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विश्वरूपदर्शनयोग

Vishwarupa Darshana Yoga • अध्याय 11

18
अध्याय सारांश

विश्वरूपदर्शनयोग

अर्जुन को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है और वह भगवान के अनंत, विस्मयकारी विश्वरूप का साक्षात्कार करता है जिसमें संपूर्ण काल समाहित है।

श्लोक 1

अर्जुन उवाच | मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् | यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ||११-१||

Meaning (Hindi)

अर्जुन बोले — आपने मुझ पर अनुग्रह करके जो परम गोपनीय अध्यात्म का उपदेश दिया, उससे मेरा मोह दूर हो गया है।

Meaning (English)

Arjuna said: The profound teaching on the Self that you gave me out of grace has removed my delusion completely.

🪔
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श्लोक 2

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया | त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ||११-२||

Meaning (Hindi)

हे कमलनयन! आपसे मैंने जीवों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तार से सुना है, और आपकी अनंत महिमा भी सुनी है।

Meaning (English)

O lotus-eyed Lord, I have heard in great detail from you about the origin and dissolution of all beings, and your inexhaustible greatness.

🪔
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श्लोक 3

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर | द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ||११-३||

Meaning (Hindi)

हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, वह ठीक वैसा ही है। लेकिन हे पुरुषोत्तम! मैं आपके ईश्वरीय रूप को अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।

Meaning (English)

O Supreme Lord, you are exactly as you describe yourself. Yet I wish to see your divine form with my own eyes, O Purushottama.

🪔
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श्लोक 4

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो | योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ||११-४||

Meaning (Hindi)

हे प्रभो! यदि आप समझते हैं कि यह मेरे लिए संभव है, तो हे योगेश्वर! अपने अव्यय रूप का दर्शन कराइए।

Meaning (English)

O Lord, if you think it is possible for me to see it, then please reveal your imperishable form to me, O Master of Yoga.

🪔
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श्लोक 5

श्रीभगवानुवाच | पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः | नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ||११-५||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हजारों तरह के, अनेक रंग और आकार के दिव्य रूपों को देखो।

Meaning (English)

Krishna said: O Arjuna, behold My divine forms by the hundreds and thousands, of many kinds, colors, and shapes.

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श्लोक 6

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा | बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ||११-६||

Meaning (Hindi)

हे भारत! मुझमें आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों और मरुतों को देखो — और बहुत से ऐसे अद्भुत दृश्य देखो जो पहले कभी नहीं देखे।

Meaning (English)

O Arjuna, see within Me the Adityas, Vasus, Rudras, the Ashvini twins, and the Maruts — and many more wonders never seen before.

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श्लोक 7

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् | मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ||११-७||

Meaning (Hindi)

हे गुडाकेश! आज मेरे इस शरीर में ही चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को एक जगह देखो — और जो भी देखना चाहते हो, वह भी देखो।

Meaning (English)

O Arjuna, see the entire universe — moving and unmoving — gathered in one place within My body, and whatever else you wish to see.

🪔
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श्लोक 8

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा | दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ||११-८||

Meaning (Hindi)

लेकिन तुम अपनी इन साधारण आँखों से मुझे नहीं देख सकते। इसलिए मैं तुम्हें दिव्य आँखें देता हूँ — इनसे मेरी ईश्वरीय शक्ति देखो।

Meaning (English)

But you cannot see Me with these ordinary eyes. So I give you divine sight — behold My lordly power!

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श्लोक 9

सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः | दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ||११-९||

Meaning (Hindi)

संजय बोले — हे राजन्! महायोगेश्वर श्रीकृष्ण ने इतना कहकर अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय विश्वरूप दिखाया।

Meaning (English)

Sanjaya said: O King, having said this, the great Lord of Yoga, Krishna, revealed His supreme cosmic form to Arjuna.

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श्लोक 10

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् | अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ||११-१०||

Meaning (Hindi)

अनेक मुख और आँखें, अनेक अद्भुत दृश्य, अनेक दिव्य आभूषण और अनेक दिव्य शस्त्र उठाए हुए —

Meaning (English)

With countless mouths and eyes, countless wondrous visions, countless divine ornaments and divine weapons raised —

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श्लोक 11

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् | सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ||११-११||

Meaning (Hindi)

दिव्य माला और वस्त्र पहने, दिव्य सुगंध लगाए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, अनंत और सब ओर मुख वाले परम देव को अर्जुन ने देखा।

Meaning (English)

Wearing divine garlands and robes, anointed with divine fragrances — a Being of infinite wonder, resplendent, endless, with faces on all sides.

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श्लोक 12

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता | यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ||११-१२||

Meaning (Hindi)

आकाश में यदि एक साथ हजार सूर्य उग जाएं, तो उनका जो प्रकाश हो — वह उस महात्मा (विश्वरूप) के प्रकाश के समान होगा।

Meaning (English)

If a thousand suns were to blaze in the sky all at once, that blazing light might perhaps compare to the radiance of that great Being.

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श्लोक 13

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा | अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ||११-१३||

Meaning (Hindi)

उस समय अर्जुन ने देवों के देव श्रीकृष्ण के शरीर में अनेक प्रकार से विभक्त सम्पूर्ण जगत् को एक स्थान पर देखा।

Meaning (English)

There Arjuna saw the entire universe — divided into many parts — resting in one place within the body of Krishna, the God of gods.

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श्लोक 14

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः | प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ||११-१४||

Meaning (Hindi)

उसके बाद आश्चर्यचकित और रोमांचित धनंजय अर्जुन ने उस विश्वरूप देव को प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा।

Meaning (English)

Then, filled with wonder, his hair standing on end, Arjuna bowed his head to the Lord and spoke with folded hands.

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श्लोक 15

अर्जुन उवाच | पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् | ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ||११-१५||

Meaning (Hindi)

अर्जुन बोले — हे देव! मैं आपके शरीर में सभी देवताओं को, अनेक प्राणियों के समूहों को, कमल पर विराजमान ब्रह्माजी को, सभी ऋषियों और दिव्य नागों को देख रहा हूँ।

Meaning (English)

Arjuna said: O God, I see all the gods in your body, and hosts of all kinds of beings — Brahma seated on the lotus, all the sages, and the divine serpents.

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श्लोक 16

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् | नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ||११-१६||

Meaning (Hindi)

हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको अनेक बाहुओं, उदरों, मुखों और आँखों से युक्त, सब ओर से अनंत रूपों में देखता हूँ — न आपका अंत दिखता है, न मध्य, न आदि।

Meaning (English)

O Lord of the Universe! I see you with countless arms, bellies, mouths, and eyes, extending in all directions with infinite forms. I see no beginning, middle, or end to you.

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श्लोक 17

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् | पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ||११-१७||

Meaning (Hindi)

मैं आपको मुकुटधारी, गदाधारी और चक्रधारी, सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज के रूप में देखता हूँ — जलती अग्नि और सूर्य के समान देदीप्यमान, देखने में कठिन और अप्रमेय।

Meaning (English)

I see you with crown, mace, and discus — blazing on all sides as a mass of light, hard to look upon, radiant like a blazing fire and sun, immeasurable.

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श्लोक 18

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ||११-१८||

Meaning (Hindi)

आप जानने योग्य परम अक्षर हैं, इस जगत् के परम आश्रय हैं। आप ही शाश्वत धर्म के रक्षक हैं और सनातन पुरुष हैं — ऐसा मेरा विश्वास है।

Meaning (English)

You are the supreme Imperishable, the highest truth worth knowing. You are the ultimate refuge of this universe, the eternal guardian of dharma, the primeval Person — so I believe.

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श्लोक 19

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् | पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ||११-१९||

Meaning (Hindi)

मैं आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनंत शक्तिशाली, अनंत भुजाओं वाले, चंद्र-सूर्य रूपी आँखों वाले, प्रज्वलित अग्नि रूपी मुख से सम्पूर्ण जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।

Meaning (English)

I see you without beginning, middle, or end — of infinite power, of endless arms, with the sun and moon as your eyes, your mouth a blazing fire, warming this entire universe with your radiance.

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श्लोक 20

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः | दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ||११-२०||

Meaning (Hindi)

हे महात्मन्! स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश और सब दिशाएं अकेले आपसे ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक भय से कांप रहे हैं।

Meaning (English)

O great Being, this entire space between heaven and earth, and all directions, is filled by you alone. Seeing this wondrous and terrible form of yours, all three worlds tremble with fear.

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श्लोक 21

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति | स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ||११-२१||

Meaning (Hindi)

ये सभी देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, कई डरकर हाथ जोड़े स्तुति कर रहे हैं। महर्षि और सिद्धगण 'स्वस्ति हो' कहते हुए उत्तम स्तोत्रों से आपकी प्रशंसा कर रहे हैं।

Meaning (English)

All these hosts of gods are entering you. Some, filled with fear, praise you with joined palms. The great sages and perfected ones cry 'may all be well!' and glorify you with hymns.

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श्लोक 22

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च | गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ||११-२२||

Meaning (Hindi)

रुद्रगण, आदित्य, वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुद्गण, उष्मपा, गंधर्व, यक्ष, असुर और सिद्धगण — ये सब आश्चर्यचकित होकर आपको देख रहे हैं।

Meaning (English)

The Rudras, Adityas, Vasus, Sadhyas, Vishvedevas, the two Ashvins, the Maruts, the ancestors, the Gandharvas, Yakshas, demons, and perfected beings — all gaze at you in amazement.

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श्लोक 23

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् | बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ||११-२३||

Meaning (Hindi)

हे महाबाहो! आपके बहुत मुखों, आँखों, भुजाओं, जंघाओं, पैरों, उदरों और विकराल दाढ़ों वाले इस विशाल रूप को देखकर सब लोग व्यथित हो रहे हैं — और उसी तरह मैं भी।

Meaning (English)

O mighty-armed! Seeing your immense form with its many mouths and eyes, many arms, thighs, and feet, many stomachs, and fearsome teeth — all the worlds are terrified, and so am I.

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श्लोक 24

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् | दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ||११-२४||

Meaning (Hindi)

हे विष्णो! आकाश को छूते हुए, प्रकाशमान, अनेक रंगों वाले, खुले मुख और बड़ी-बड़ी चमकीली आँखों वाले आपको देखकर मेरा मन भय से व्याकुल है, मुझे न धैर्य मिल रहा है न शांति।

Meaning (English)

O Vishnu! Seeing you touching the sky, blazing, many-colored, with gaping mouths and enormous shining eyes — my heart is trembling with fear; I find neither courage nor peace.

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श्लोक 25

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि | दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ||११-२५||

Meaning (Hindi)

आपके विकराल दाढ़ों वाले और प्रलयाग्नि जैसे प्रज्वलित मुखों को देखकर मैं न दिशाएं जान पा रहा हूँ, न शांति पा रहा हूँ। हे देवेश! हे जगन्निवास! कृपया प्रसन्न होइए।

Meaning (English)

Seeing your mouths with terrifying teeth, blazing like the fires of dissolution — I cannot find my bearings or feel at peace. O Lord of the gods, O Abode of the universe, please show mercy.

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श्लोक 26

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः | भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ||११-२६||

Meaning (Hindi)

ये सभी धृतराष्ट्र के पुत्र, राजाओं के समूह सहित, भीष्म, द्रोण, कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रमुख योद्धा —

Meaning (English)

All the sons of Dhritarashtra, along with their host of kings — Bhishma, Drona, Karna, and the leading warriors on our side too —

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श्लोक 27

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि | केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ||११-२७||

Meaning (Hindi)

तीव्र वेग से आपके विकराल दाढ़ों वाले भयानक मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। कई तो चूर्णित सिरों सहित आपके दांतों के बीच फंसे दिख रहे हैं।

Meaning (English)

Are rushing headlong into your terrifying mouths with their fearsome teeth. Some are found stuck between your teeth, their heads crushed.

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श्लोक 28

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति | तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ||११-२८||

Meaning (Hindi)

जैसे नदियों की अनेक धाराएं वेग से समुद्र की ओर दौड़ती हैं, वैसे ही ये मानव लोक के वीर योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

Meaning (English)

Just as many rivers flow swiftly into the ocean, these heroes of the mortal world are pouring into your blazing mouths.

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श्लोक 29

यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः | तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्- तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ||११-२९||

Meaning (Hindi)

जैसे पतंगे अपने नाश के लिए तेज गति से जलती अग्नि में घुसते हैं, वैसे ही ये सभी अपने नाश के लिए तेज गति से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

Meaning (English)

Just as moths rush swiftly into a blazing fire to their own destruction, so too are all these beings rushing into your mouths toward their own destruction.

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श्लोक 30

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्- लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः | तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ||११-३०||

Meaning (Hindi)

हे विष्णो! आप प्रज्वलित मुखों से इन सब लोकों को निगलते हुए चाट रहे हैं। आपका उग्र तेज सम्पूर्ण जगत् को भरकर जला रहा है।

Meaning (English)

O Vishnu! You are licking up and swallowing all the worlds on every side with your flaming mouths. Your fierce radiance fills the entire universe and scorches it.

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श्लोक 31

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद | विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ||११-३१||

Meaning (Hindi)

मुझे बताइए — उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार है, प्रसन्न होइए। मैं आदि स्वरूप आपको जानना चाहता हूँ, क्योंकि आपकी प्रवृत्ति को मैं समझ नहीं पा रहा।

Meaning (English)

Tell me who you are, so fierce in form. O greatest of gods, be gracious. I wish to know you, the Primal Being — I cannot understand your purpose here.

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श्लोक 32

श्रीभगवानुवाच | कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः | ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ||११-३२||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — मैं लोकों का नाश करने वाला प्रचंड काल हूँ। अभी मैं इन लोकों का संहार करने में लगा हूँ। तुम्हारे बिना भी सामने की सेना के ये सब योद्धा नहीं बचेंगे।

Meaning (English)

Krishna said: I am Time — the destroyer of worlds, grown mighty, now engaged in consuming all these worlds. Even without you, all the warriors arrayed against you shall not survive.

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श्लोक 33

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् | मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११-३३||

Meaning (Hindi)

इसलिए उठो और यश पाओ! शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन! तुम बस निमित्त मात्र बनो।

Meaning (English)

So rise up and win glory! Conquer your enemies and enjoy a prosperous kingdom. These warriors have already been slain by Me. Be just the instrument, O Arjuna.

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श्लोक 34

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् | मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ||११-३४||

Meaning (Hindi)

द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और बाकी वीर योद्धाओं को मारो — ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं। डरो मत, लड़ो — तुम युद्ध में शत्रुओं को जीतोगे।

Meaning (English)

Drona, Bhishma, Jayadratha, Karna, and all the other brave warriors — they are already slain by Me. Kill them without fear. Fight — you will conquer your enemies in battle.

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श्लोक 35

सञ्जय उवाच | एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी | नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ||११-३५||

Meaning (Hindi)

संजय बोले — केशव के ये वचन सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़े हुए, कांपते हुए, प्रणाम करके डरे हुए मन से गद्गद् स्वर में बोला।

Meaning (English)

Sanjaya said: Hearing those words of Krishna, Arjuna with joined palms, trembling, bowed down and — overwhelmed with fear — spoke in a choked voice.

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श्लोक 36

अर्जुन उवाच | स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च | रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ||११-३६||

Meaning (Hindi)

अर्जुन बोले — हे हृषीकेश! यह उचित ही है कि आपकी महिमा से जगत् बहुत प्रसन्न होता है और अनुराग में भर जाता है। भयभीत राक्षस सब दिशाओं में भाग रहे हैं और सिद्धगणों के समूह आपको नमस्कार कर रहे हैं।

Meaning (English)

Arjuna said: O Krishna, it is right that the world delights and is filled with love at your praise. Demons flee in terror in all directions, while the hosts of perfected ones bow to you.

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श्लोक 37

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे | अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ||११-३७||

Meaning (Hindi)

हे महात्मन्! जो ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सबसे श्रेष्ठ हैं, उन्हें ये नमस्कार क्यों न करें? हे अनंत! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्, असत् और उनसे परे अक्षरतत्त्व है — वह आप ही हैं।

Meaning (English)

O great Soul! Why would they not bow to you — you who are greater than Brahma himself, the original creator? O Infinite One! O Lord of gods! O Abode of the universe! You are the Imperishable, Being, non-being, and that which is beyond both.

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श्लोक 38

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्- त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ||११-३८||

Meaning (Hindi)

आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, इस जगत् के परम आश्रय हैं। आप ज्ञाता भी हैं और जानने योग्य भी, और परम धाम भी। हे अनंत रूप! आपसे ही यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है।

Meaning (English)

You are the primal God, the ancient Person, the supreme refuge of this universe. You are the knower, the knowable, and the supreme abode. O Being of infinite forms — the universe is pervaded by you.

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श्लोक 39

वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च | नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||११-३९||

Meaning (Hindi)

आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजापति और प्रपितामह भी हैं। आपको हजार बार नमस्कार — बार-बार नमस्कार!

Meaning (English)

You are Vayu, Yama, Agni, Varuna, the moon, the Creator, and the great-grandfather. Salutations to you a thousand times — again and again, salutations!

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श्लोक 40

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व | अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||११-४०||

Meaning (Hindi)

आपके सामने से, पीछे से और सब ओर से नमस्कार! हे सर्वात्मन्! आप अनंत शक्ति और असीम पराक्रम वाले हैं, आप सबको व्याप्त किए हुए हैं — इसलिए आप ही सब कुछ हैं।

Meaning (English)

Salutations from the front, from behind, salutations on every side, O All! You are of infinite power and boundless might. You pervade all — and so you are everything.

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श्लोक 41

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति | अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ||११-४१||

Meaning (Hindi)

आपकी इस महिमा को न जानते हुए, आपको मित्र समझकर मैंने प्रमाद से या प्रेमवश 'हे कृष्ण! हे यादव! हे सखे!' ऐसा जो कुछ बेतकल्लुफी से कह दिया —

Meaning (English)

Whatever I may have said carelessly or out of affection — calling you 'O Krishna! O Yadava! O Friend!' — not knowing your greatness —

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श्लोक 42

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु | एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ||११-४२||

Meaning (Hindi)

और हे अच्युत! खेलते, सोते, बैठते या भोजन करते समय अकेले में या दूसरों के सामने भी आपका जो अपमान हुआ हो — उन सब के लिए अप्रमेय स्वरूप आपसे मैं क्षमा मांगता हूँ।

Meaning (English)

And if I ever showed you disrespect in play, while resting, sitting, or eating — alone or in front of others — O Achyuta, I beg your forgiveness, O immeasurable One.

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श्लोक 43

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् | न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ||११-४३||

Meaning (Hindi)

आप इस चराचर जगत् के पिता, पूजनीय और सर्वश्रेष्ठ गुरु हैं। हे अप्रतिम प्रभाव वाले भगवन्! तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं, फिर आपसे बढ़कर कैसे होगा?

Meaning (English)

You are the Father of this world — moving and unmoving. You are its most worthy teacher, its greatest guru. No one is equal to you in all three worlds — how could anyone be superior, O Being of unmatched power?

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श्लोक 44

तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् | पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ||११-४४||

Meaning (Hindi)

इसलिए हे भगवन्! मैं साष्टांग प्रणाम करके स्तुति के योग्य आप ईश्वर से प्रसन्न होने की प्रार्थना करता हूँ। जैसे पिता पुत्र के, मित्र मित्र के और प्रिय प्रिया के अपराध क्षमा करता है — वैसे ही आप भी मेरे अपराध क्षमा कीजिए।

Meaning (English)

Therefore, bowing down and prostrating myself before you, I seek your grace, O adorable Lord. As a father forgives a son, a friend forgives a friend, a lover forgives a beloved — so please forgive me, O God.

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श्लोक 45

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे | तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ||११-४५||

Meaning (Hindi)

इस अदृष्टपूर्व रूप को देखकर मैं प्रसन्न भी हो रहा हूँ और मेरा मन भय से व्याकुल भी है। इसलिए हे देव! मुझे वही पहला रूप दिखाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।

Meaning (English)

I am thrilled to have seen this form never seen before, yet my heart is filled with fear. O God, please show me only that familiar form of yours. O Lord of the gods, O Abode of the universe, have mercy.

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श्लोक 46

किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तं इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव | तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ||११-४६||

Meaning (Hindi)

मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए उसी रूप में देखना चाहता हूँ। हे विश्वमूर्ते! हे सहस्रबाहो! कृपया उसी चतुर्भुज रूप में आ जाइए।

Meaning (English)

I want to see you as before — with crown, mace, and discus in hand. O Being of cosmic form, O thousand-armed One — please take back that four-armed form.

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श्लोक 47

श्रीभगवानुवाच | मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् | तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ||११-४७||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — हे अर्जुन! तुम पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति से यह परम तेजोमय, अनंत और आदि विश्वरूप तुम्हें दिखाया — जिसे तुमसे पहले किसी ने नहीं देखा था।

Meaning (English)

Krishna said: O Arjuna, out of My grace for you, I showed you this supreme, radiant, infinite, primeval Cosmic Form by My own yogic power — which no one but you has ever seen before.

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श्लोक 48

न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्- न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः | एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ||११-४८||

Meaning (Hindi)

हे कुरुप्रवीर! तुम्हारे अतिरिक्त इस मनुष्यलोक में कोई और इस रूप को — न वेदाध्ययन से, न यज्ञ से, न दान से, न कर्मकांड से और न कठोर तप से — देख सकता है।

Meaning (English)

O great hero of the Kurus, no one else in this human world can see Me in this form — not through Vedic study, not through sacrifice, not through gifts, not through rituals, not through fierce austerities.

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श्लोक 49

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् | व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ||११-४९||

Meaning (Hindi)

मेरा यह रूप देखकर तुम्हें डर और घबराहट न हो। निर्भय और प्रसन्नचित्त होकर अब मेरे उसी पहले के रूप को देखो।

Meaning (English)

Do not be afraid or confused by this terrible form of Mine. With your fear gone and heart gladdened, now behold again My familiar form.

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श्लोक 50

सञ्जय उवाच | इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः | आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ||११-५०||

Meaning (Hindi)

संजय बोले — भगवान् वासुदेव ने अर्जुन से इस प्रकार कहकर पुनः अपना (पहले वाला) रूप दिखाया। और सौम्य रूपधारी महात्मा श्रीकृष्ण ने भयभीत अर्जुन को सांत्वना दी।

Meaning (English)

Sanjaya said: Having thus spoken to Arjuna, Krishna showed His own form once again, and that great Soul, taking on His gentle form, consoled the terrified Arjuna.

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श्लोक 51

अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ||११-५१||

Meaning (Hindi)

अर्जुन बोले — हे जनार्दन! आपका यह सौम्य मानवीय रूप देखकर अब मेरा मन शांत हो गया है और मैं अपने स्वभाव को वापस पा गया हूँ।

Meaning (English)

Arjuna said: O Krishna, seeing this gentle human form of yours, my mind is now at rest and I have returned to my normal self.

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श्लोक 52

श्रीभगवानुवाच | सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम | देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ||११-५२||

Meaning (Hindi)

श्रीकृष्ण बोले — मेरा यह रूप देख पाना बहुत दुर्लभ है जो तुमने देखा है। देवतागण भी सदा इस रूप के दर्शन की इच्छा रखते हैं।

Meaning (English)

Krishna said: This form of Mine that you have seen is very rare to behold. Even the gods always yearn to see it.

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श्लोक 53

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया | शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ||११-५३||

Meaning (Hindi)

न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से मैं उस रूप में देखा जा सकता हूँ, जैसा तुमने मुझे देखा है।

Meaning (English)

Not by the Vedas, not by austerity, not by charity, not by sacrifice can I be seen in this form as you have seen Me.

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श्लोक 54

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन | ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ||११-५४||

Meaning (Hindi)

लेकिन हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति से मुझे इस रूप में जाना जा सकता है, प्रत्यक्ष देखा जा सकता है और तत्त्वतः प्रवेश भी किया जा सकता है।

Meaning (English)

But by single-pointed devotion can I be truly known, seen, and even entered into, O Arjuna.

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श्लोक 55

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः | निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ||११-५५||

Meaning (Hindi)

हे पाण्डव! जो मेरे लिए ही कार्य करता है, मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से मुक्त है और किसी भी प्राणी से वैर नहीं रखता — वह मुझे प्राप्त होता है।

Meaning (English)

One who acts for My sake, who holds Me as the supreme goal, who is devoted to Me, free from attachment, without enmity toward any being — that person comes to Me, O Arjuna.

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