श्री ईशोपनिषद्

Isha Upanishad • शुक्ल यजुर्वेद

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शुक्ल यजुर्वेद

श्री ईशोपनिषद्

यजुर्वेद का ४०वां अध्याय जो ईश्वर की सर्वव्यापकता, त्यागपूर्वक उपभोग और कर्मयोग का दिव्य संदेश देता है।

अवसर: नित्य स्वाध्याय, ब्रह्ममुहूर्त (Daily Study, Morning Meditation)
लाभ: ईश्वर की सर्वव्यापकता का बोध, अनासक्ति (Perceiving omnipresence of Divine, detachment)
शांति पाठ

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om pūrṇamadaḥ pūrṇamidaṃ pūrṇāt pūrṇamudacyate | pūrṇasya pūrṇamādāya pūrṇamevāvaśiṣyate || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

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वह परब्रह्म पूर्ण है, और यह जगत भी पूर्ण है। पूर्ण से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है। पूर्ण जगत को पूर्ण परब्रह्म से निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

मंत्र 2

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥१॥

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īśā vāsyamidaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat | tena tyaktena bhuñjīthā mā gṛdhaḥ kasyasviddhanam || 1 ||

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इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी गतिशील या अचल जगत है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक उसका उपभोग करो, किसी अन्य के धन का लोभ मत करो।

मंत्र 3

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥२॥

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kurvanneveha karmāṇi jijīviṣecchataṃ samāḥ | evaṃ tvayi nānyatheto'sti na karma lipyate nare || 2 ||

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इस संसार में निष्काम भाव से कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। तुम्हारे लिए इससे भिन्न कोई अन्य मार्ग नहीं है, जिससे कर्म तुम्हें न बांधें।

मंत्र 4

असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥३॥

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asūryā nāma te lokā andhena tamasāvṛtāḥ | tāṁste pretyābhigacchanti ye ke cātmahano janāḥ || 3 ||

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वे असुर (अज्ञान) लोक घोर अंधकार से ढके हुए हैं। जो लोग आत्मघाती हैं (अर्थात आत्मा को नहीं जानते या उसका हनन करते हैं), वे मृत्यु के बाद उन्हीं लोकों को प्राप्त होते हैं।

मंत्र 5

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्। तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥४॥

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anejadekaṃ manaso javīyo nainaddevā āpnuvan pūrvamarṣat | taddhāvato'nyānatyeti tiṣṭhat tasminnapo mātariśvā dadhāti || 4 ||

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वह आत्मतत्व अचल (स्थिर) और एक है, परंतु मन से भी अधिक वेगवान है। इंद्रियाँ (देवगण) उसे नहीं पा सकीं क्योंकि वह सदैव उनसे पहले ही पहुँचा रहता है। वह स्थिर रहकर भी दौड़ते हुए अन्यों से आगे निकल जाता है। उसकी सत्ता में ही प्राणवायु समस्त क्रियाओं को धारण करती है।

मंत्र 6

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥५॥

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tadejati tannaijati tad dūre tadvantike | tadantarasya sarvasya tadu sarvasyāsya bāhyataḥ || 5 ||

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वह चलता है और वह नहीं भी चलता; वह दूर है और बहुत निकट भी है; वह इस समस्त जगत के भीतर है और वही इस सबके बाहर भी विद्यमान है।

मंत्र 7

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥६॥

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yas tu sarvāṇi bhūtāny ātmany evānupaśyati | sarvabhūteṣu cātmānaṃ tato na vijugupsate || 6 ||

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जो मनुष्य सभी प्राणियों को अपनी आत्मा में देखता है और अपनी आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है, वह कभी किसी से घृणा नहीं करता।

मंत्र 8

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥७॥

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yasminsarvāṇi bhūtānyātmaivābhūdvijānataḥ | tatra ko mohaḥ kaḥ śoka ekatvamanupaśyataḥ || 7 ||

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जिस ज्ञानी पुरुष के लिए सभी प्राणी अपनी ही आत्मा बन गए हैं, उस एकत्व का अनुभव करने वाले व्यक्ति को कहाँ मोह और कहाँ शोक हो सकता है?

मंत्र 9

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूःयाथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥८॥

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sa paryagācchukramakāyamavraṇamasnāviraṃ śuddhamapāpaviddham | kavirmanīṣī paribhūḥ svayambhūryāthātathyato'rthān vyadadhācchāśvatībhyaḥ samābhyaḥ || 8 ||

💡

वह (परमात्मा) सर्वव्यापी, प्रकाशमान, अशरीरी, क्षत-रहित (अखंड), स्नायु-रहित (निराकार), शुद्ध और पाप से अछूता है। वह सर्वदर्शी, मन का स्वामी, सर्वोपरि और स्वयंभू है। उसने अनादि काल से प्रजापतियों (सृष्टि के तत्वों) को उनके अपने-अपने कार्यों में यथावत नियुक्त किया है।

मंत्र 10

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥९॥

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andhaṃ tamaḥ praviśanti ye'vidyāmupāsate | tato bhūya iva te tamo ya u vidyāyāṃ ratāḥ || 9 ||

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जो लोग केवल अविद्या (संसार कर्म) की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं। और जो केवल विद्या (सैद्धांतिक ज्ञान) में ही लीन रहते हैं, वे मानो उससे भी अधिक घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।

मंत्र 11

अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१०॥

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anyadevāhurvidyayā'nyadāhuravidyayā | iti śuśruma dhīrāṇāṃ ye nastadvicacakṣire || 10 ||

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ज्ञानी पुरुषों का कहना है कि विद्या से कुछ और ही फल प्राप्त होता है, तथा अविद्या से कुछ और ही। ऐसा हमने उन बुद्धिमान पुरुषों से सुना है जिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी।

मंत्र 12

विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥११॥

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vidyāñcāvidyāñca yastadvedobhayaṃ saha | avidyayā mṛtyuṃ tīrtvā vidyayā'mṛtamaśnute || 11 ||

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जो मनुष्य विद्या और अविद्या दोनों को एक साथ जानता है, वह अविद्या (कर्म) के द्वारा मृत्यु को पार करके विद्या (देवोपासना/ज्ञान) के द्वारा अमरता (परमानन्द) को प्राप्त करता है।

मंत्र 13

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्यां रताः॥१२॥

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andhaṃ tamaḥ praviśanti ye'sambhūtimupāsate | tato bhūya iva te tamo ya u sambhūtyāṃ ratāḥ || 12 ||

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जो लोग अव्यक्त प्रकृति (असंभूति) की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं। और जो केवल व्यक्त जगत (संभूति) में ही लीन रहते हैं, वे मानो उससे भी अधिक घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।

मंत्र 14

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्। इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे॥१३॥

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anyadevāhuḥ sambhavādanyadāhurasambhavāt | iti śuśruma dhīrāṇāṃ ye nastadvicacakṣire || 13 ||

💡

ज्ञानी पुरुषों का कहना है कि संभूति (व्यक्त की उपासना) से दूसरा ही फल मिलता है और असंभूति (अव्यक्त की उपासना) से कुछ दूसरा ही। ऐसा हमने उन बुद्धिमान पुरुषों से सुना है जिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी।

मंत्र 15

सम्भूतिञ्च विनाशञ्च यस्तद्वेदोभयं सह। विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते॥१४॥

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sambhūtiñca vināśañca yastadvedobhayaṃ saha | vināśena mṛtyuṃ tīrtvā sambhūtyā'mṛtamaśnute || 14 ||

💡

जो मनुष्य संभूति (परमात्मा के कार्य रूप हिरण्यगर्भ) और विनाश (विनाशी प्रकृति) दोनों को एक साथ जानता है, वह विनाश (शरीर आदि विनाशी तत्वों की उपासना) से मृत्यु को पार करके संभूति के द्वारा अमरता (परमानन्द) प्राप्त करता है।

मंत्र 16

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥१५॥

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hiraṇmayena pātreṇa satyasyāpihitaṃ mukham | tat tvaṃ pūṣannapāvṛṇu satyadharmāya dṛṣṭaye || 15 ||

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सत्य (परमात्मा) का मुख ज्योतिर्मय सुवर्ण पात्र (सूर्य मंडल के तेज) से ढका हुआ है। हे सर्वपोषक सूर्यदेव! मुझ सत्यधर्मा को अपने दर्शन कराने के लिए आप उस आवरण को हटा दीजिए।

मंत्र 17

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः। यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि॥१६॥

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pūṣannekarṣe yama sūrya prājāpatya vyūha raśmīn samūha tejaḥ | yatte rūpaṃ kalyāṇatamaṃ tatte paśyāmi yo'sāvasau puruṣaḥ so'hamasmi || 16 ||

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हे सर्वपोषक, एकमात्र द्रष्टा, सबके नियन्ता, सूर्यदेव, प्रजापति के पुत्र! आप अपनी रश्मियों को समेटिए और अपने तेज को शांत कीजिए। आपका जो अत्यंत कल्याणकारी रूप है, उसे मैं देखता हूँ। जो वहां सूर्यमंडल के भीतर पुरुष है, वह मैं ही हूँ।

मंत्र 18

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर॥१७॥

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vāyuranilamamṛtamathedaṃ bhasmāntaṃ śarīram | oṃ krato smara kṛtaṃ smara krato smara kṛtaṃ smara || 17 ||

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मेरा प्राण उस सर्वव्यापी, अविनाशी मुख्य प्राण में विलीन हो जाए और यह शरीर भस्म में मिल जाए। हे संकल्पमय जीवात्मा! ॐ का स्मरण करो, अपने किए हुए कर्मों को याद करो; पुनः ॐ का स्मरण करो, अपने किए हुए कर्मों को याद करो।

मंत्र 19

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥१८॥

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agne naya supathā rāye asmān viśwani deva vayunāni vidvān | yuyodhyasmajjuhurāṇameno bhūyiṣṭhāṃ te namauktiṃ vidhema || 18 ||

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हे अग्निदेव! आप हमारे समस्त कर्मों और ज्ञान को जानने वाले हैं। हमें कर्मफल भोगने के लिए सन्मार्ग (सुपथ) से ले चलिए। हमारे कुटिल पापों को हमसे दूर कीजिए। हम आपके प्रति बारंबार नमस्कार अर्पित करते हैं।

शांति पाठ

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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Om pūrṇamadaḥ pūrṇamidaṃ pūrṇāt pūrṇamudacyate | pūrṇasya pūrṇamādāya pūrṇamevāvaśiṣyate || Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ||

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वह परब्रह्म पूर्ण है, और यह जगत भी पूर्ण है। पूर्ण से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है। पूर्ण जगत को पूर्ण परब्रह्म से निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। ॐ शान्तिः! शान्तिः! शान्तिः!

शुक्ल यजुर्वेद
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पठन और मनन सम्पूर्ण

आपने श्री ईशोपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।