि वह ब्रह्म हैं।

मंत्र 29

तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति॥२८॥

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tasmād-vā indro'titarām-ivānyān-devān-sa hy-enan-nediṣṭhaṃ pasparśa sa hy-enat-prathamo vidāñcakāra brahmeti || 28 ||

💡

इसीलिए इंद्र अन्य देवताओं में सबसे श्रेष्ठ माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने सबसे पहले ब्रह्म को अत्यंत समीप से स्पर्श किया (देवी उमा के माध्यम से जाना) और सर्वप्रथम जाना कि वह ब्रह्म हैं।

मंत्र 30

तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा३ इतीन् न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम्॥२९॥

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tasyaiṣa ādeśo yad-etad-vidyuto vyadyutad-ā3 itīn nyamīmiṣad-ā3 ity-adhidaivatam || 29 ||

💡

ब्रह्म का यह आध्यात्मिक संकेत (आदेश) है: जैसे आकाश में बिजली का कौंधना और क्षण भर में लुप्त हो जाना, या नेत्रों का पलक झपकना। यह देवताओं के स्तर पर (आधिदैविक रूप से) उसका संकेत है।

मंत्र 31

अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पः॥३०॥

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athādhyātmaṃ yad-etad-gacchatīva ca mano'nena caitad-upasmaraty-abhīkṣṇaṃ saṅkalpaḥ || 30 ||

💡

अब जीवात्मा के स्तर पर (आध्यात्मिक रूप से) उसका संकेत: मन जैसे अत्यंत तीव्र वेग से उसकी ओर जाता प्रतीत होता है, और संकल्प तथा निरंतर स्मरण द्वारा उसके निकट पहुँचता है।

मंत्र 32

तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनग्ं सर्वाणि भूतानि संवांञ्छन्ति॥३१॥

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taddha tad-vanaṃ nāma tad-vanam-ity-upāsitavyaṃ sa ya etad-evaṃ vedābhi hainagṃ sarvāṇi bhūtāni saṃvāñchanti || 31 ||

💡

वह ब्रह्म 'तद्वन' (सबका परम प्रिय/पूजनीय) नाम से प्रसिद्ध है। इसी रूप में उसकी उपासना करनी चाहिए। जो मनुष्य इस प्रकार जानता है, सभी प्राणी उससे प्रेम करने लगते हैं।

मंत्र 33

उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति॥३२॥

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upaniṣadaṃ bho brūhīty-uktā ta upaniṣad-brāhmīṃ vāva ta upaniṣadam-abrūmeti || 32 ||

💡

शिष्य ने पूछा— 'हे भगवन! मुझे उपनिषद (रहस्यमयी विद्या) सुनाइए।' गुरु ने उत्तर दिया— 'हमने तुमसे ब्रह्म-विषयक उपनिषद कह दी है, यही सत्य ज्ञान है'।

मंत्र 34

तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्॥३३॥

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tasyai tapo damaḥ karmeti pratiṣṭhā vedāḥ sarvāṅgāni satyam-āyatanam || 33 ||

💡

इस ब्रह्मविद्या के आधार (पैर) तप, इंद्रिय-संयम और निष्काम कर्म हैं। वेद इसके सभी अंग हैं, और सत्य इसका निवास स्थान (भवन) है।

मंत्र 35

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति॥३४॥

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yo vā etām-evaṃ vedāpahitya pāpmānam-anante svarge loke jyeye pratitiṣṭhati pratitiṣṭhati || 34 ||

💡

जो मनुष्य इस ब्रह्मविद्या को इस प्रकार जान लेता है, वह अपने सभी पापों का नाश करके उस अनंत, महान और परमानंदमय स्वर्गलोक (मोक्ष/ब्रह्मलोक) में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो जाता है।

शांति पाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om āpyāyantu mamāṅgāni vāk-prāṇaś-cakṣuḥ śrotram-atho balam-indriyāṇi ca sarvāṇi | sarvaṃ brahmaupaniṣadaṃ mā'haṃ brahma nirākuryāṃ mā mā brahma nirākarod-anirākaraṇam-astv-anirākaraṇaṃ me'stu | tad-ātmani nirate ya upaniṣatsu dharmās-te mayi santu te mayi santu || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

💡

हे परमात्मा! मेरे सभी अंग, वाणी, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, बल और समस्त इन्द्रियाँ पुष्ट हों। उपनिषदों में वर्णित सब कुछ ब्रह्म ही है। मैं कभी ब्रह्म का तिरस्कार न करूँ, और न ही ब्रह्म मेरा त्याग करे। उपनिषदों के परम धर्म मुझमें निवास करें। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

सामवेद
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पठन और मनन सम्पूर्ण

आपने श्री केनोपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।