श्री ऐतरेयोपनिषद्
Aitareya Upanishad • ऋग्वेद
श्री ऐतरेयोपनिषद्
ऋग्वेद से सम्बद्ध उपनिषद जो सृष्टि की उत्पत्ति, जीवात्मा के प्रवेश और परमात्मा के परम स्वरूप का विश्लेषण करता है।
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधामि। ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Om vaangme manasi pratishthitaa mano me vaachi pratishthitamaaviraaveerma edhi | Vedasya ma aanisthah shrutam me maa prahaaseeraneenaadheetenaahoraatraansandadhaami | Ritam vadishyaami | Satyam vadishyaami | Tanmaamavatu tadvaktaaramavatu tanmaamavatu tadvaktaaramavatu || Om Shaantih Shaantih Shaantih ||
हे प्रभु! मेरी वाणी मन में प्रतिष्ठित हो और मेरा मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। हे प्रकाश स्वरूप परमात्मा, आप मेरे समक्ष प्रकट हों। मेरी बुद्धि वेदों को ग्रहण करने वाली बने। मेरी सुनी हुई विद्या मेरा परित्याग न करे। मैं दिन-रात निरंतर अध्ययन में व्यतीत करूँ। मैं ऋत (सत्य) कहूँगा, सत्य कहूँगा। वह मेरी और मेरे गुरुदेव की रक्षा करे।
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किंचन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति॥
Aatmaa vaa idameka evaagra aaseennaanyatkinchana mishat | Sa eekshata lokaan nu srijaa iti ||
सृष्टि के प्रारम्भ में केवल एक आत्मा (परमात्मा) ही था, इसके अतिरिक्त कुछ भी गतिशील नहीं था। उसने संकल्प किया कि मैं लोकों (जगत) की रचना करूँ।
पठन और मनन सम्पूर्ण
आपने श्री ऐतरेयोपनिषद् के प्रमुख मन्त्रों का मनन पूर्ण किया। वेदों का यह दिव्य प्रकाश आपकी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे।